मंगलवार, 18 सितंबर 2012

हिंदी - राष्ट्र भाषा ( भाग - एक)..


हिंदी - राष्ट्र भाषा ( भाग - एक)..

हिंदी भाषा का प्रादुर्भाव कब कैसे हुआ , इसको जानने के लिए हमको शुरुवात संस्कृत के इतिहास से करनी होगी|

हिंदी साहित्य को यदि आरंभिक, मध्य व आधुनिक काल में विभाजित कर विचार किया जाए तो स्पष्ट होता है कि हिन्दी साहित्य का इतिहास अत्यंत विस्तृत व प्राचीन है। सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डा . हरदेव बाहिरी के शब्दों में, 'हिन्दी साहित्य का इतिहास वस्तुतः वैदिक काल से आरम्भ होता है। यह कहना ही ठीक होगा कि वैदिक भाषा हीहिंदी है। इस भाषा का दुर्भाग्य रहा है कि युग-युग में इसका नाम परिवर्तित होता रहा है। कभी 'वैदिक', कभी 'संस्कृत " कभी 'प्रकृत', कभी 'अपभ्रंश' और अब -हिंदी। हिंदी साहित्य के इतिहास को खंगालने का श्रेय गार्सा ता तासी को जाता है लेकिन चूँकि उन्होंने भारत में रहकर ज्यदा अध्ययन नहीं किया इसलिए हम उनके अद्ययन को अधिक प्रमाणिक नहीं मान सकते लेकिन ये कहना गलत नहीं की उन्होंने भारत से दूर बैठकर यहाँ का इतिहास का अद्ययन किया और लेखकों के कालक्रम का प्रकाशन किया | डा गिएर्सन ने अपनी किताब "The Modern Vernacular Literature of Hindustan " के लिए भारत की गलियों बाज़ारों को छाना, उन्होंने अपनी पुस्तक में शिव सिंह सरोज (७०० इसवी ), एक राजपुताना लेखक, को उद्धृत किया है और उनके साहित्य  प्रमाणिक जानकारियां तथ्य जुटाए , लेकिन अपने अद्ययन के लिए गिएर्सन केवल सेंगर पर निर्भर नहीं रहे .. गिएर्सन अपनी पुस्तक में लिखते है " The earlier rajput bards wrote in time of transition , in a  language which it would be difficult to define accurately , late Prakrit."  हालाँकि इस अद्ययन में गिएर्सन ने प्राचीन संस्कृत को शामिल नहीं किया है लेकिन ये माना है हिंदी लेखक अपने संस्कृत अग्रजों की भाषा को अपनाते है , गिएर्सन लिखते है " To the mere student of language the Padmawat possesses,by a happy accident , inestimable value.Composed in the earlier portion of the 16th century,it gives us the representation of speech and of the pronunciation of those days.Hindu writers tied with the fetters of custom , were constrained to spell their words,not as they were pronounced , but as they were written in the old Sanskrit of their forefathers. 
उपरोक्त तथ्यों से ये तो साफ़ लगता है की आधुनिक हिंदी की शुरुवात भले सिब सिंह सरोज के साथ से शुरू हुई हो लेकिन हर्षवर्धन काल का बाद हिंदी प्रचलित हो चुकी थी .. और ये भी तथ्य प्रस्तुत किया जा सकता है अब की हिंदी प्राकृत से मिलती जुलती भाषा थी जो की संस्कृत की बोल चाल की भाषा थी |
संसार का पहला ग्रन्थ ऋग्वेद को माना गया है , संभव है पूर्व ब्रह्मावर्त (भारत,बंगलादेश ,अफगानिस्तान & पाकिस्तान ) में और भी कोई प्रचलित भाषा रही हो लेकिन उनका कोई साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं है| सिधु सभ्यता में कई भाषाएँ और लिपियाँ प्रचलित थी जो मोहनजोदड़ो (पाकिस्तान) की खोदाई मिली लेकिन उनको अभी तक पड़ा नहीं जा सका है | लेकिन ये कहा नहीं जा सकता की इनका संस्कृत से कोई सम्बन्ध था क्यूंकि संस्कृत आर्यों की भाषा थी और सिन्धु सभ्यता पूर्व वैदिककालीन थी | शायद वैदिक संस्कृत ही आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा थी|
ऋग्वेद को वैदिक संस्कृत में लिखा गया लेकिन जैसे जैसे समय बदला भाषा बदलती गयी सभी ब्रह्माण ग्रन्थ जो की वेदों का ही गद्य रूप थे लौकिक संस्कृत में लिखे गए | ये लौकिक संस्कृत  द्वीजी कहलाई . द्विज ब्रह्मण या विदवान को कहा जाता है इस आधार पर कहा जा सकता है की ये केवल विद्वानों और पंडितों की भाषा थी जबकि बोल चाल की भाषा दूसरी थी कारण बोलने की आसानी|डा चन्द्र बलि पाण्डेय ने इस भाषा को मानुषी कहा है | डा धीरेन्द्र वर्मा भी कहते है  " पतंजलि के काल में व्याकरण आधारित संस्कृत बोलने वाले विदवान कम ही थे जबकि प्रचलित भाषा व्याकरण आधारित नहीं थी , जो कालान्तर में प्राकृत कहलाई ". डा चन्द्र बलि पाण्डेय भी मानते है की भाषा में विकृति आ चुकी थी जिसे उन्होंने वालिमिकी रामायण का उदहारण देके समझाया जिसमे हनुमान जी सीता माँ से अशोक वाटिका में द्वीजी में न वार्तालाप कर प्राकृत में बात चीत करते है |
 डा राम विलास शर्मा लिखते है " प्राकृत ने संस्कृत को हठात विकृत करने का नियम हीन प्रयत्न किया "| डा श्याम सुन्दर  दास मानते है " वेद कालीन कथित भाषा से ही संस्कृत उत्पन्न हुई , अनार्यों के संपर्क का सहारा पाकर अन्य प्रांतीय "बोलियाँ " विकसित हुईं |"

