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रविवार, 20 अप्रैल 2014

आहत

[ मैंने यह कविता करीब ६-७  वर्ष पूर्व एक कवि सम्मेलन से लौटने के पश्चात प्रतिक्रिया स्वरुप लिखी थी. वर्तमान में जब मीडिया की  निष्पक्षता सवालों के घेरों में हैं, कवियों एवं लेखको के एकपक्षीय विमर्श को  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सभी आयामों का सम्मान करते हुए  भी कटघरे में  खड़ा करने की आवश्यकता है .] 


चौबीस घंटे के पश्चात्
रह रह कर मेरा मन कर रहा व्याघात  
वहां मैंने सुनी बहुतेरे कवियों की बात
कुछ ने हास्य - व्यंगयों से सभा का श्रृंगार किया, 
कुछ ने अपनी प्रतिभा से पाकिस्तान पर प्रहार किया,
कुछ ने गुजरात दंगो पर अपना विचार दिया
यहीं है वह बात
जहाँ रह रह कर , मेरा मन कर रहा व्याघात
इन चंद कवियों को बहुत याद आई
जलते हुए साबरमती एक्सप्रेस की
लेकिन , इनकी आँखों में नहीं बची थी इतनी दृष्टि
इनके नाकों में नहीं बची थी , इतनी घ्राण शक्ति ,
जो नरोदा पटिया की सडती लाशों की बू को भी सूंघ पाते
उनके कानो में नहीं बची थी , इतनी श्रवण शक्ति ,
जो गुलमर्ग सोसाइटी के क्रंदन को भी सुन पाते,
इसी तरह जब मैं पढ़ता हूँ ,
‘हंस’ के काव्य भाग को ,
तो इन पृष्ठों पर नहीं पाता, एस-६ डब्बे की बात
उनकी संवेदनाये , मानवीय भावनाये
सारी तुकबंदी एवं काव्यात्मक उपमाये
प्रारंभ होती है , गोधरा के पश्चात्
यही है वो बात ,
जहाँ रह रह कर, मेरा मन कर रहा व्याघात
मैं पूछता हूँ ,
क्या जलती आग की लपटों से
उठने वाली मासूम चीखों में भी अंतर होता है .
या फिर अंतर होता है ,
इंसानों को जलाने के लिए प्रयुक्त होने वाली पेट्रोल में,
नहीं कोई अंतर नहीं  होता, तो फिर क्यों,
इस आग पर सेंके जाने वाले राजनीति की रोटियों की तर्ज पर ,
कवियों की संवेदनाये और भावनाए रंग बदल लेती है.
फिलहाल , मुझे इन कवियों की कविताओ से ज्यादा इन्तजार है,
किस्से के उस लड़के की जो,
एक मूर्ख  और नग्न राजा की सवारी में ,
दुदंभी नाद और जयघोष के बीच,
बड़े ही अबोधता  से सहज कह उठे
“अरे राजा तो नंगा है “
हाँ,  इस बात की सम्भावना बहुत ज्यादा है,
उस लड़के के परिजन उसके मुहं पर हाथ डालते हुए कहें 
“अबे, चुप हो जा ,यदि राजा के कानो तक,
पहुँच गयी यह बात,
मिल जायेगा प्राणदंड बातों ही बात “
                                  - नेपथ्य निशांत 


सोमवार, 26 अगस्त 2013

मुंबई डायरीज़ –भाग एक


(मेरी  लिखी गयी कुल 4 -5  कविताओं में से ये ‘लोकल ‘ के लिए टिकट की कतार में लगे हुए बाहर ठीक कान्जुर स्टेशन से सटे रहवासों को देखकर ;दो तरह की जिंदगियों के विरोधाभास पर उमड़ते ख्यालों से प्रेरित होकर लिखी गयी है ....लोकल में अगर आपको बैठने को मिल जाए और हाथ में डायरी पैन हो ,लिखने की खुजली हो रही हो तो क्या ही बात ! खैर आगे के पन्ने भी मुंबई से जुड़ी यादों से भरे हैं   )

एक ऐसी भी ज़िन्दगी !
 
