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सोमवार, 26 अगस्त 2013

मुंबई डायरीज़ –भाग एक


(मेरी  लिखी गयी कुल 4 -5  कविताओं में से ये ‘लोकल ‘ के लिए टिकट की कतार में लगे हुए बाहर ठीक कान्जुर स्टेशन से सटे रहवासों को देखकर ;दो तरह की जिंदगियों के विरोधाभास पर उमड़ते ख्यालों से प्रेरित होकर लिखी गयी है ....लोकल में अगर आपको बैठने को मिल जाए और हाथ में डायरी पैन हो ,लिखने की खुजली हो रही हो तो क्या ही बात ! खैर आगे के पन्ने भी मुंबई से जुड़ी यादों से भरे हैं   )

एक ऐसी भी ज़िन्दगी !
 
झरोखे से झाँकती ज़िन्दगी
ठीक रेल की पटरियों से सटी ;
सरपट भागती रेलें औ’
उससे भी तेज़ भागती यह ज़िन्दगी ,
कहीं तो आलीशान महलों से
सजा है जीवन
तो कहीं मजबूर है कोई
माचिस के डिब्बों से ‘घर’ के हिस्से में
ज़मीं भी ज़रा कुछ कम ही आती है
कुछ अटके हैं आसमां और ज़मी के बीच
तो कुछ रातें कटती हैं तारे गिनते
वहीँ पड़े हैं कुछ भीगे तौलिये
तो कबूतरों ने भी सोचा चलो !
चलो ...आज करें यहीं बसेरा ..
गर भूल गये हों आप
रफ्तारों को ,कतारों को ....
अरे ट्रेन तो पकड़ी ही होगी आपने
आज चलो उसी ‘घर ‘ को चलें

यह रंग भी है अजब ज़िन्दगी का ,
जो दूर से तो फबता है
पर नजदीकियां आँखों में देती हैं चुभन !
ठीक वैसे ही जैसे ये भागती भीड़
यूँ तो नही करती असर
पर जब हम हों हिस्सा उस ‘सैलाब ‘ का
तो कुछ भुनभुनाहट आ जाती है ,
कभी त्योरियाँ चढ़ जाती हैं
तो कभी ‘बढती आबादी ‘लगती खटकने ऐसे ही
वह गज भर की जगह
एक घरौंदा
किसी का ‘सब कुछ ‘ होता है
ताउम्र मोल चुकाएगा कोई उसे अपना बनाने के लिए

ऐसी कितनी जिंदगियों को पार कर
होता है आज का यह ‘ सफ़र ‘ पूरा
और फिर ऐसी भी होती है इक ज़िन्दगी !

मुंबई के ये रंग हर दफ़ा  जब भी मैं आई.आई. टी की दुनिया से बाहर निकलती हूँ मुझसे रूबरू होते हैं.सपनों का शहर –ग्लैमर की चकाचौंध ,कुछ नया करने का सोचने वाला दिमाग ;सभी का यह शहर बाँहें  फैलाये स्वागत करता है –लोकल में बैठे बैठे आज फिर  मैं इसी ज़िन्दगी के अलग-अलग पन्नों को पढ़ रही हूँ !

रहते हुए तीसरा बरस है मेरा यहाँ पर एक घर मेरा भी है –मेरा ठौर ,मेरा हॉस्टल ....कभी कभी सोचती थी कि यार लड़कियों (खासकर ) के लिए मुंबई ही सबसे अच्छा शहर है पढने और जॉब के लिए ...
खैर सब कुछ खेल नज़रिए का ही तो है –हो सकता है किसी को इस शहर ने कडवी यादें दी हों तो कसी को हमेशा के लिए इसे छोड़ने पर मजबूर कर दिया हो ...पर अभी तक मेरे लिए इस शहर के मायने कई हैं .और हर वक़्त पापा के सुरक्षा के घेरे में चलने वाली स्पर्श अब बड़ी हो गयी थी उसे अब हर काम अकेले करना था और ये बड़ा रोमांचक और मजेदार प्रतीत होता था ....और बस इस तरह धीरे धीरे इस शहर से दिल जुड़ गया .....:) J








       

