बुधवार, 24 दिसंबर 2014

Online लेखन प्रतियोगिता

नियम बड़े ही सरल हैं। नीचे दिए गए चित्र को देख आपको जो भी महसूस हो, उसे कागज़ पर उतार दें। लेख की लंबाई पर कोई रोक - टोक नहीं है।




11:59 pm, 2 जनवरी से पहले अपनी प्रविष्टी iitbwriteup@gmail.com पर अवश्य भेज दें। प्रत्येक प्रतियोगी की केवल एक प्रविष्टी को ही मान दिया जाएगा। 

दो सर्वोत्तम प्रविष्टियों को 500/- रुपये प्रति विजेता का नकद इनाम दिया जाएगा।   

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये

-दुष्यंत कुमार


कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये,
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये। 

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है,
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये। 

न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे,
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये। 

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही,
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये। 

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता,
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये। 

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये। 


मयस्सर = उपलब्ध
मुतमईन = संतुष्ट
मुनासिब = ठीक

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

 धर्मेन्द्र  कुमार धीर  ' धरम '  जी निसंदेह ही संस्थान के अग्रणी कवि में से एक है . उर्दू और हिंदी साहित्य में गहरी समझ और शौक रखने वाले  'धरम' जी की  रचनायों में  परिपक्वता और भाषा में उत्कृष्टा काबिलेतारीफ है . आज वाणी के ब्लॉग पर पेश है 'धरम' जी की कुछ उम्दा ग़ज़ले

वक़्त से आगे

मैं जो वक़्त से आगे निकलना चाह रहा था  
हर ओर दीवारें थी न कोई राह मिल रहा था

सारे राहगर मुझसे कब के पीछे छूट गए थे
वक़्त राक्षश के मानिंद आग उगल रहा था

बहुत दूर पर वहां देखा पत्थर पिघल रहा था
मानव बनकर दानव कुछ और उबल रहा था

बारिश में शबनम के साथ शोला गिर रहा था
खेत कभी खिल रहा था तो कभी जल रहा था

पूनम की चांदनी का रंग काला पड़ गया था
औ" अँधेरे में तो सबको सबकुछ दिख रहा था


चंद शेर

1.

तेरे शक्ल का नक़ाब लिए मैं खुद मारा फिरता हूँ
तेरे दुश्मन की गली में मैं यूँ ही आवारा फिरता हूँ

2.

ऐे गर्द-ए-सफर तेरा शुक्रिया
उसके गली की एक निशानी तो साथ है

3.

न जाने किस चमन की खुशबू फैली है मेरी ज़िंदगी में "धरम"
जो सिमट गई तो बिखर गई औ" जो बिखर गई तो सिमट गई

4.

ज़िंदगी कितनी नमकीन है तब पता चलता है
जब सारा मिठास बनकर पसीना बह जाता है

5.

कुछ दर्द मुझसे उधार लो तुम अपनी ज़िंदगी सँवार लो
कुछ ख़ुशी मुझको उधार दो मैं अपनी ज़िंदगी सँवार लूँ

6.

ये कैसी महफ़िल है कि यहाँ हर चेहरा अजनबी है
बस मैं एक फ़क़ीर हूँ और बाकी सब रियासती है

फिर से गुजार लूँ

गुज़रे वक़्त को मैं फिर से गुजार लूँ
बस की आ मेरी जाँ मैं तुमको सँवार लूँ

पा कर तेरी झलक मैं चेहरा निखार लूँ
औ' अपने दिल में तेरी तस्वीर उतार लूँ

रखकर हाथों में तेरा हाथ मैं तुझसे क़रार लूँ
तुम अपनी आदत सुधारो मैं अपनी सुधार लूँ

गिले-शिकवे की बातें बस अभी ही बिसार लूँ
मोहब्बत में न तो तुम उधार लो न मैं उधार लूँ

बुधवार, 9 जुलाई 2014

सदाबहार गीत -संगीत

कवितायेँ पढ़ पढ़  कर थोड़ा बोर हो गए ? तो आज पेश है आपके लिए कुछ बेहतरीन गाने आला दर्ज़ की लिरिक्स के साथ ! गाने भी बुनियादी तौर पर  कविता या ग़ज़ल ही होते है ,कुछ पेचदिगियों के साथ , मसलन गानो में तुकबन्दी आवश्यक  होती है। तो देर किस बात की , सुनिये साहिर लुधियानवी , गुलज़ार , प्रसून जोशी , अमिताभ भटटचार्य सरीके गीतकारों की कलम से निकले हुए ये लाजवाब गाने !