झरोखे से झाँकती ज़िन्दगी
ठीक रेल की पटरियों से सटी ;
सरपट भागती रेलें औ’
उससे भी तेज़ भागती यह ज़िन्दगी ,
कहीं तो आलीशान महलों से
सजा है जीवन
तो कहीं मजबूर है कोई
माचिस के डिब्बों से ‘घर’ के हिस्से में
ज़मीं भी ज़रा कुछ कम ही आती है
कुछ अटके हैं आसमां और ज़मी के बीच
तो कुछ रातें कटती हैं तारे गिनते
वहीँ पड़े हैं कुछ भीगे तौलिये
तो कबूतरों ने भी सोचा चलो !
चलो ...आज करें यहीं बसेरा ..
गर भूल गये हों आप
रफ्तारों को ,कतारों को ....
अरे ट्रेन तो पकड़ी ही होगी आपने
आज चलो उसी ‘घर ‘ को चलें

यह रंग भी है अजब ज़िन्दगी का ,
जो दूर से तो फबता है
पर नजदीकियां आँखों में देती हैं चुभन !
ठीक वैसे ही जैसे ये भागती भीड़
यूँ तो नही करती असर
पर जब हम हों हिस्सा उस ‘सैलाब ‘ का
तो कुछ भुनभुनाहट आ जाती है ,
कभी त्योरियाँ चढ़ जाती हैं
तो कभी ‘बढती आबादी ‘लगती खटकने ऐसे ही
वह गज भर की जगह
एक घरौंदा
किसी का ‘सब कुछ ‘ होता है
ताउम्र मोल चुकाएगा कोई उसे अपना बनाने के लिए

ऐसी कितनी जिंदगियों को पार कर
होता है आज का यह ‘ सफ़र ‘ पूरा
और फिर ऐसी भी होती है इक ज़िन्दगी !

मुंबई के ये रंग हर दफ़ा  जब भी मैं आई.आई. टी की दुनिया से बाहर निकलती हूँ मुझसे रूबरू होते हैं.सपनों का शहर –ग्लैमर की चकाचौंध ,कुछ नया करने का सोचने वाला दिमाग ;सभी का यह शहर बाँहें  फैलाये स्वागत करता है –लोकल में बैठे बैठे आज फिर  मैं इसी ज़िन्दगी के अलग-अलग पन्नों को पढ़ रही हूँ !

रहते हुए तीसरा बरस है मेरा यहाँ पर एक घर मेरा भी है –मेरा ठौर ,मेरा हॉस्टल ....कभी कभी सोचती थी कि यार लड़कियों (खासकर ) के लिए मुंबई ही सबसे अच्छा शहर है पढने और जॉब के लिए ...
खैर सब कुछ खेल नज़रिए का ही तो है –हो सकता है किसी को इस शहर ने कडवी यादें दी हों तो कसी को हमेशा के लिए इसे छोड़ने पर मजबूर कर दिया हो ...पर अभी तक मेरे लिए इस शहर के मायने कई हैं .और हर वक़्त पापा के सुरक्षा के घेरे में चलने वाली स्पर्श अब बड़ी हो गयी थी उसे अब हर काम अकेले करना था और ये बड़ा रोमांचक और मजेदार प्रतीत होता था ....और बस इस तरह धीरे धीरे इस शहर से दिल जुड़ गया .....:) J








       

