प्रेम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
प्रेम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 18 मई 2013

प्रत्याशा




हाँ तू है उर्वशी, मेरी निश्छल प्रेयसी,
अगणित भवरों की लिप्सा अतृप्त  कली,

क्यों है प्रथम स्नेह की अबोध संसृति,
करती मृदु मुस्कान से उर्जस्वित प्रीती ;

हो उत्प्लवन अभिलाषा नहीं संकोच मृगनयनी ,
दुर्लभ स्वप्न नहीं, है बनना संगीतमयी  सहधर्मिणी

                                                             -------------------  शिवेंद्र सिद्धार्थ "शाहबाज़"

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

मुलाकात ...




वो कल की एक मुलाकात 
एक लम्हा आज भी है वहाँ थमा हुआ
वक्त बढ़ चला 
औ मैं भी कैद उसमें 
पर नज़रों की दूसरी तरफ 
वही द्रश्य है 
मेरा ज़हाँ खुद को किये मेरे हवाले 
मौजूद है समीप ही 
वो चेहरा उसका जुस्तजू से भरा हुआ 
मुस्कान अधरों पे अश्रु छलके लिए हुए
कुछ बहके हुए ,कुछ डरे हुए

अब तो डरने लगा हूँ मैं भी
उसकी तमन्नाओं से, उसकी उमीदों से
जिस ज़हाँ में कल का भरोसा नहीं
वहीँ मेरा ज़हाँ कल में खोया हुआ है !!

                                                   
                                                      ....... शक्ति शर्मा

मोहब्बत!