1.) Main pal do pal ka shaayar hun / मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी      कहानी हैं .


मैं पल दो पल का शायर हूँ, पल दो पल मेरी कहानी हैं
पल दो पल मेरी हस्ती है, पल दो पल मेरी जवानी हैं

मुझ से पहले कितने शायर, आये और आकर चले गए
कुछ आहे भर कर लौट गए, कुछ नग्में गा कर चले गए
वो भी एक पल का किस्सा थे, मैं भी एक पल का किस्सा हूँ
कल तुम से जुदा हो जाऊंगा, वो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ

कल और आयेंगे, नग्मों की खिलती कलियाँ चुननेवाले
मुझ से बेहतर कहनेवाले, तुम से बेहतर सुननेवाले
कल कोई मुझको याद करे, क्यों कोई मुझको याद करे
मसरूफ ज़माना मेरे लिए, क्यों वक्त अपना बरबाद करे

जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला
हमने तो जब कलियाँ माँगी काँटों का हार मिला

खुशियों की मंज़िल ढूँढी तो ग़म की गर्द मिली
चाहत के नग़मे चाहे तो आहें सर्द मिली
दिल के बोझ को दूना कर गया जो ग़मखार मिला
हमने तो जब...

बिछड़ गया हर साथी देकर पल दो पल का साथ
किसको फ़ुरसत है जो थामे दीवानों का हाथ
हमको अपना साया तक अक्सर बेज़ार मिला
हमने तो जब...

इसको ही जीना कहते हैं तो यूँ ही जी लेंगे
उफ़ न करेंगे लब सी लेंगे आँसू पी लेंगे
ग़म से अब घबराना कैसा, ग़म सौ बार मिला
हमने तो जब...




3.) आगे भी जाने न तू (वक्त -1965) Aage bhi jane na tu (Waqt-1965) 


आगे  भी जाने न तू,  पीछे भी जाने न तू
जो भी है बस इक यही पल है ..

अनजाने सायों का राहों में डेरा  है
अनदेखी ने हम सब को घेरा है
ये पल उजाला है बाकी अँधेरा है
ये पल गंवाना ना ये पल ही तेरा है
जीने वाले सोच ले, यही वक्त है,  कर ले पूरी आरज़ू
आगे  भी जाने न तू,  पीछे भी जाने न तू
जो भी है बस इक यही पल है ..

इस पल के जलवों ने महफ़िल संवारी  है
इस पल की गर्मी ने धड़कन उभारी है
इस पल के होने से दुनिया हमारी है
ये पल जो देखो तो सदियों पे भारी है
जीने वाले सोच ले यही वक्त है,  कर ले पूरी आरज़ू
आगे  भी जाने न तू,  पीछे भी जाने न तू
जो भी है बस इक यही पल है ..

इस पल के साए में अपना ठिकाना है
इस पल के आगे हर शै फ़साना है
कल किसने देखा है, कल किसने जाना है
इस पल से पायेगा जो तुझको पाना है
जीने वाले सोच ले यही वक्त है,  कर ले पूरी आरज़ू
आगे  भी जाने न तू,  पीछे भी जाने न तू
जो भी है बस इक यही पल है ..