बुधवार, 21 अगस्त 2013

जहाँ डरते हैं लोग घर बसने से,
हम लोगों के आशियां सजाते हैं |

जहाँ डरते हैं लोग फूल  खिलाने से,
हम लोगों के मूर्छे हुए फूल खिलते हैं |

जहाँ डरते हैं लोग मंजिल के रोडों से,
हम अपना मार्ग स्वयं बनाते हैं |

जहाँ तड़प है डाई आखर प्रेम की,
हम लोगों को भीनी सी मुस्कान दे जाते हैं |

जहाँ इश्क अभाव में दुनिया रोती है,
हम मोहब्बत के पैगंबर बन कर आते हैं |

यहाँ दिल खिलते है,मन मिलते हैं,
बंदी का पता नहीं,बंधुओं का अपार प्यार मिलता है|

हम है सिविल की मचाऊ जनता,
हम से है इस विराट संसार का आकार बनता |

                                                                            - आदित्य झुनझुनवाला

रविवार, 9 जून 2013

सुहानी बरसात

स्कूल से भागते दोढ़ते घर को आते
बैग फेक, वापस भीगने जाते!
माँ पीछे से पकड़ने आती,
और अच्छी वाली फटकार लगाती!
उस फटकार को मे आज भी याद करता हू
वेसी ही सुहानी बरसात की मे आस करता  हू
जिद करके पकोड़े बनवाते,
और बहन के हिस्से का भी खा जाते!
फिर शुरू करती वो रोना,
और बोलती ”माँ! भैया को देखो ना!”
उसे चिढ़ाने को मे आज भी याद करता  हू
वेसी ही सुहानी बरसात की मे आस करता  हू
जब भीगने से लग जाती थी सर्दी,
माँ पिलाती थी दूध मिला के हल्दी!
हम आनाकानी करते उसे पीते थे,
क्योकि माँ की प्यार भरी डांट से डरते थे!
उस प्यार भरे दूध को मे आज भी याद करता हू,
वैसी ही सुहानी बरसात की मे आस करता हू
                                                     -अर्नव पूरी 

सोमवार, 3 जून 2013

आपकी कलम से #2 कौन क्या-क्या खाता है ?


खान-पान की कृपा से, तोंद हो गई गोल,
रोगी खाते औषधी, लड्डू खाएँ किलोल।
लड्डू खाएँ किलोल, जपें खाने की माला,
ऊँची रिश्वत खाते, ऊँचे अफसर आला।
दादा टाइप छात्र, मास्टरों का सर खाते,
लेखक की रायल्टी, चतुर पब्लिशर खाते।

दर्प खाय इंसान को, खाय सर्प को मोर,
हवा जेल की खा रहे, कातिल-डाकू-चोर।
कातिल-डाकू-चोर, ब्लैक खाएँ भ्रष्टाजी,
बैंक-बौहरे-वणिक, ब्याज खाने में राजी।
दीन-दुखी-दुर्बल, बेचारे गम खाते हैं,
न्यायालय में बेईमान कसम खाते हैं।

सास खा रही बहू को, घास खा रही गाय,
चली बिलाई हज्ज को, नौ सौ चूहे खाय।
नौ सौ चूहे खाय, मार अपराधी खाएँ,
पिटते-पिटते कोतवाल की हा-हा खाएँ।
उत्पाती बच्चे, चच्चे के थप्पड़ खाते,
छेड़छाड़ में नकली मजनूँ, चप्पल खाते।

सूरदास जी मार्ग में, ठोकर-टक्कर खायं,
राजीव जी के सामने मंत्री चक्कर खायं।
मंत्री चक्कर खायं, टिकिट तिकड़म से लाएँ,
एलेक्शन में हार जायं तो मुँह की खाएँ।
जीजाजी खाते देखे साली की गाली,
पति के कान खा रही झगड़ालू घरवाली।

मंदिर जाकर भक्तगण खाते प्रभू प्रसाद,
चुगली खाकर आ रहा चुगलखोर को स्वाद।
चुगलखोर को स्वाद, देंय साहब परमीशन,
कंट्रैक्टर से इंजीनियर जी खायं कमीशन।
अनुभवहीन व्यक्ति दर-दर की ठोकर खाते,
बच्चों की फटकारें, बूढ़े होकर खाते।

दद्दा खाएँ दहेज में, दो नंबर के नोट,
पाखंडी मेवा चरें, पंडित चाटें होट।
पंडित चाटें होट, वोट खाते हैं नेता,
खायं मुनाफा उच्च, निच्च राशन विक्रेता।
काकी मैके गई, रेल में खाकर धक्का,
कक्का स्वयं बनाकर खाते कच्चा-पक्का।