मोहब्बत की बुनियाद पर तो ये मुक्कम्मल जहाँ टिका हुआ है जनाब! अब वैलेंटाइन्स डे आ रहा है तो मैंने सोचा कि चलिए कुछ हमारी गुमसुम सी कलम से भी इश्क फरमा लिया जाए!।इस दुनिया के ज़र्रे ज़र्रे में मोहब्बत घर करती है तभी तो हम सब साथ में जीते हैं .नही तो आदमी तो है ही खुदगर्ज़ अव्वल दर्जे का! बस जिस्मानी लिबास बदल जाता है मोहब्बत का ...कभी इंसान से ,कभी किसी चीज़ से ,कभी किसी पालतू जानवर से ....! पर मेरे लिए मोहब्बत के मायने शायद सब से अलग हो सकते हैं। ।मेरे लिए प्यार के तसव्वुर को सबसे पहले जो तीन शख्स सच करते हैं वो हैं मेरी माँ,पापा,और छोटी बहन ! उन्होंने हर वो चीज़ की है मेरे लिए जो वो ज्यादा से ज्यादा कर सकते हैं मेरे लिए .बदले में तो मैं क्या ही उनके लिए उतना कर पाऊं जो वो मेरे लिए करते हैं।और वैसे भी वो बदले में कुछ नही चाहते क्यूँकी यही तो प्यार की परिभाषा है और प्यार की ,अपनेपन की पहली सीख तो वहीँ से मिलती है न!सच्चे प्यार में चाहे खुद को तकलीफ हो जाए पर अगर उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ सके तो प्यार के मायने पूरे हो गये . सच मानिए तो प्यार की पहली सीढ़ी विश्वास है,इतना भरोसा कि एक बार खुद पर शक हो सकता है पर उसपर नही! क्यूंकि वो आपको इतना जानता है कि आपसे बेहतर उसे पता होगा कि कहाँ आपके कदम डगमगायेंगे ! उसकी रग़ रग़ से आप वाकिफ हों ....तो लफ़्ज़ों की कोई ज़रुरत ही नही।क्यूंकि दिल की गहराईओं की पुकारों को सुनने के लिए आपको बाहर के शोर को तो कम करना होगा न! कहते हैं जो बातें जुबां से नही कही जा सकतीं वो ये कम्बख्त आखें बखूबी कह डालती हैं ...कमबख्त इसलिए क्यूंकि जब आप कुछ छुपाना चाहें तो भी नही देती ये .जब आप किसी से दिलों जान से मोहब्बत करते हैं तो आप खुदगर्ज़ नही हो सकते ....आप सिर्फ आप दोनों के बारे में ही नही सोच सकते ..आप परिवार के खिलाफ जाकर उनकी दुआओं के बिना आगे नही बढ़ सकते ....हाँ अगर वो नही समझते तब और बात है पर तब भी उनके साथ मशविरा करके ....उन्हें समझाकर उनके आशीर्वाद के बरगद तले अपना प्यार का आशियाँ बनाइये !....कहते हैं जब हम किसी से बेइन्तहा मोहब्बत करते हैं तो हम जाने अनजाने सबसे ज्यादा उसे ही तकलीफ भी देते हैं ....ये एक दम सही भी है क्यूंकि कहीं न कहीं यही वह शख्स है जिस के सामने आप जी भर के रो सकते हैं ,गुस्सा निकाल सकते हैं, पर उसकी तकलीफ की मरहम भी तो आप ही बन सकते हैं! शायद इन फिल्मों ने जो तस्वीर प्यार की दिखाई है,उससे आजकल की पीढ़ी के हम लोगों में से ज्यादातर दिखावे के लिए गर्लफ्रेंडऔर बॉयफ्रेंड बनाते हैं ..और कब तक निभायेंगे इसका भी कोई ठिकाना नहीं .... हम उसे ही प्यार मान बैठते हैं .शरीर से कहीं ऊपर उठकर दो आत्माओं का संगम है सच्चे प्यार का ये रिश्ता.वो रिश्ता जो एक बार जुड़ गया तो ताउम्र निभाने का है।
सिर्फ मोमबत्तियों की रोशनी ,खूबसूरत फूलों की खुशबू ,चॉकलेट्स या रोमांटिक म्यूजिक ही माहौल को रूमानी बनाने के लिए काफी नही ....अक्सर लड़कियां इस मामले में काफी परियों की दुनियां में रहती हैं।तो शायद लड़कों को भी लगता है कि इन सब चीज़ों से वो इम्प्रेस हो जाएंगी पर ...अगर ये न हो तो लगता है कितना अनरोमांटिक है ये ! पर इन सबसे बढ़कर प्यार का हर लम्हा ख़ास होता है ....शायद ये सब चीज़ें उन्हें और ख़ास बना दें ..! अपने साथी का आप उसके बुरे और अच्छे हर पल में बखूबी साथ निभाएं ....अगर कुछ खोने के लिए है तो आपका इगो .जो काफी मुश्किल है ....जो आपको एक दूसरे से दूर कर सकता है ....जो आपके सबसे करीब होता या होती है वो चाहे आपका कितना भी मज़ाक उड़ा ले ...कितना ही आपको टीज़ करे ....पर ज़रुरत पड़ने पर आपके लिए अपनी जान भी पेश कर सकते हैं .....खैर इससे याद आया कहीं पढ़ा था मैंने ...एक बार एक पत्नी ने बिलकुल रूखे से ...अनरोमांटिक पति से पूछा कि क्या आप उस पहाड़ी पर जाकर वो बेशकीमती फूल ले आयेंगे जिसके बारे में मुझे और आपको दोनों को पता है कि आप जिंदा वापस शायद ही आ पाएंगे ...तो पति बोले कि मैं इसका जवाब सुबह दूंगा ...उनकी सारी रात करवटों में गुज़री ....सुबह एक दूध के गिलास के नीचे दबे कागज़ के छोटे से टुकड़े पर जो लिखा था वो पढके उसकी आँखों से आंसुओं का जो सैलाब उमड़ा ...वो पूरी कहानी आप ही कह गया ....उसमें लिखा था .....क्यूँ उसका जिंदा रहना उसकी ज़रुरत ही नही दिली ख्वाहिश भी है क्यूंकि वो जब तक नही मर सकता जब तक वो यह पक्का न कर सके कि इस जहाँ में उससे भी ज्यादा कोई उसे प्यार ,उसकी फिक्र,देखभाल कर सकता है !...

पर इस प्यार और एह्तियाना बर्ताव के चक्कर में अगर कहीं औरत के स्वाभिमान ,उसकी आज़ादी के साथ कोई आदमी खेलता है तो वो बेशक झूठा या कुछ दिनों का दिखावटी प्यार है ....क्यूंकि विश्वास के बाद अपने साथी की ,उसके उसूलों की ,उसके ज़ज्बातों की इज्ज़त सबसे बड़ी चीज़ होती है . मनोवैज्ञानिक तौर पर भी सिद्ध हो चुका है कि जब एक औरत प्यार करती है तो अपना सब कुछ देकर भी उसे निभाती है पर ...आदमी को उसका ,उसके प्यार का ज्यादा इम्तेहान नही लेना चाहिए नही तो वो अगर चीज़ों को जोड़ना जानती है तो उसके गुस्से से भी आपको कोई नही बचा सकता ....मर्द होने का दंभ ज्यादा देर तक किसी रिश्ते में आड़े न ही आये तो बेहतर होगा ! 