4.) रु-ब-रु (Robaroo)
सितार में बदल गया
रु-ब-रु रोशनी हे - 2

(धुआँ छटा खुला गगन मेरा
नयी डगर नया सफ़र मेरा
जो बन सके तू हमसफ़र मेरा
नज़र मिला ज़रा) - 2

आँधियों से झगड़ रही है लौ मेरी
अब मशालों सी बढ़ रही है लौ मेरी
नामो निशान रहे ना रहे
ये कारवाँ रहे ना रहे
उजाले में पी गया
रोशन हुआ जी गया
क्यों सहते रहे
रु-ब-रु रोशनी  हे - 2

धुआँ छटा खुला गगन मेरा
नयी डगर नया सफ़र मेरा
जो बन सके तू हमसफ़र मेरा
नज़र मिला ज़रा
रु-ब-रु रोशनी  हे - 2
ए साला - 4
ए साला
अभी अभी हुआ यक़ीन की आग है मुझ में कही
हुई सुबाह मैं चल गया
सूरज को मैं निगल गया
रु-ब-रु रोशनी हे - 2

जो गुमशुदा-सा ख्वाब था
वो मिल गया वो खिल गया
वो लोहा था पिघल गया
खिंचा खिंचा मचल गया


5.) Tu Bin Bataye Mujhe Le Chal Kahi / तू बीन बतायें मुझे ले चल कहीं

तू बीन बतायें मुझे ले चल कहीं
जहां तू मुस्कूरायें मेरी मंझिल वहीं

मिठी लगी, चख के देखी अभी
मिश्री की डली, जिंदगी हो चली
जहां हैं तेरी बाहें, मेरा साहील वहीं

मन की गली तू पुहारों सी आ
भीग जायें मेरे ख्वाबों का काफिला
जिसे तू गुनगुनायें मेरी धून हैं वहीं

6.) आज़ादियाँ - Aazaadiyan 

पैरों की बेड़ियाँ ख्वाबों को बांधे नहीं रे, कभी नहीं रे मिट्टी की परतों को नन्हे से अंकुर भी चीरे, धीरे-धीरे इरादे हरे-भरे, जिनके सीनों में घर करे वो दिल की सुने, करे, ना डरे, ना डरे सुबह की किरनों को रोकें, जो सलाखें है कहाँ जो खयालों पे पहरे डाले वो आँखें है कहाँ पर खुलने की देरी है परिंदे उड़ के चूमेंगे आसमां आसमां आसमां आज़ादियाँ, आज़ादियाँ मांगे न कभी, मिले, मिले, मिले आज़ादियाँ, आज़ादियाँ जो छीने वही, जी ले, जी ले, जी ले सुबह की किरनों... कहानी ख़तम है या शुरुआत होने को है सुबह नयी है ये या फिर रात होने को है आने वाला वक़्त देगा पनाहें या फिर से मिलेंगे दो राहें खबर क्या, क्या पता

7.) नाव - Naav

चढ़ती लहरें लांघ न पाए क्यूँ हांफती सी नाव है तेरी तिनका-तिनका जोड़ ले सांसें क्यूँ हांफती सी... उलटी बहती धार है बैरी के अब कुछ कर जा रे बंधू जिगर जुटा के पाल बाँध ले, है बात ठहरी जान (शान) पे तेरी, हैय्या हो की तान साध ले, जो बात ठहरी जान (शान) पे तेरी, चल जीत-जीत लहरा जा, परचम तू लाल फहरा जा, अब कर जा तू या मर जा, कर ले तैयारी, उड़ जा बन के धूप का पंछी, छुड़ा के गहरी छाँव अँधेरी, छाँव अँधेरी, तिनका-तिनका जोड़... रख देगा झंकझोर के तुझे, तूफानों का घोर है डेरा, भंवर से डर जो हार मान ले, काहे का फिर जोर है तेरा, है दिल में रौशनी तेरे, तू चीर डाल सब घेरे, लहरों की गर्दन कसके डाल फंदे रे, कि दरिया बोले वाह रे पंथी, सर आँखों पे नाव है तेरी चढ़ती लहरें लांघ...