सोमवार, 22 जुलाई 2013

गुरु


गुरु –कोई भी हो सकता है ! सृष्टि के कण कण को ,हर जीव को भगवान् ने बिलकुल अलग और ख़ास बनाया है –सबमें कुछ ख़ास है -कोई किसी के जैसा नही ! इसीलिए जिसे आप बिलकुल अनुपयोगी या मूर्ख प्राणी समझते हैं क्या पता वही आपको आपकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा जाए !! इसीलिए व्यर्थ अहंकार में रहने की बजाय सबको सुनें,समझें,सीखें और इसे स्वीकार करें बिना किसी हिचकिचाहट के चाहे वह व्यक्ति या चीज़ आपको पसंद न हो पर ये तो आपको मानना ही चाहिए कि उसने आपको कुछ सिखाया और शुक्रगुज़ार भी होना पड़ेगा !!इसीलिए कोई एक गुरु नही ; भगवान् की ही नही बल्कि इंसान की कृतियों  को भी अपना गुरु बना सकते हैं –जो आपको सिखा दे वो गुरु ,हाँ अब इसमें बुरे कामों के लिए भी गुरु मिलते हैं इस दुनिया में -अब आप पर निर्भर करता है कि आपको आपके अन्य अच्छे ‘गुरुओं’ की सीख अपनानाकर अपना विवेक और ह्रदय को साथ लेकर चलना है !! सीखने की न तो कोई उम्र होती है न ही वक़्त होता है –इस वक़्त कोई बड़ा उदाहरण देने की बजाय -अक्सर माँ घर पर कहा करती हैं कि काम कोई भी बड़ा छोटा नही होता इसलिए जब कोई अच्छे से सफाई करता है,झाडू लगाता है तो भी वो काबिले तारीफ़ होता है कि कैसे उसने अपने हिस्से का काम परफेक्शन के साथ किया ! तो उस वक़्त इस मामले में वही गुरु !
हमारे जन्म लेने के साथ ही हमारे जीवन को हमारे माता –पिता ही आकार  देना शुरू करते हैं और हम आज जैसे भी हैं  वो उनकी वजह से हैं ,और अगर कभी कोई गलत रास्ते पर जाता है तो उसे सही करने की हर संभव कोशिश भी की जाती है पर चूँकि  संतान पर दूसरों का फर्क भी पड़ता है ,उसे चुनना है कि वो माता पिता जो कभी उसके लिए बुरा नही सोच सकते –अपनी बुद्धि का प्रयोग कर अपने प्रथम गुरुओं का पथ अपनाये !
कभी कभी कला के विविध रूपों ,उसकी रचनाओं ,विचारों में भी अच्छी सीख ढूंढ सकते हैं ,प्रकृति के हर अंश में एक गुरु का तत्व छुपा है !! गुरु और शिष्य का रिश्ता सिर्फ ओहदे का या सम्मान का नही होता ,क्यूंकि कभी कभी कहते हैं न बच्चे भी बड़ों को सिखा देते हैं तब तो वही गुरु हो गये !!
वैसे तो अभी तक और आगे भी औपचारिक रूप की शिक्षा में मुझे जिन्होंने भी पढाया और पढ़ाएंगे वो सम्मानीय हैं क्यूंकि हरेक ने मुझे कुछ न कुछ सिखाया है  पर मेरे  कुछ टीचर्स की  मैं ज़िन्दगी भर आभारी रहूंगी –जिनमें से दो मेरी स्कूल में थीं और कुछ बंसल क्लासेज कोटा में ! मुझे आज भी याद है एक बार क्लास में किसी सिलसिले में जॉर्ज मैडम ने  मुझे लड़कों के बीच बिठा दिया अपने बिलकुल सामने और मैं जो ज़रा अंतर्मुखी हूँ. मन के भाव पढ़ते हुए उन्होंने मुझसे कहा अरे हम तो तुम्हे पी.एम .बनाना चाहते हैं और तुम इतने में ही डर रही हो ! रेड्डी मैडम की वजह से ही कोटा का विचार आया ,नहीं तो घर से इतना दूर जाने का कभी सोचा ही नही था और इसके बाद भी जब मैं उनसे  मिली तो उन्हें मुझपर मुझसे ज्यादा विश्वास था क्यूंकि वो मुझे बहुत अच्छे तरह से जानती थीं ! तो बंसल क्लासेज कोटा में वैसे तो वो कुछ साल मेरी ज़िन्दगी के सबसे बेहतरीन साल थे पर कुछ टीचर्स थे (Vishal joshi sir , A.K.K  sir , M.K.S sir (उनकी सादगी और उनका काम और कंपोज्ड नेचर मुझे बहुत अच्छा लगता था इसके अलावा कि फिज़िक्स मुझे इन्ही से समझ में आई  :p )जिन्होंने इस कठिन तैयारी को बड़ा ही मजेदार और सार्थक बना दिया था जिनके साथ पढने की जब जब यादें ताज़ा होती हैं वो सुखद अनुभूति लाती हैं .
गुरु पूर्णिमा की आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें और भगवान करे आप आगे भी यूँ सीखते रहे और अपने हर गुरु के पाठों को अमल लाकर ज़िन्दगी में सफल और प्रसन्न बनें !!