तो वैलेंटाइन्स डे भले ही पाश्चात्य संस्कृति से आया हो पर प्रेम की सच्ची और सर्वोत्कृष्ट परिभाषा तो हमारी धरती पर कृष्ण और राधा ने ही दी थी ... शायद पश्चिम का अनुसरण करने के कारण आज हर तरफ इसका विरोध किया जाता है ...पर कहते हैं प्रेम सबसे अनुभूति है इस दुनिया की !..मनुष्य मात्र से प्रेम, प्रकृति से प्रेम या फिर किसी 'ख़ास ' से !
                                        
                                                                      ----------- स्पर्श चौधरी 

रविवार, 4 नवंबर 2012

"वाणी में अमृत भर दे माँ "

जीवन में इतना कर दे माँ ,वाणी में अमृत भर दे माँ !

बीज डाले थे तूने जो रस के,उन बीजों को अंकुर कर दे माँ !

वाणी में अमृत भर दे माँ !

नए पुष्पों की बगिया सुन्दर ,वाणी होवे ज्ञान समुंदर !

हिन्द गुलिस्तां गुल खिल जाये ,इत्र सुगन्धित सात समुंदर !

नए फागुन का नया सवेरा ,भारतवर्ष में कर दे माँ !

वाणी में अमृत भर दे माँ !



माँ !बचपन को याद दिला दे,असली बचपन क्या है !

बाल - सुलभ सब खेल कहाँ गए ,क्यों नित सकुचाती त्रिज्या है ?
वो जल बरसा दे जिसमे ,कागज की किस्ती चल दे माँ !

वाणी में अमृत भर दे माँ !

क्यों है इतना शोर हो रहा है ,नहीं सुनाई कुछ देता !

नन्ही बेटी की मृदु वाणी को ,कुचल ज़माना क्यों देता ?

उस प्यारे -से भोलेपन का ,अब उजियारा कर दे माँ !

वाणी में अमृत भर दे माँ !

चंचल पंछी उड़ते जाना ,आज खबर फैलाना है !

बिन करुणा रोती करुणा को ,करुणा से सहलाना है !

वीणा की इक तान छेड़ दे ,सुर का झरना झर दे माँ !

वाणी में अमृत भर दे माँ !

                                 -परमानंद 

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

पापा

पापा के नाम....ये कविता!

ये टुकुर टुकुर क्या देखती हो?
अच्छा चलो, एक खेल खेलते हैं...तुम मझे देखती रहो, मैं तुम्हे...
और इन काली बड़ी आँखों में तुम्हारी, खो जाऊं मैं.....
अरे! तुम तो हँसने ही लगी..बदमाश!!

इन किलकारियों पर तो जान न्योछावर मेरी..
एक तरफ है दुनिया, और दूसरी तरफ तुम्हारा ये चेहरा ...
लगता है सब छोड़-छाड़ के, बीएस तुम्हे ही देखता रहूँ दिन भर...
या फिर इस पल को सदा के लिए थाम लूँ..

तुम्हे पता है, तुम्हारे ये गोल-मटोल गाल मेरे जैसे हैं..
और बड़ी बड़ी ये आँखें बिलकुल तुम्हारी माँ जैसे....
उफ्फोह...अब अंगूठा निकाल भी लो मुँह से..
भूख लगी है तो बताओ न!....दूध कि बोतल यहीं तो है..

अब चलो, सोने का वक़्त है..
आ जाओ मेरे सीने में, लोरी सुनाता हूँ तुम्हे...राजकुमारी वाली!
और जब मैं चला जाऊं, माँ को ज्यादा परेशान मत करना...समझी!
अब आराम करो, शाम को फिर से खेलेंगे...सो जाओ राजकुमारी......सो जाओ....

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

तरुणि-सौन्दर्य

खुले निहारे,बंद निहारे,यहाँ निहारे,वहाँ निहारे,बस मे नाही नैन हमारे!
तुम-सी मोहनी मूरत रच के , विधि ने अपने हाथ संवारे !
केश ललित काले घुंघराले, पवन-वेग मे मतवाले !
सागर की मौजो के जैसे, लेत लहरिया भर किलकारे!
नूर भरा निष्कलंक-स्वच्छ-जल सम, नैनो के 'मान-सरोवर' मे!
रति-पनिहारिन जल भरती नित , निज यौवन की गागर मे!
कोमल कपोल मुख कमाल की पांखें , भरी प्रेम संदेशो से!
नित प्रभात मे कली चटकती,जिसकी मुस्कान के आदेशो से!
यूँ तो आँखो मे अगणित बाते,पर लब पर आता जब जीवन का सुर!
कभी चपल चिड़ियो का कलरव , कभी कोकला-कूक मधुर !
जाने-अनजाने हिरनी ने , चाल तुम्हारी पाई है!
सहज नही है रत्न जवानी,यहाँ बहुत महेंगाई है!
सम्मोहन का जादू डाला , मुझ बसंत के दीवाने पर!
तितली-सी उड़ चली हवा मे,निष्फिकर चलाती अपने पर!
सादगी के सुंदर तटबंधो से , यौवन नदी उफान भरे!
मिलन खड़ा उस पार नदी के,नित हँसी करे,नित हँसी करे!
'परमानंद' काहे बौराना , कौन तुम्हारी फिकर करे!
सुंदरता के मोल बड़े है,दिल चाह करे या आह भरे!
                                            


