शायरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शायरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 13 जनवरी 2013

लोग...




जब खुद के बैठने का ठौर हो जाये
तो दुसरे के घर यूँ ही जला देते है लोग

जिंदगी में जिसने बस इज्ज़त कमाई
उसकी इज्ज़त कौड़ियों में बेच देते है लोग

यतीम जान जिन पर कभी करम किया
मुझे देख अब आँखें चुरा लेते है ये लोग

ख़ुश हूँ मै लेकिन हरदम ये भी मुनासिब नहीं
ग़म छुपाने के लिए भी मुस्करा लेते है कुछ लोग ।।


                                                  ---------- विकास पाण्डेय 

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

रस्ते

ताकते उनकी राह , इतना वक़्त गुजरा था
कि परिंदे भी मुझ ताक रस्ते पता करते थे ||

शनिवार, 29 सितंबर 2012

शेर

वो हालातों के आगे डर गयी..
अपना प्यार खुद ही रुसवा कर गयी ...
बनी थी मंजिल मेरी कश्ती की वो
मुझको ही तूफानों के हवाले कर गयी...

-श्याम सुन्दर 

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

ज़िंदगी और मौत


वो ज़िंदगी ही क्या जो किसी के काम ना आए...
                  वो मौत ही क्या जो अख़बार मैं ना आए...
                                                   - निखिल शर्मा

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

एक मुलाक़ात मेरी मुझ से ......

       
            
होठों को गुनगुनाने को मिल गये हों तराने जैसे ...
आप ही बतियाने को मिल गये हों चंद अलफ़ाज़ जैसे ...
फुर्सत के कुछ पल बिताने को मिल गये हो जैसे....
बरबस ही खिलखिलाने सा लगा मन आजकल जैसे....
कोई अधूरी ख्वाहिशें हों गयी हों मुक्कमल जैसे....
बादलों के साथ कहकहे लगाने को दिल करे जैसे....
वक़्त की दौड़ में खुद को ही मिल गयी हूँ जैसे....
ज़िन्दगी से ज़िन्दगी की मुलाक़ात हुई हो जैसे....
मुद्दतों बाद इत्मीनान से कुछ बात हुई हो जैसे.....
दिल लगा हो खुद की ही उधेड़बुन में जैसे
किसी मीठी सी प्यारी सी कोशिश में हो जैसे.....
न हो कोई रुकावटें ,न ही दीवारें ....बस ऐसा ही एक खुला आसमाँ हो जैसे .....
मदमस्त होकर यूं ही उडती रहूँ में ....
अपने ही एक शहर में ....अपनी ही एक डगर पर.....चलती रहूँ मैं.....
छेड़ दिए हों सुर साज़ के किसी ने मानों.....
अपने आप से ही सवाल कर रही हूँ मैं......
तो कभी खुद से ही दे रही हूँ जवाब जैसे.....
जब सजे दिल की महफ़िल तो क्या हो ज़िक्र गम का......
जब थिरक उठे मन बिना घुंघरुओं के.....
तो इसे आँखों के बक्से में कैद कर लूँ जैसे.......
कि न जाने दूँ इन्हें अपने से दूर जैसे......
एक पल तो खौफ ने जकड़ने की कोशिश की मुझे....
कहीं एक ख्वाब तो नहीं.....
पर दी दस्तक मेरे मन पर
एक प्यारे से एहसास ने .....
क्यूँकी खुशियाँ कुछ तेरे हिस्से में हैं गर.....
तो एक हिस्सा मेरा भी है.....:)
तो कुछ ऐसे ही इक हुई नन्ही सी मुलाक़ात मेरी 'मुझ' से .....
कि मेरी कलम भी बहने लगी हो पानी के जैसे....
चलिए....मिलते हैं कभी और मुस्कुराते हैं ऐसे......:):)
 

 

 


शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

ख़ामोशी

खामोशियाँ है आज खामोशियाँ ही रहने दो,
दुःख की नदी को चुप चाप बहने दो,
मै आज डूब भी जाऊं तो किसको फ़िक्र है,
यह शमा मत बुझाओ मदहोशियाँ ही रहने दो..||

जो ख्वाब देखा कल उससे खवाब रहने दो..
हम पागल ही सही दुनिया को होशियार रहने दो...||
                               -अंकित  यादव 

रविवार, 9 सितंबर 2012

गर मिलने का मन हो तुम्हारा



गर मिलने का मन हो तुम्हारा

गर मिलने का मन हो तुम्हारा , तो कुछ 'वक्त' भी साथ ले आना….
यूँ हड़बड़ी में मुलाकात 'अधूरी' रह जाती है !

होती तो है ‘गुफ्तगू’, पर जो कहनी होती है बात ‘खास’ …… 'वो बात' अधूरी रह जाती है !
यूँ हड़बड़ी में मुलाकात अधूरी रह जाती है!!

होती तो हैं बरसातें हर रोज यहाँ , पर भिगो दे जो प्यासे मन को ….. 'वो बरसात' अधूरी रह जाती है !
यूँ हड़बड़ी में मुलाकात अधूरी रह जाती है!!

आती हैं रातें खुद में डुबाने को , पर जिस रात न आये तू ख्वाबों में...… मेरी तो 'वो हर रात' अधूरी रह जाती है !
यूँ हड़बड़ी में मुलाकात अधूरी रह जाती है!!

मज़ा तो आता है तेरे संग, उन संजीदा बातों में भी, पर मन में होती जो खुराफात....... 'वो खुराफात' अधूरी रह जाती है !
यूँ हड़बड़ी में……. मुलाकात...  अधूरी रह जाती है!


……………. शक्ति शर्मा

तौफीक

तेरे इश्क और हुस्न की तौफीक किसे थी
मै मुफ्लिशी मे था जो इश्क कर बैठा था ||

इकरार-ए-मोह्हबत

न किया कर मुझसे हरदफा इकरार-ए-मोह्हबत
मै ऐसा परवाना हूँ जो एक बार ही जल सकता हूँ

शनिवार, 1 सितंबर 2012

अज़ाब

ये अज़ाब दिल से कभी महरूम हुआ नही,
ये पंछी कभी खुली हवा मैं उड़ा नही,
अब तो आसू भी आखो से बहते नही,
क्योंकि खुशी और गम का फ़र्क दिल ने महसूस किया ही नही

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

फूल




फूल खुबसूरत होके धोखा दे जाते है
काटें बेचारे नीव होके भी गाली खाते है
और कुदरत का खेल तो देखो दोस्त
फूल शबनम बन जाते है ,काटें काटें ही रह जाते है
~ विकास पांडे

सोमवार, 30 जुलाई 2012

एक शेर

एक शेर मेरी पुरानी किताब से :-

हज़ार हसरतें हैं गुमनाम सी,
हलक में रोज़ दम तोड़ने वाली .
उनकी कब्र पर यार हम 
 सजदे पेश करें तो कैसे