यह बात दीगर है की दीर्घकाल तक संस्कृत राष्ट्रीय भाषा रही भले ही उसके अपभ्रंस प्राकृत ने उसकी जगह ली | बुद्ध ने अपने उपदेश जनसाधारण भाषा में ही दिए जो प्राकृत थी , भले ही लोगों को व्याकरण का ज्ञान नहीं था पर फिर भी वो संस्कृत समझते थे बस उनको उच्चारन का पूर्ण ज्ञान नहीं था |कालिदास की रचनाओं में भी ये पायेंगे की जब विदवान बात करते है तो संस्कृत लेकिन जब दास - दासियाँ बात करते है तो प्राकृत का इस्तेमाल किया गया है | मक्स्मुलर , गिएर्सन , जोंस , गेटे , केथ आदि बहुत से पचायत लेखकों ने संस्कृत की समृद्धता का लोहा माना है और कहीं न कहीं इसके प्रभाव को अनन्य भाषाओँ पर स्वीकारोक्ति दी है |

डा श्याम चन्द्र कपूर ने प्राकृत भाषा को तीन कालों में बाटा है १) ५०० ईसा पूर्व से पहली ईश्वी २) पहली ईश्वी से ५०० ईश्वी ३) ५०० इश्वी से १००० ईश्वी .
इन सभी कालों में संस्कृत राष्ट्रीय भाषा ही रही हर्षवर्धन के काल तक| प्राकृत अपने पहले काल में पाली कही गयी दुसरे काल में इसे साहित्यिक प्राकृत भाषा कहा गया |
तीसरा काल में ये अपभ्रंश कहा गया जो हिंदी का प्रारम्भिक स्वरुप था| जैसा मैंने पहले ही कहा की शुरुवात शिव सिंह सरोज से हो चुकी थी जिन्होंने तत्कालीन भाषा का इतिहास लिखा और सरोज ने संस्कृत और प्रारंभिक हिंदी दोनों में लिखा है जो यह दर्शाता है की संस्कृत भी उस समय तक साहित्यिक और प्रचलित भाषा थी |

प्राकृत के ६ रूप(बोली) प्रचलित थे मागधी , अर्धमागधी , शौरशेनी,महाराष्ट्री , पैशाची और व्र्चाद | मागधी आर्यावर्त (भारत , पाकिस्तान & बंगलादेश ) के सोलह जनपदों में से  मगध,वज्जि,मगध और अंग  जनपद के आस-पास बोली जाती थी|बिहारी,बंगला,उड़िया, असमिया आदि भाषाएँ मागधी की आधुनिक भाषाएँ है |  
अर्धमागधी कोशल,काशी,वत्स और मल्ल जनपद की भाषा थी , इसकी आधुनिक भाषाएँ वो सभी भाषाएँ है जो आज के उत्तरप्रदेश ,झारखण्ड ,हरियाणा , मध्यप्रदेश में बोली जाती है | शौरशेनी शौरशेन , मतस्य ,पंचाल और कुरु जनपदों में बोली जाती थी,राजस्थानी,गुजराती , पहाड़ी भाषाएँ इसी भाषा का रूप है | शौरशेनी का नया रूप मराठी , पैशाची का नया रूप लहंडा और पंजाबी और सिन्धी व्र्चाद का वर्तमान रूप है |आज की प्रचलित खड़ी बोली शौरशेनी का ही रूप है |
 धीरे धीरे इन बोलियों का विघटन शरू हुआ उनसे कई उपशाखाएँ निकली| लेकिन इन सभी में संस्कृत के ही मूल तत्व थे एक प्रकार से यह कहा जा सकता है जैसे आज हिंदी की कई बोलियाँ है वैसे ये सारी शाखाएं संस्कृत की बोलियाँ थी |
अपभ्रंश भाषा के एक दोहे का उल्लेख करना चाहूँगा
"चलिअ वीर हम्मीर पाअभर मेईण कम्पि.
दिग्मग णह अंधार धुरि सुर रह  अछ्छाहीं "
कोई भी आज की हिंदी बोलने वाला हो उसको भले ही कठिनाई हो लेकिन ये दोहे का अर्थ उसको समझ में आ जायेगा|और यही हिंदी का प्रारंभिक रूप है जो कि आज प्रचलित है | इस प्रकार हम बात दो तरह से कह सकते है पहला हिंदी संस्कृत का ही अपभ्रंश है जो हजारों साल तक हम तक पहुँचते - २ टूटती हुई पहुंची है दूसरा ये की भले ही हिंदी अपभ्रंश  हो लेकिन फिर भी ये ८०० साल से ज्यदा पुरानी भाषा हो चुकी है | अगर आज के समय में कोई भी यह कहता है कि ये भाषा इतने हज़ार साल पुरानी  है तो में नहीं मान सकता इसका कारण है भाषा का अप्भ्रन्शन जो की लोग अपनी सुविधा अनुसार करते ही है |