                                                   -परमानन्द

शनिवार, 29 सितंबर 2012

शेर

वो हालातों के आगे डर गयी..
अपना प्यार खुद ही रुसवा कर गयी ...
बनी थी मंजिल मेरी कश्ती की वो
मुझको ही तूफानों के हवाले कर गयी...

-श्याम सुन्दर 

सोमवार, 24 सितंबर 2012

वो मेरी तन्हाई थी



वहां  ना  तो  मैं  था , ना  वो  थी 
थी  तो  बस  कुछ  धुधलीं  धुधलीं   
काली  काली  परछाईयां
वैसे  जहां  भी  मैं  जाता  था 
वो  अक्सर  मेरे  साथ  होती  
और  कभी  कभी  लोगों  की  भीड़  में 
मुझे  अकेला  छोड़  जाती  थी 
वहां  भी  बस  लोगों  की  भीड़  ही  थी 
बहुत  से  अपरिचित  लोगों  की  भीड़ 
बहुत  मुश्किल  था 
खुद  से   परिचय  कर  पाना 
उसकी  जिद  पर  ही  मैं  वहां  गया 
पर  वो  खुद  आई  ही  नहीं  वहां 
शायद  उसकी  प्रकृति  ही  ऐसी  थी 
वह  डरती  थी  भीड़  से 
मुझे  भी  बहुत  डर  है 
इस  भीड़  में  खो  जाने  का 
इस  अपार  जन  समूह  में 
कुछ  गा  रहे  हैं  कुछ   रो  रहे  हैं 
कोई  जूझ  रहा  है  कोई  सो  रहा  है 
अजीब  सी  चीखें  भी  सुनाई  दी 
हर  कोई  बस  अपनी  धुन  में  था 
मैं  भी  इस  भीड़  में  
अपने  को  ही  पहचान  ना  पाया 
मुझसे  मेरा   परिचय 
करने  वाली  ही  नहीं  थी 
तभी  तो  मैं  कह  रहा  हूं 
वहां  ना  मैं  था , ना  वो  थी 

-योगेश बिचपुरिया

शनिवार, 15 सितंबर 2012

हल्की हल्की दोस्ती............


ये हल्की हल्की दोस्ती,हल्की हल्की रहने दे... 
रिमझिम,उडती बारिश में,सौंधी खुशबू बहने दे... 
अनजानापन और गहरा रिश्ता,ये दो ऊंचे पर्वत हैं... 
इनके बीच की इस डोरी पर,अहिस्ता से चलने दे... 

अपने नए लगते चेहरों में,पुरानापन ढलने दे...
गैर लगती सी आँखों में,कुछ अपनापन पढने दे...
दुनिया की दोपहर बीती,अब दोस्ती की शाम सजने दे...
हल्की हल्की दोस्ती,हल्की हल्की रहने दे॥

दूर परिंदे उड़ते हैं,जैसे आकाश की राहों में...
या एक मोती ढलता है,अपनी सीपी माँ की बाहों में...
वैसी प्यारी इन खुशियों में,तेरी दोस्ती बसने दे...
हल्की हल्की दोस्ती,हल्की हल्की रहने दे॥

गहरे रिश्तों की नगरी में,उम्मीद के बंधन होते हैं,
वो बंधन जब पूरे ना हों,नैना बरबस रोते हैं...
साथ रहें,आज़ाद रहें,वो धीमी सरगम बजने दे...
हल्की हल्की दोस्ती,हल्की हल्की रहने दे॥

तेज़ सूर्य के दिवा पुंज से,कितने जीवन बढ़ते हैं॥
चन्द्र किरण के स्नेह कुञ्ज में,नींद की चादर बुनते हैं॥
वैसे ही मन के दिन रात में,संवाद का जीवन बहने दे....
चाहे कुछ कह ले,या चुप रहकर बातें करने दे॥

रिमझिम,उडती बारिश में,सौंधी खुशबू बहने दे...
हल्की हल्की दोस्ती,हल्की हल्की रहने दे...

                                -श्रेया अग्रवाल

सापेक्ष प्रेम



नोट - मेरी एक अंग्रेज़ी कविता (जो कि कविता निजार कब्बानी की कविता 'लव कम्पेयर्ड' से प्रेरित है )
का हिन्दी अनुवाद ख्याति प्राप्त लेखक  डा॰ दुष्यन्त ने किया है । प्रस्तुत है, आप लोगों के सम्मुख !