                                                                    ----------- काका हाथरसी

शनिवार, 18 मई 2013

प्रत्याशा




हाँ तू है उर्वशी, मेरी निश्छल प्रेयसी,
अगणित भवरों की लिप्सा अतृप्त  कली,

क्यों है प्रथम स्नेह की अबोध संसृति,
करती मृदु मुस्कान से उर्जस्वित प्रीती ;

हो उत्प्लवन अभिलाषा नहीं संकोच मृगनयनी ,
दुर्लभ स्वप्न नहीं, है बनना संगीतमयी  सहधर्मिणी

                                                             -------------------  शिवेंद्र सिद्धार्थ "शाहबाज़"

खोया क्यों है आज तू ?



अम्बर की हर ऊंचाई पर, समुद्र के गहन की कोख तक है तू
माँ के आंचल मे, घर के आंगन मे है तू
जीवन के हर एक पहलू में गतिशील, फिर भी खोया क्यों है आज तू

मन मे तूफ़ान को लिए घूमता है, पर पहाडों से आज भी थरथराता है तू
कई अरमानों को गुथ रखा है, पर शिकायतों का सैलाब है तू
सही राह का बोध है तुझे, फिर भी गलत राहों पर लुप्त है तू
सच-झूठ का परिज्ञान है, फिर भी खोया क्यों है आज तू

मिट चुका वजूद है तेरा, क्यों  विनाश से भयभीत है तू
बिक चुका ईमान है तेरा, वंचन से क्यों आतंकित है तू
भीगती रगों मे ओजस है इतना, इस क्रांति को क्यों नकारता है तू
ऎलान का लय निकट है, फिर क्यों  आज खोया है तू
                                   
                                                                                  ------------------  निमिष मेहता

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

मुफ्त में



जब लाली पूरब में बिखर बिखर जाती है,
भर कर उस छटा को पलकों तले,
रूह मेरी खिल खिल सी जाती है.
खोजें सब उसको इधर उधर, अजी!
ख़ुशी तो यूं ही मुफ्त में मिल जाती है.

गगन से छलकती बरखा झर झर
जो तन पर गिरे तो, मन को भी
मेरे भिगो भिगो जाती है,
खोजें सब उसको इधर उधर, अजी!
ख़ुशी तो यूं ही मुफ्त में मिल जाती है.

महकी महकी सी ये पवन जब,
गले मुझको लगाती है, रूखे से
मेरे दिल को बहला बहला सा जाती है,.
खोजें सब उसको इधर उधर, अजी!
ख़ुशी तो यूं ही मुफ्त में मिल जाती है.
                                                          ------- भावना

रविवार, 21 अप्रैल 2013

नीला



मेरे क़दमों की ज़मीन से आसमान तलक
 
मुठ्ठी भर हौंसले, चुटकी भर जुनूँ , नन्हें अरमान
मचलती सोच भर का फासला है ।
जब दौड़ती हूँ ज़मीन पर
 साँस फूलने  लगती है
पाँव  से धीरे-धीरे एक दर्द ऊपर बढ़ता हुआ
पूरे जिस्म को तोड़ने लगता है ।
मगर रफ़्तार है कि बढ़ती जाती है
निरा पागलपन सीमाएं तोड़ने को उकसाता  है ।
मील के हर पत्थर को पीछे छोड़ते हुए
मैं आगे बढ़ती हूँ ।
मुझे कुछ नज़र नहीं आता
सब कुछ धुंधलाने लगता है
और फिर एक आख़िरी क़दम
मैं गिर पड़ती हूँ ।
कमाल है ना !
 तालियों की गड़गड़ाहट से मेरा इस्तकबाल होता है
चमकता सोना मेरे गले में
 हँसी से ख़ुश्क होंठ लबरेज़ होते हैं
 
मैं गिर कर टूटती  नहीं !
मेरा क़द और भी बढ़ जाता है


उस एक लम्हे में,
जब आसमान ज़मीन तक चला आये
ऊपर ताकते रहने की ज़रुरत नहीं रहती
कुछ नीला-नीला सा सब ज़मीन पर पसर आता है
‘जीत’ ज़िन्दगी का ज़ायका  ही बदल  डालती है यार मेरे !
              