आलोचक कह सकते है की  हिंदी और संस्कृत में जमीन आसमान का फर्क है| तो ध्यान योग्य बात ये है की हिब्रू , रुसी, चीनी ,तमिल और जर्मन जिन्हें बहुत ही पुरानी भाषा कहा गया है , उनके भी प्राचीन और वर्तमान स्वरुप में जमीन - आसमान का अंतर है , बस फर्क इतना है की हम जब उनके इतिहास को पढते है तो आदि , मध्य और प्रारंभिक काल मे बाँट कर पढते है |जबकि हिंदी के सन्दर्भ में हर काल में नया नाम दे दिया जाता है , जैसे हिंदी का ही रूप अवधी , भोजपुरी , बिहारी और बहुत सी बोलियाँ है लेकिन अब उनको एक अलग दर्जा प्राप्त है |

अगले भाग में एह चिंतन प्रदर्शित किया जायेगा की क्या हिंदी को भारत की राष्ट्र भाषा होनी चाहिए या नहीं ......

सन्दर्भ  :
१) हिंदी साहित्य के पहले इतिहासकार - गार्सा दा तासी
२) The Modern Vernacular Literature of Hindustan - George Abraham Grierson
३) हिंदी साहित्य का इतिहास : आर्चाय राम चन्द्र शुक्ल
४) हिंदी साहित्य - डा धीरेन्द्र वर्मा
५) हिंदी साहित्य का आदिकाल - हजारी प्रसाद दिवेदी
६ ) केन्द्रीय हिंदी निदेशालय 

1 टिप्पणी:

  1. विकास जी !
    रूचिपूर्ण जानकारी के लिए धन्यवाद|
    यहाँ कुछ तथ्य में भी रखना चाहूँगा...
    १. आज से लगभग २५०० साल पूर्व भारत में पाली, प्राकृत और संस्कृत भाषाए प्रचलित थी|
    २. वैदिक, जैन एवं बौद्ध शास्त्र प्रचुर मात्रा में इन तीनों भाषाओं में मिल जाते है| लेकिन उस वक़्त तक 'हिंदी' रूप में कोई अलग भाषा प्रचलित नहीं थी|
    ३. संस्कृत का प्रयोग जहा मनीषी किया करते थे वहीँ प्राकृत और पली जन सामान्य की भाषा रही है|
    ४. भारतेंदु के काल तक कहीं भी हिंदी एक संगठित रूप में उभरती हुई नहीं दिखती|
    ५. उससे पूर्व अवधी, राजस्थानी, मैथिलि इत्यादि भाषाओं में साहित्य उपलब्ध है पर उनमें से किसी को भी मात्र हिंदी साहित्य नहीं कहा जा सकता|

    अतः यदि हम यह माने की हिंदी विविध भाषाओं से मिल कर उभरी एक नूतन भाषा है जो कई भाषीय लोगो कि चाहे उर्दू, राजश्तानी , बिहारी, अवधि इत्यादी को जोड़ती है| अतः हमें इसे राष्ट्र भाषा/ राजभाषा का दर्जा देना चाहिए तो यहाँ उचित होगा|

    यदि यह कहा जाए कि हिंदी का उदभव ,इतिहास या साहित्य अन्य भाषाओं से अधिक समृद्ध और प्राचीन है, अतः इसे राष्ट्र भाषा मना जाए तो या तर्क सही नहीं लगता |

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