''सापेक्ष प्रेम ''


मैं जरा भी नहीं हूं
तुम्हारे और किसी प्रेमी की तरह !

कोई और देगा तुम्हें बेशक कोई घडी
और मैं दूंगा वक्त !

वो देगा तुम्हें आंख
और मैं ख्वाब!

वो देगा तुम्हें रोशनी के घर
और मैं दूंगा हजार आफताब जगमगाते हुए !

वो देगा तुम्हें सारा का सारा समंदर
और मैं लहरें तुम्हें नौकावहन कर पार जाने के लिए!

और अगर वह देगा तुम्हें एक दिल
मैं दूंगा तुम्हें प्रेम, मेरी प्रिय !
 
- डा॰ दुष्यन्त (अनुवाद)


बुधवार, 12 सितंबर 2012

शमा और परवाने


बहुत ज़माने से “शमा और परवाने” की मोहब्बत का किस्सा मैंने सुना था…मगर हर किसी ने बस परवाने के दीवानेपन को लिखा है और हमने भी बस उसके मोहब्बत में  फ़ना हो जाने के जज्बे को जाना ..पर एक दिन यूँ ही एक महफिल में  शमा से जो कुछ गुफ्तगू हुई तो शमा के मर्म को मैंने समझा…यदि आप तक पहुंचा दूं तो समझूगा की अब कलम इतराना सीख गयी है…
मोहब्बत तो शमा को भी थी परवाने से
इसलिए तो ज़माने से जल रही थी
बस कहती न थी, मगर उस रोज़ जो उसने देखा
कि वो परवाना सारी रात जाग उसे ताकता रहा
तो उससे रहा न गया,कर दिया इज़हार-ए-मोहब्बत
कह दी दिल कि बात,और परवाने ने
जैसे ही उसे छूने को बढाया अपना हाथ
वो जलकर राख हो गया…वो जलकर राख हो गया
इंतज़ार तो किनारों को भी था लहरों का
मगर खुद को रोके हुए थे
पर उस रोज़ जो उसने देखा कि
चली आती है कोई लहर छितिज पार से
बस एक उसके चुम्बन कि ख्वाहिश लिए
तो उसने सोचा ज़रा बढ़कर थाम लूं इसे
मगर लहर के टकराते ही, लहर का
वजूद खाख हो गया…वजूद खाख हो गया
हमारी मोहब्बत को इसकी पाखियत को
जो बनाये हुए है,वो वही है
हमारे दरमियान जो थोडी दूरी है…
दिल में है बेकरारी तभी तक,
इश्क में है खुमारी तभी तक
जब तक चंद ख्वाहिशें अधूरी है…
हर मोहब्बत के आगाज़ का
अंजाम नहीं ज़रूरी है…
अंजाम नहीं ज़रूरी है…
-रोहित अग्रवाल-

रविवार, 9 सितंबर 2012

गर मिलने का मन हो तुम्हारा



गर मिलने का मन हो तुम्हारा

गर मिलने का मन हो तुम्हारा , तो कुछ 'वक्त' भी साथ ले आना….
यूँ हड़बड़ी में मुलाकात 'अधूरी' रह जाती है !

होती तो है ‘गुफ्तगू’, पर जो कहनी होती है बात ‘खास’ …… 'वो बात' अधूरी रह जाती है !
यूँ हड़बड़ी में मुलाकात अधूरी रह जाती है!!

होती तो हैं बरसातें हर रोज यहाँ , पर भिगो दे जो प्यासे मन को ….. 'वो बरसात' अधूरी रह जाती है !
यूँ हड़बड़ी में मुलाकात अधूरी रह जाती है!!

आती हैं रातें खुद में डुबाने को , पर जिस रात न आये तू ख्वाबों में...… मेरी तो 'वो हर रात' अधूरी रह जाती है !
यूँ हड़बड़ी में मुलाकात अधूरी रह जाती है!!

मज़ा तो आता है तेरे संग, उन संजीदा बातों में भी, पर मन में होती जो खुराफात....... 'वो खुराफात' अधूरी रह जाती है !
यूँ हड़बड़ी में……. मुलाकात...  अधूरी रह जाती है!