रविवार, 29 जून 2014

अस्तोदय_की_वीणा

श्री रामनरेश त्रिपाठी की उल्लेखनीय काव्य कृति " मानसी"  की अविस्मरणीय रचना "अस्तोदय की वीणा"  जो अति सरलतापूर्ण तरीके से प्रकृति के उदहारण देकर दे जाती आपकी रगों में जोश, कुछ कर गुजरने का। 

बाजे अस्तोदय की वीणा--क्षण-क्षण गगनांगण में रे।
   हुआ प्रभात छिप गए तारे,
   संध्या हुई भानु भी हारे,
यह उत्थान पतन है व्यापक प्रति कण-कण में रे॥
  ह्रास-विकास विलोक इंदु में, 
  बिंदु सिन्धु में सिन्धु बिंदु में,
कुछ भी है थिर नहीं जगत के संघर्षण में रे॥
  ऐसी ही गति तेरी होगी, 
  निश्चित है क्यों देरी होगी,
गाफ़िल तू क्यों है विनाश के आकर्षण में रे॥ 
  निश्चय करके फिर न ठहर तू, 
  तन रहते प्रण पूरण कर तू,
विजयी बनकर क्यों न रहे तू जीवन-रण में रे?

शनिवार, 28 जून 2014

सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी

Q1.


कौन - सी दो भाषाओँ के  नाम छिपे हुए  हैं ?
Q2.

इस भाषण के वक्ता कौन हैं और यह कहाँ पर दिया गया था ? यह भाषण यादगार क्यों है ?

Q3. X का जन्म सन् 1934 में नैनीताल में हुआ था । मेरठ कॉलेज से B.Sc. करने के बाद, इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्याला से अपनी M.Sc. और Ph.D. की डिग्रियाँ हासिल कीं । यह अपना भौतिकी का शोध पत्र हिंदी में लिखने वाले पहले इंसान थे । बाद में जाकर यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्य अंग और देश के मानव संसाधन मंत्री भी बने ।  
X कौन हैं ?
Q4.

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कौन से शब्द छुपे हुए हैं ? सिर्फ एकदम सटीक उत्तर ही मान्य होगा ।


Q5.


 किस कंपनी के विज्ञापन के बोल हैं यह ?

शुक्रवार, 27 जून 2014

आग जलती रहे

दुष्यंत कुमार की प्रसिद्ध कविता 'आग जलती रहे' ; जिंदगी में कितने ही संघर्ष भरे दिन आते हैं , कितने ही अग्नि परीक्षाओं में हमें सफल होना पड़ता है , परन्तु सफलता हमारे कदमों में तभी शरण लेती है जब तक सही वक़्त नहीं आता , इंसान की सोई हुई चेतना नहीं जागती !

एक तीखी आँच ने
इस जन्म का हर पल छुआ,
आता हुआ दिन छुआ
हाथों से गुजरता कल छुआ
हर बीज, अँकुआ, पेड़-पौधा,
फूल-पत्ती, फल छुआ
जो मुझे छुने चली
हर उस हवा का आँचल छुआ
प्रहर कोई भी नहीं बीता अछुता...
आग के संपर्क से
दिवस, मासों और वर्षों के कड़ाहों में
मैं उबलता रहा पानी-सा
परे हर तर्क से
एक चौथाई उमर
यों खौलते बीती बिना अवकाश
सुख कहाँ
यों भाप बन-बन कर चुका,
रीता, भटकता
छानता आकाश
आह! कैसा कठिन
कैसा पोच मेरा भाग!
आग चारों और मेरे
आग केवल भाग!
सुख नहीं यों खौलने में सुख नहीं कोई,
पर अभी जागी नहीं वह चेतना सोई,
वह, समय की प्रतीक्षा में है, जगेगी आप
ज्यों कि लहराती हुई ढकने उठाती भाप!
अभी तो यह आग जलती रहे, जलती रहे
जिंदगी यों ही कड़ाहों में उबलती रहे ।