                                                                                             --------------- रश्मि चौधरी 

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

कुछ लिखा है...

१. दूर कहीं से एक पास आती हुई आवाज़ आती है,
      धीरे-धीरे एक धुंधली से चीज़ करीब आती दिखती है
बढ़ी धडकनों और हडबडआहट के बेच, सूटकेस उठाकर
        चल पड़ता हूँ अपनी मंजिल की और, प्लेटफार्म पर सबसे आगे
#ट्रेन आ रही है

 २. ट्रक सामने है, और उसके पीछे कुछ कारें
         इनके बाद कुछ ऑटो हैं, चलो धीरे धीरे आगे बढें
     सामने आती हुई तेज़ बाईक को इशारा कर दो
        और भागकर जल्दी से उस पार पहुँचो
#रोड पार करना है

३. उस वक़्त वो दृश्य अलौकिक सा लगता है, चुम्बकीय आकर्षण
      और मन की साड़ी मलिनता , चिंता बह जाती हैं
  उस भीनी ऊष्मा और हलकी पीली लाल रोशिनी में नहाये
      आकाश में उड़ते परिंदे किसी की याद दिलाते हैं
#ढलता सूरज 

बुधवार, 27 मार्च 2013

फाग!



आओ खेले फाग रे

भई भोर अब जाग रे

मुंडेर पे देखो बैठा काग रे

रंग जा , तू

लो पिचकारी और दाग रे

लगा लियो साबुन और झाग रे

गाओ कोई दिल का राग रे

खूब मचाओ, अनुराग रे

मुंडेर पे देखो बैठा काग रे

आओ खेले फाग रे

                                             ---------------नेपथ्य निशांत

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

महिला दिवस!?!


   
आज महिला दिवस है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाया जाता है। सबसे पहले तो मन में ये सवाल उठा कि महिला दिवस है, पर पुरुष दिवस तो कभी होता नहीं, फिर एहसास हुआ कि  पुरुषों के लिए दिवस की ज़रूरत क्यों पड़ने लगी? सारे दिवस तो पुरुषों के नाम ही होते हैं वैसे भी। भारत की बात करें,  तो हमारे देश के कुछ इलाके ऐसे भी हैं जहाँ महिलाओं को उनके हिस्से की ख़ुशी नहीं मिलती, जहाँ बच्चियों को पैदा होने का भी हक नहीं होता, जहाँ औरतों की दुनिया चार दीवारों में ही सिमट कर रह जाती है।  

हाँ तस्वीर बदरंग तो है , पर मुझे उम्मीद है कि एक दिन ऐसी महिलाओं के दिन भी फिरेंगे। तब तक, उनकी हालत बयान करती एक कविता : 

                                                                  वो कहाँ जानती है  
                                                                  महिला दिवस क्या होता है 
                                                                  उसके लिए तो 
                                                                   रोटियों कि गोलाई ही 
                                                                   उसकी सफलता का पैमाना है।
                                                                    
                                                                    उड़ने के ख्वाब तो 
                                                                    देखे होंगे उसने भी                                  
                                                                    उसके पर कुतरने वालों को
                                                                    कहाँ उनका अंदाज़ा है।

                                                                      एक अधूरी कहानी है वो
                                                                      छीन कर उसके हाथ से 
                                                                      उसकी कलम, औरों ने 
                                                                      लिखा उसका फ़साना है।

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

मुलाकात ...