……………. शक्ति शर्मा

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

आखिरी ख़त प्यार के नाम



आखिरी ख़त प्यार के नाम
कुछ उम्र का पैमाना था , कुछ नशा था हुस्न का,
कुछ बहकने का इरादा था, आदेश था कृष्ण का,
चाहत थी मेरी भी, उन बेड़ियों को तोड़ कर उड़ जाने की,
जो कह लातीं थीं, रस्मों रिवाज़ और बंदिशें जमाने की,
पर मेरी ये आरजू दिल में ही सिमट के रह जाती,
जो मैं अपनी जिंदगी में आप से न मिल पाती,
साहस जगाया आपने, मुझमें अपने प्यार से,
समा गयी ताक़त मुझमें, लड़ने को संसार से,
शायद जगा दिया था आपने, मेरे सोये हुए जोश को,
जो मैंने भुला दिया समाज की, उस पिछड़ी सोच को,
उड़ चली मैं आपके संग, भावनाओं के आकाश में,
उम्मीद और विश्वास  लिए, उस प्रेम प्रकाश में,
पर क्या पता था हमें, क्या छुपा है भविष्य काल में,
खो जायेगा वो सपना, जो बुना था हमने कई साल में,
प्रेम की बगिया में लगाये गये, मेरे विस्वास को उखाड़ने को,
नही जानती थी 
कि, मेरे अपने ही बेताब हैं मेरी दुनिया उजाड़ने को,
यकीन मानो कुछ कर्ज़ था मुझपे, जो साथ आपका छोड़ दिया,
और न चाहते हुए भी, यूँ अपनी किस्मत का रुख  मोड़ दिया,

वेसे तो कुछ फर्ज़ थे उनके भी, जो मेरे अपने थे,
क्यूंकि ये किसी और के नहीं, उनकी बेटी के ही सपने थे,
पर शायद उनको मुझसे ज्यादा, दुनिया की फ़िक्र बड़ी थी.
तभी तो मेरी ख़ुशी से ज्यादा, उन्हें अपनी इज्ज़त की पड़ी थी,
वो भूले तो क्या हुआ, मुझे तो फर्ज़ निभाना था,
छोड़ तुम्हारा साथ, घर की इज्ज़त को बढ़ाना था,

खैर जो हुआ सो हुआ, अब कहना मुस्किल है कि दोषी कौन था,
क्या वो भगवान जो सब देखता रहा, फिर भी मौन था,
या मैं जिसने भुला के बंदिशों को सपना देखा आज़ादी का,
या मेरे अपने जिन्हें मेरी ख़ुशी से डर था अपनी बर्बादी का,

पर अब सज़ा का बोझ तो हम सब को उठाना होगा,
उसके लिए आपको मुझे इक विश्वास  दिलाना होगा,
मैं तो जी ही रही हूँ अपनी जिन्दगी फिर बेड़ियों में,
पर आपको फिर मुस्कुराना होगा ! पर आपको फिर मुस्कुराना होगा !!

                                     - शक्ति शर्मा

फ्रेशिज्ज़ा प्रेम पत्र लेखन द्वितीय


                                                                                                                    -सुयोग वानखेड़े

मेरी प्यारी प्रियतमा,
              अपने प्यार का इजहार तो मै इस पन्ने पर कुछ इस तरह करूँगा कि मेरे कलम के स्याही की एक एक बूँद इस कोरे पन्ने से प्यार करने लगेगी....
और जब तुम  मुझे वापस पत्र"हाँ" लिखकर भेजोगी, तब देखना, तुम्हारी कलम भी तुम्हारे हाथों के थरथराहट से इश्क कर बैठेगी..... मुझे विश्वास है....
                                     तेरी नाजुक अदाएं और नगमों से..
                                     हो गए कत्ल ए आम...
                                     जब भी कभी हम
                                     गुजरे तेरे घरसे...
                                    आशिको के चौराहे पे
                                     हो जाती है चर्चा अपने प्यार कि....
                वैसे तेरे हुस्न के दीवाने तो लाखो थे पड़े गलियों में ... लेकिन मेरा प्यार.. तेरी कसम प्रियतमा.. सबसे अलग ..सबसे जुदा.. जब भी उस सुहानी गली से गुजरता था हर बार ठोकर खाता था.. क्यूंकि मेरी नज़रे तो हर पल तुम्हे ही तलाशती थी..
                 कितना समय अब मुझे यूँही तरसाएगी..अब तो मेरे जिंदगी के झील का कोमल कमल बनके उसे खुबसूरत बना दे..
                                   चन्दन सा बदन ,चंचल चितवन..
                                   धीरे से तेरा ये मुस्काना...
                                   मुझे दोष न देना जग वालों.
                                   हो जाऊं अगर मै दीवाना...
                  तेरे हुस्न ए दीदार के क्या कहने. अप्सराएं भी शरमा जाएँ तेरे बदन की नाजुक नक्षी देखकर. तू तो सुन्दरता की मूरत है.. तेरे मन कि सुन्दरता भी मुझे खूब भाती है.. तन भी सुन्दर .. मन भी सुन्दर.. कुदरत कि बड़ी लुभावनी कलाकृति हो तुम...
                  अब मान भी जाओ हसीना.. "तुम  मेरी हो" ये काले पत्थर कि लकीर है और मै तो जन्म भर से तेरा ही हूँ... तो चल चले और बनाए अपने सपनो का जहाँ ... मिलके... अब कसमे वादे क्या करने.. पहले ही किसी जनम में वे हो चुके.. अब इस जनम का मिलन शेष है..
                   तेरी साँसे मेरे लिए अटकती है ... तेरी आँखे मेरे लिए तरसती है.. तेरी पायल मेरे लिए खनकती है.... मुझे पता है... क्यूंकि तुम मेरे भीतर ही तो हो.. अब रातो के सपनो में आना छोड दे... चल कल ही मिलते है.. किसी वीरान.. सुनसान.. प्यारी जगह पर.. जहा बस एकही आत्मा हो.. बस एक.. मेरी तेरी..
                    इंतजार कर रहा हूँ... उसी सुहानी गली में... J
                                                                                                     तेरा जन्मो जनम का आशिक..
                                                                                                     दिलसे पूछ.. नाम मिल जाएगा...

