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शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

गज़ल

तेरी गली के मोड पर,
खुद को बेज़ार पाता हूँ,
जिल्लतें रोज़ मिलती है ... फिर भी हर बार आता हूँ, 

जीते जी जिन्हें कभी, 
इक खुशी ना दे सका,
फूल चढाने अब उनकी ... मजार जाता हूँ|

हारी ना जंग कोई, 
सीधे सामना सबका,
तेरी नज़रों से नहीं लड़ता ... उनसे हार जाता हूँ|

'मैडम' के आदेश बिना,
जुबां तक नहीं चलती,
'जनता' मेरी लाचारी देखो ... सरकार चलाता हूँ|

सम्मान-ट्रोफी-तमगों से,
घर पटा पड़ा लेकिन,
भूखा अक्सर सोता हूँ ... सितार बजाता हूँ|

शनिवार, 15 सितंबर 2012

कोई यूँ

कोई यूँ सुला दे कि जागने से वास्ता ना रहे कोई..
कोई यूँ रुला दे कि हंसने से वास्ता ना रहे कोई..

डर के रंगों से क्यूँ सहमा है हर चेहरे का पन्ना..
डर के रंग भरने वालों को इंसान बना दे कोई...

तार ही तार बिछ गए हैं,दुनिया में हर कदम पर..
बेतार करके हम सबको,मुस्कान से हर दिल जोड़ दे कोई..

दौड़ रहे हैं हम, तुम, चंदा सूरज, तारे...
एक बार ठहर के गले लगा ले कोई...

वो ऊपरवाला कहता है,मुझे देख ले खिलते फूलों में तू...
पर हर पल, माला में नाम रटने वाले को ये समझा दे कोई..

बात बात पर क्यूँ मरना चाहता है,ऐ जवान दिल तू?
एक बार तो तेरे लिए,जिंदगी का घूंघट उठा दे कोई...


                                       -श्रेया  अग्रवाल 

बुधवार, 5 सितंबर 2012

कल रात ...



कल अरसे बाद मिली तुम, 

तारीखें जैसे उलटी दौड पडी,
नज़रों से छुआ तुमने, 
और हाथों से बातें कर ली|



जाने खोया था तुझमें,
या तू मुझमें ही खोई थी,
बिन सोये मैं स्वप्न में था 
जानें पलकें कब सोई थी|



जब सुधि ने दी दस्तक ,
क्या बोला था? कुछ याद नहीं,
याद तो तेरी थी लेकिन ...
क्या कल की थी? ये याद नहीं|



कल रात नशीली थी शायद,
या कल रात नाश में था 'शायर' ||



बुधवार, 29 अगस्त 2012

कवि तो ख़ुद एक कविता है


कवि तो ख़ुद एक कविता है



उसमें अनंत गहराई है,
है व्याकुलतातन्हाई है,
ढूंढ सको तो ढूंढ लो ,
एक ‘सोताउसमें कहीं बहता है-
कवि तो ख़ुद एक कविता है ।
दुनिया से बेगाना है,
दुनियादारी से अनजाना है,
अव्यक्तउलझे भावों को,
वो कागज़ पर लिख देता है-
कवि तो ख़ुद एक कविता है ।
शब्दों की भी सीमायें हैं,
कविता में कुछ अंश ही आयें हैं,
सागर से निकली इन बूंदों में भी,
कितना कुछ वो कहता है ,
कवि तो ख़ुद एक कविता है ।
उन शब्दों को हम ना ताकें,
गर उस हलचल को पहचान सके ।
क्या कहना आख़िर वो चाहता है,
उन अर्थों को हम जान सकें,
बेचैनीउमंग नीरवता को भी,
वो लफ्जों में कह देता है ।
कवि तो ख़ुद एक कविता है ।
कविता तो एक माध्यम है,
आख़िर तो कवि को पढ़ना है ।
कलम की इस सीढ़ी से,
उसके ह्रदय तक चढ़ना है ।
वहाँ पहुंचोगे तो पाओगे
एक कलकल करती सरिता है ।
कवि तो ख़ुद एक कविता है ।
ऋषभ जैन

बुधवार, 8 अगस्त 2012

कोई दीवाना कहता है

 कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है
मै तुझसे दूर कैसा हू तू मुझसे दूर कैसी है
ये मेरा दिल समझता है या तेरा दिल समझता है

मोहबत्त एक अहसासों की पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है
यहाँ सब लोग कहते है मेरी आँखों में आसूं है
जो तू समझे तो मोती है जो ना समझे तो पानी है

समंदर पीर का अन्दर लेकिन रो नहीं सकता
ये आसूं प्यार का मोती इसको खो नहीं सकता
मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता

भ्रमर कोई कुम्दनी पर मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोह्बत्त का
मै किस्से को हक्कीकत में बदल बैठा तो हंगामा

बहुत बिखरा बहुत टूटा थपेडे सह नहीं पाया
हवाओं के इशारों पर मगर मै बह नहीं पाया
अधूरा अनसुना ही रह गया ये प्यार का किस्सा
कभी तू सुन नहीं पाई कभी मै कह नहीं पाया

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

ग़ज़ल


[तुझे भूलने के लिए किताबों में डूबा, किताबों को भूल गया, तेरी यादों में झूल गया,
कल रात पुस्तकालय में लिखी ग़ज़ल, वाणी के इस नूतन  पृष्ठ पर मेरी पहली पोस्ट]

जो बयान जुबां से हो जाए, वो आशिकी क्या है?
जो होश में कट जाए, वो ज़िन्दगी क्या है?


देखा  है  नूर  तेरा, हर  ज़र्रे  में  कायम,
जो नज़र मंदिर में ही आए, वो बंदगी क्या है?


कसम याद में मेरी, आँसू ना बहाना,
जो अश्कों में बह जाए, वो बेबसी क्या है?


ना जुबां पर शिकायत, ना चेहरे पे शिकवा,
जो पराये समझ जाए, वो बेरुखी क्या है?  


हर मोड़ पर, इस शहर में, आशिक बहुत तेरे,
जिसे तारों ने ना घेरा, वो चांदनी क्या है?