वो कल की एक मुलाकात 
एक लम्हा आज भी है वहाँ थमा हुआ
वक्त बढ़ चला 
औ मैं भी कैद उसमें 
पर नज़रों की दूसरी तरफ 
वही द्रश्य है 
मेरा ज़हाँ खुद को किये मेरे हवाले 
मौजूद है समीप ही 
वो चेहरा उसका जुस्तजू से भरा हुआ 
मुस्कान अधरों पे अश्रु छलके लिए हुए
कुछ बहके हुए ,कुछ डरे हुए

अब तो डरने लगा हूँ मैं भी
उसकी तमन्नाओं से, उसकी उमीदों से
जिस ज़हाँ में कल का भरोसा नहीं
वहीँ मेरा ज़हाँ कल में खोया हुआ है !!

                                                   
                                                      ....... शक्ति शर्मा

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

गुमनाम मौतें



                                                             

उनकी मौत पर,

ना कभी टी.वी. एंकरों ने चीख चीख कर बहसें की,

ना कभी बुद्धिप्राणियों ने लच्छेदार भाषाओँ में,

मानवाधिकार की वकालत की,

ना ही अखबारों के सम्पादकीय में उनका जिक्र था,

ना ही नेताओं के भाषणों में उनका फ़िक्र था,

ना तो कोई मोमबती लेकर इण्डिया गेट पर जलाने आया ,

ना ही किसी शहर को जबरदस्ती बंद कराया गया,

ना ही किसी ने फेसबुक पर इसे लेकर कोई टिप्पणी की,

ना ही किसी की भावनाए कभी आहत हुई,

ना ही किसी ने भेदभाव की शिकायत की,

ना ही किसी ने न्याय मिलने पर ख़ुशी जताई,

ना ही किसी ने देशभक्ति/द्रोह की रोटियाँ सेंकी,

ना ही किसी ने स्वायत्ता की सियासी गोटियाँ फेंकी,

किसी ने जहमत नहीं उठाई,

मरने के पहले या बाद में,

कहीं भी स्पीड पोस्ट भेजने की,

बस एक गुमनाम मौतों के रजिस्टर में ,

एक संख्या जोड़ दी गयी ,

कभी कभी आलसवश वह भी छोड़ दी गयी,

उनके मौत के पहले कभी,

उनकी अंतिम इच्छा भी नहीं पूछी गयी ,

यदि पूछा भी जाता तो शायद वह ,

एक कम्बल और बिस्तर से ज्यादा कुछ नहीं बताता ,

मरने से पहले काश वह, एक दिन चैन से सो तो पाता.

                                                                           - नेपथ्य निशांत

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

फूल का सवाल





खिला है जो आज,कल वो भी
 मुरझा के झर जायेगा,
उसकी कोमल सी पंखुड़ियां
तिनका तिनका बिखर जायेंगी,
हवा में न रहेगी उसकी भीनी सी
वो खुशबू , धूल संग कुचला जाएगा।

शायद बाकी रहें कुछ तसवीरें
या शायद किसी किताब के
पन्नों में बस जाए उसकी महक,
पर पूछे कुसुम सवाल ये ,
कि ओ माली, जब इसी मिटटी
में था मिलाना, तो क्यों दिया
ये रूप, क्यों दी सुगंध, जब
दो पल में सब है छीनना ?

मुस्कुराते माली ने कहा की अरे
पगले, यही तो नियम है, खिलकर
 मुरझाना, हाँ, यही तेरी नियति भी।                              
सवाल जो तूने पूछा है, तो जवाब भी सुन।
अपने दो पलों में तू इसी रूप, इसी
खुशबू से, दुनिया को खूबसूरत बनाता है,
उदास चेहरों पे मुस्कानें लाता है,
यही दो पल हैं तेरे पास पर तू यादें
बनकर जिए जाता है।

खिल तू कुछ इस तरह कि
दूर दूर तक फैले तेरी खुशबू,
खिल कुछ इस तरह कि नए
खिलते फूलों को तुझसे सीख मिले,
फिर मिटकर भी तू रहेगा अमर।