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

"फ्रेशिज्ज़ा प्रेम पत्र विजेता"


प्रिय _______ ,
                          पिछले साल सर्दी के मौसम में , एक दिन जब मैं यूँ ही बाहर टहलने निकला .... तब एक साया दिखा .... धुंधला सा पर प्यारा सा ... साया जब धीरे - धीरे पास आने लगा .... देखा एक लडकी सर्दी में कंपकपाती 
हुई , अपने शरीर को शॉल (shawl) में ढंके हुए चली आ रही थी | अचानक से मुझे पता नहीं क्या हुआ मैं बस उसे देखता रह गया चुपचाप | मुझे कुछ महसूस नहीं हो रहा था | जब तक वो आँखों से ओझल नहीं हो गई तब तक मै उसे देखता रहा | वो खुबसूरत सी लड़की तुम थी | जैसे ही तुम गायब हुई मुझे होश आया , उफ्फ्फ ....... मै तुम्हे ढूंढने लगा , कहाँ गई आखिर ..... देखते - देखते मुझे तुम तो नहीं , तुम्हारा घर जरुर मिल गया | मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करूं . अजीब सी बैचेनी सी हो रही थी | मै फटाफट अपने घर की तरफ दौड़ा , घर पंहुचा ..... कमरे में पलंग पर बैठ कर तकिये के ऊपर अपना सर रखकर आँखे बंद की , तुम ही दिखी वही एक लड़की शॉल ओढे सर नीचे झुकाए , शरमाते हुए चली जा रही हैं और दूसरी ओर एक लड़का अपनी आँखों से एकटक उसे देखकर अपने दिल पर हाथ रखे खड़ा है | उस दिन तो रात कैसे न कैसे निकल गई ( dont take it otherwise) | अगली बार जब भी मै निकलता घर से यही आस लेकर निकलता की काश तुम दिख जाओ एक बार बस , न मुझे बात करनी थी न मिलना था बस देखना था | मन में भी लगता था की तुम जरुर दिखोगी ओर सच में जो मन को लगता था वो सही में सच में हो जाता था , तुम फिर दिखी | बस मुझे तो यही चाहिए था ..... एक बार जब मैं यूँ ही सुबह घूमने जा रहा था ... तुम दिखी , तुमने तिरछी नज़र से मुझे देखा , हे भगवान , मै बता नहीं सकता मै तो गया ...... बस वो दिन मेरा सबसे अच्छा और प्यारा दिन था पूरी ज़िन्दगी का | दिन बीतते गए तुम और मै अपने घरो के काम में व्यस्त रहते थे
    दिवाली का समय याद है , जब मैं रात को तुम्हे wish करने आया था , तो तुम साड़ी में कितनी प्यारी दिख रही थी | जब मैंने तुम्हे देखा और wish किया “Happy Diwali” और तुम्हारा reply आया “same to you” J with a big smile on your face. मैं जब बहुत ज्यादा खुश हुआ और मेरे अन्दर अज़ीब सी सिहरन सी हुई | अब जाकर मुझे अहसास हुआ की मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ , Lifetime Love (ज़िन्दगी भर का प्यार) ..... मेरे को अभी तक नहीं पता पड़ा था कि ये क्या है ?? बहुत से लोग कहते है Attraction होता है , Crush होता है , फिर वो Girl friend बनाते है फिर Break up , रोना धोना वगैरह !! पर आज मुझे पता पड़ा मेरा ये प्यार है, LOVE है और मैं खुश हूँ | मुझे इस बात का ज़रा भी दुःख नहीं होगा कि तुम मुझे मना कर दोगी | मुझे इस बात कि ख़ुशी है कि कम से कम मुझे प्यार हुआ जो कि लोगो को नहीं होता और पहली बार में तो कभी नहीं मतलब बहुत कम chance होते है | मुझे इस बात की भी ख़ुशी है कि मुझे एक ऐसी लड़की से प्यार हुआ जो सच में प्यार के लायक है | “मै तुमसे प्रेम करता
हूँ” और मेरा मन है कि अगर विवाह का गठबंधन किसी से हो तो वो तुम हो सिर्फ तुम !! अगर तुम नहीं तो तुम जैसी हो :-D !!!
         मुझे नहीं पता तुम्हारे मन में क्या है | पर मेरा मन कहता है कि तुम भी यही सोचती हो और तुम्हारे मन में भी Feelings है | अगर है तो इस Letter के नीचे खाली जगह में एक Heart बनाकर नीचे एक हसता हुआ Smiley और YESS लिख देना, नहीं तो खाली छोड़ देना |
                                       