गुरुवार, 26 जून 2014

Dimag Lagai Sasura #1




घर / इंस्टी में बैठे बैठे बोर हो रहे है ? क्या आपको ऐसे सवाल अच्छे लगते है जो आपके दिमाग के पुर्ज पुर्जे को हरकत में ला दे ? क्या आप दिमागी  मेहनत करके अपने समय का सदुपयोग करना चाहते है ? तो फिर आप सही पोस्ट पढ़ रहे है , पेश है आप के लिए कुछ सवाल।  इन प्रश्नो का उत्तर आप कमेंट बॉक्स में किसी भी भाषा में  दे सकते है।

1    पृथ्वी पर  ऐसी खास जगह मौजूद है जहाँ अगर आप एक मील दक्षिण चलने के बाद एक मील पूर्व  चले और फिर एक मील उत्तर चले तो आप अपने आप को उसी जगह पाएंगे जहाँ से आपने अपनी यात्रा आरम्भ की थी !! क्या आप ऐसी जगह के बारे में सोच सकते है ? क्या ऐसी एक  से ज्यादा जगह हो सकती है?


2     आप एक सड़क जंक्शन  पर हो , एक रास्ता आपको  गंतव्य  तक  ले जाता है जबकि दूसरा एक ऐसी जगह जहाँ आपका मरना निश्चित है। जक्शन पर तीन लोग मौजूद है एक सदैव सत्य बोलता है , एक हमेशा झूठ बोलता है और एक झूठ और हकीकत के बीच बारी  बारी से झूलता है। लेकिन ज़ाहिर है आपको नहीं मालूम की  कौन सा व्यक्ति क्या है (सच्चा , झूठा )  . आप रास्ते  का पता लगाने के लिए २ प्रश्न पूछ सकते है , आप क्या पूछेंगे ?


3    १०० चींटियाँ एक आयामी सतह ( १ डिमेन्शंसनल प्लेन )  पर आगे बढ़ रही है।  सभी एक ही गति से  चल रही है , कुछ पॉजिटिव x एक्सिस तरफ तो कुछ नेगेटिव x एक्सिस तरफ। एक टक्कर दो चींटियों के बीच होता है तो दोनों चींटियों की  दिशा बदल जाती है। अगर आप को प्रत्येक चींटी की चलने की दिशा मालूम है तो आप किस प्रकार टकराव की संख्या की गणना कर सकते है ?


4    एक  मेज़ पर १०० सिक्के मौजूद हैं, जिन्हेँ  अगर ऊपर की ओर से देखें तो ५० सिक्के हेड फेस  कर रहे है और बाकी ५० टेल फेस  कर  रहे है। आप  की आँखों  पर पट्टी बंधी है  और आप  किसी  भी  तरीके से , मसलन रगड़कर इत्यादि , सिक्के की स्तिथि को ज्ञात  नहीं  कर सकते। आपको इन १०० सिक्को  को २ हिस्सों में इस प्रकार विभाजित करना है की  दोनों  हिस्सों में टेल फेस करने वाले सिक्कों  की संख्या बराबर हो।

बुधवार, 25 जून 2014

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद

राष्ट्रकवि की उपाधि से सम्मानित रामधारी सिंह 'दिनकर' की एक अद्भुत कविता : 'रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद' । जीवन की अनेक दृष्टियोँ को ध्यान मेँ रखकर इस कविता को पढ़ने से कई सत्य एवं लक्ष्य सामने आते हैँ। कितनी खूबसूरती के साथ दिनकर जी ने मानव के भावों एवं स्वप्नों का इस कविता में वर्णन किया है :

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव है ।
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।
जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते ।
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।
आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज उठता और कल फिर फूट जाता है ।
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।
मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी,
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?
मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ ।
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ ।
मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है ।
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।
स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे ।
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।

सोमवार, 23 जून 2014


Dialogue kyun maar rahe ho, yaar?

निम्नलिखित चित्रों के अनुकूल बॉलीवुड के प्रचलित dialogues सोचें और iitbvaaniblog@gmail.com पर हमें भेज दें । समय - समय पर हर पहेली के विजेताओं की घोषणा की जाएगी ।

1)

2) 

3) 

4) 

5) 

6) 

7) 

8)