बदलाव


माँ के बिना जो बच्चा सोता न था रात भर
उस छड़ी टेकती बूढ़ी माँ के सहारे क्या हुए
आँख के तारे की शरारत पर वो मुस्काती थी
आज चमक उन तारों के यू गायब क्यूँ हुए
गाँव की छतों पर कई तारे जो मिलते थे
ज़माने पहले के ये हसीं नज़ारे क्या हुए                                 
चौपाल की बैठक की मस्ती और कहकहे
बच्चों को सुनाये जाने वाले वो किस्से क्या हुए
इस अंधाधुंध भौतिकतावाद के नशे में
हम भारतीय बदल अब कैसे क्या हुए। 
                          ------ विकास पाण्डेय 

शनिवार, 26 जनवरी 2013

देश हमारा



गण हैं हम इस गणतंत्र के , तंत्र हिला के रख देंगे
अन्याय और दुर्भाव के सब बीज मिटा के रख देंगे
चाहे दुश्मन बाहर हो या घर के भीतर हो विभीषण
इस बार न छोड़ेंगे हम उनको देंगे ऐसा दंड भीषण
कि, काँप उठे ये धरा और कांप उठे अम्बर सारा
बस गूंजे ज़ग में देशप्रेम और देशप्रेम का ये नारा
झंडा ऊँचा रहे हमारा ! सबसे प्यारा देश हमारा !
झंडा ऊँचा रहे हमारा ! सबसे प्यारा देश हमारा !
                                 
                                                           ---------- शक्ति शर्मा 

सत्य मेव जयते!!

(आज देश के जो हालात हैं उनसे कोई अनभिज्ञ नहीं | सफ़ेद झूठ  को सच बना कर परोसा  जा रहा है और हम लाचार से सब देख सुन रहे है| सच की जीत अब सिर्फ फिल्मो में होती है, कई बार वह भी नहीं | ऐसे में एक आम आदमी आखिर क्या कहे ? क्या करे ? इस प्रश्न का जवाब भी एक आम आदमी ही दे सकता है ... तो झांकिए अपने भीतर, आप लड़ना चाहते है या डर-डर के मरना चाहते है ... )
http://sphotos-b.xx.fbcdn.net/hphotos-prn1/421844_365662533468004_231710293_n.jpg
इस देश में सच के रखवालों के नाम 
एक युवा का पैगाम  

सत्य वचन की रीत जहाँ थी, जन-मानस की भाषा मे,
प्राण जाए पर वचन न जाएं, था मानव की परिभाषा में |
जहाँ राम ने और कृष्ण ने, असुरों का संहार किया,
यदि शीश है उठा पाप का, मस्तक पर प्रहार किया |
उसी देश के वाशिंदे, अंधी परिपाठी पर झूल गये ,
स्वाभिमान तो बचा नहीं गाँधी की लाठी को भूल गए | 
अर्थ नहीं समझते तो क्या, गर्व से हम कहते ...
सत्य मेव जयते, हाँ भैया ! सत्य मेव जयते ||  


गांधी के आदर्शों पर जहां कालिख पोती जाती है,
भूखे बच्चे हर रात जागते, सरकारे सोती जाती है | 
मातृभूमि की दशा देख, शूर पृथ्वीराज शर्मिंदा है,
जहाँ वीरता थी बसती , बस जयचंद वह अब जिंदा है |
भारत माता का चीर हरण जहां श्वेत दरिन्दे करते हैं 
वो रोती चिल्लाती है, हम तमाशबीन बन हँसते हैं |
अरे ! रावण यहाँ भोग करते, और राम रोज़ मरते ...
फिर भी हम कहते ... सत्य मेव जयते, हाँ भैया ! सत्य मेव जयते ||  



जहाँ हाथ में वेद-कुरान, पर दिल में खंज़र होते है,
इश्वर-अल्लाह की शह लेकर , खूनी मंज़र होते है |
जहाँ धर्म के रखवाले, करते इंसानों की खेती,
और अब्दुल से प्यार नहीं कर सकती हिन्दू की बेटी |
यहाँ एकता सहिष्णुता  के टुकड़े-टुकड़े कर डाले,
एक बंटवारा तो कम था, आओ सौ बटवारे कर डाले, 
जन्म-भूमि ईश्वर की है, पर इंसान यहाँ जलते ,
फिर भी हम कहते ... सत्य मेव जयते, हाँ भैया ! सत्य मेव जयते ||  