                                            तुम्हारा प्रिय ,
                                           _____________            



REPLY : 

प्रिय, ______
            मुझे नहीं पता था कि तुम मुझे इतना ज्यादा चाहते हो और तुम्हे पता भी लग गया कि मेरे मन में भी वही है, तुम्हे पता है मैने भी Pray किया था कि कोई ऐसा मिले जो सच में एकदम अच्छा हो, दिल से प्यारा हो और Caring हो जो कि तुम हो .... J मुझे पता लग चुका है | मेरी तरफ से भी “हाँ” है पर तुम्हे अभी आगे जाना है और अपने माँ पापा के लिए, मेरे लिए नाम कमाना है ढेर सारा, मुझे तब अच्छा लगेगा | जब तुम यह कर लोगे मैं तुम्हे पूरी तरह से हाँ कह दूँगी क्योकि तब मुझे अहसास हो जाएगा कि हाँ मेरा Life Partner caring के साथ – साथ एक ज़िम्मेदार इंसान भी है | और इस चीज को कहते है half commitment , तो अभी हम half commited है | ख्याल रखना अपना | मैं भी आज बहुत खुश हूँ और सच में मेरी असली इच्छा आज पूरी हुई है| “मैं भी तसे प्यार (प्रेम) करूँ छू | पर डरूं छू पहली | पर अब डर नहीं लगता | मेरी शुभकामनाएँ तुम्हारे साथ है | All the besst for whole life (our) ……… Miss you.. J ;-) !!!

                                  तुम्हारी प्रियतमा ,
                                 ____________________


-द्वारा निखिल मीणा




बुधवार, 5 सितंबर 2012

कल रात ...



कल अरसे बाद मिली तुम, 

तारीखें जैसे उलटी दौड पडी,
नज़रों से छुआ तुमने, 
और हाथों से बातें कर ली|



जाने खोया था तुझमें,
या तू मुझमें ही खोई थी,
बिन सोये मैं स्वप्न में था 
जानें पलकें कब सोई थी|



जब सुधि ने दी दस्तक ,
क्या बोला था? कुछ याद नहीं,
याद तो तेरी थी लेकिन ...
क्या कल की थी? ये याद नहीं|



कल रात नशीली थी शायद,
या कल रात नाश में था 'शायर' ||



मंगलवार, 4 सितंबर 2012

खतों में



















अपने खतों में रखना तुम,
कुछ पीलापन सरसों का.

कुछ बूँदें हाल के सावन की,
कुछ खिलखिलाहट आस-पास खेलते बच्चों की.

रखना हल्की लाली सिन्दूर की भी,
और चेहरे की कुछ लकीरें.

बुधवार, 8 अगस्त 2012

कोई दीवाना कहता है

 कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
मै तुझसे दूर कैसा हू तू मुझसे दूर कैसी है
ये मेरा दिल समझता है या तेरा दिल समझता है

मोहबत्त एक अहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है
यहाँ सब लोग कहते है मेरी आँखों में आसूं है
जो तू समझे तो मोती है जो ना समझे तो पानी है

समंदर पीर का अन्दर लेकिन रो नहीं सकता
ये आसूं प्यार का मोती इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता

भ्रमर कोई कुम्दनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोह्बत्त का
मै किस्से को हक्कीकत में बदल बैठा तो हंगामा

बहुत बिखरा बहुत टूटा थपेडे सह नहीं पाया
हवाओं के इशारों पर मगर मै बह नहीं पाया
अधूरा अनसुना ही रह गया ये प्यार का किस्सा
कभी तू सुन नहीं पाई कभी मै कह नहीं पाया