जहाँ मुलजिम घोटालों के, पर्वत पर जा बसते हैं,
ख़ून गरीबों का वे चूस, अपनी थाली को भरते हैं |
मंत्री बन बैठे संसद में , आरोपी गद्दार सही,
लड़ना हम सब भूल गए, नहीं बचा खुद्दार कोई |
2G 3G के प्रपंच में, अगर कभी फंस जाते है ,
खातिर खूब होती तिहाड़ में, मुर्ग-मुस्सलम खाते है |
अरे ! इस देश में कातिल-हत्यारों के, बुत बना करते ...
फिर भी हम कहते ... सत्य मेव जयते, हाँ भैया ! सत्य मेव जयते ||  



अगर जीत होती सत्य की, तो जेसिका क्यों मरती ?
बच्चों की नंगी लाशें, गड्ढों में है क्यों सड्ती ?
अफज़ल-कसाब क्यों फाँसी के तख्ते से बचते जाते है ?
और बेगुनाह क्यों लोकल के डब्बों में मरते जाते है ?
कभी ताज तो कभी न्यायलय, संसद तक का मान नहीं,
आज शाम क्या घर लौटूंगा इसका भी कोई  भान नहीं |
यहाँ जीने की सजा नागरिक जीवन भर सहते, 
फिर भी हम कहते ... सत्य मेव जयते, हाँ भैया ! सत्य मेव जयते ||  



लेकिन भारत वर्ष अभी जिंदा है, उठना और लड़ना होगा, 
देश बदलने भारत की , जनता को ही बढना होगा |
 इतिहास गवाह है , जब जब संकट के बादल अंधेर छाए है,
कभी राम , कभी गांधी, कभी अन्ना परिवर्तन लाए है |  
विश्वास हमें करना होगा, निश्चय मन में करना होगा, 
परिवर्तन की आंधी को संग लेकर चलना होगा |       
अरे ! खंडहर से महल बनाने वाले, वीर यहाँ बसते ...
इसीलिए कहते हम .... सत्य मेव जयते, सत्य मेव जयते ||  

--------- रिषभ जैन 

रविवार, 13 जनवरी 2013

लोग...




जब खुद के बैठने का ठौर हो जाये
तो दुसरे के घर यूँ ही जला देते है लोग

जिंदगी में जिसने बस इज्ज़त कमाई
उसकी इज्ज़त कौड़ियों में बेच देते है लोग

यतीम जान जिन पर कभी करम किया
मुझे देख अब आँखें चुरा लेते है ये लोग

ख़ुश हूँ मै लेकिन हरदम ये भी मुनासिब नहीं
ग़म छुपाने के लिए भी मुस्करा लेते है कुछ लोग ।।


                                                  ---------- विकास पाण्डेय 

शनिवार, 12 जनवरी 2013

सख्त जांच



सब जगह
शोर है ,
संदेह है .
मन के अन्दर
ही अन्दर
कई तूफ़ान हैं ,
एक इस्तीफे के
मांग है  .

पर बिल्ला  तो
साफ़ कहता है,
मलाई का कटोरा
नहीं छोडूंगा !
इस्तीफा ! नहीं नहीं
वो तो नहीं दूंगा .

एक काम हो
सकता है ,
कार्यवाही होगी ,
इस सबके के पीछे
सख्त जांच होगी .

जांच ? सख्त ?
ये तो वही है ना
जो ढीले लोग करते
हैं , उबासियाँ भरते हुए.
वो ख़त्म हो जाते हैं ,
पर ये जांच ..ये
ख़त्म नहीं होतीं .

सख्त जो ठहरीं !

                 --------- दीपशिखा वर्मा