                                                          ------------- स्पर्श चौधरी 

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

ज़िन्दगी के पन्नों से ३ ...


बारिश हो रही थी| हम 'शाखा' में खेल रहे थे| खेलते-खेलते मेरी चप्पल का कस्सा निकल गया था| 'शाखा' खत्म होने के बाद मैं कस्से को वापस जोड़ने की कोशिश कर रहा था| मुझसे हो नहीं रहा था, तो मेरे एक मित्र मेरे पास आए और कहा, "लाओ, मैं जोड़ देता हूँ कस्सा| आखिर 'जोड़ने' का ही तो कार्य है अपना|
'जोड़ना' अर्थात् देशवासियों को एकता के सूत्र में पिरोना|

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

मुलाकात ...




वो कल की एक मुलाकात 
एक लम्हा आज भी है वहाँ थमा हुआ
वक्त बढ़ चला 
औ मैं भी कैद उसमें 
पर नज़रों की दूसरी तरफ 
वही द्रश्य है 
मेरा ज़हाँ खुद को किये मेरे हवाले 
मौजूद है समीप ही 
वो चेहरा उसका जुस्तजू से भरा हुआ 
मुस्कान अधरों पे अश्रु छलके लिए हुए
कुछ बहके हुए ,कुछ डरे हुए

अब तो डरने लगा हूँ मैं भी
उसकी तमन्नाओं से, उसकी उमीदों से
जिस ज़हाँ में कल का भरोसा नहीं
वहीँ मेरा ज़हाँ कल में खोया हुआ है !!

                                                   
                                                      ....... शक्ति शर्मा

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

जागृति : यात्रा यादों भरी (भाग तीन)



अगला पड़ाव था हुबली कर्नाटक के एक छोटे से गाँव -कालकेरी संगीत विद्यालय और सेल्को ! इस धारवाड़ जैसे छोटे से शहर से दूर बसा हुआ यह स्कूल बिलकुल गुरुकुल की तर्ज़ पर चलता है।एक पूरी तरह से सौर ऊर्जा से जगमगाता गाँव ....प्रकृति के सर्व सुलभ,सहज उपलब्ध ऊर्जा के इस स्त्रोत का लाभ !प्रकृति की गोद में ,बियाबान के चहचहाते पंछियों के बीच,पेड़ों से छनती धूप ,गोबर से लीपे रंगोली से सजे आँगन !फिजा में ही सुर बसते हैं यहाँ की (मैं यहाँ वापस आना चाहूंगी ..खुद की तो दिली ख्वाहिश है ...आगे खुदा  की ख्वाहिश पर है! )हमने सबसे पहले वहां के छात्रों का शानदार परफॉरमेंस देखा और  तबला वादन से तो खासा प्रभावित हुए।उनकी सच्ची मेहनत झलक रही थी।फिर आगे हम उनके स्टाफ से मिले।इस स्कूल का प्रशासन एडम  चलाते हैं जो 7 सालों से भारत में रहते हैं .वहां मौजूद और भी  2-3 विलायती लोगों से मिले। मुझे लगा कि हम भारत के होकर भी ऐसे माहौल से वंचित हैं।और वो लोग यहीं के होकर रह गये ....कला और बच्चों से प्रेम और भारत की आबो हवा ...यहाँ की फिजा ने जो उन्हें अपने आगोश में लिया तो बस अब वे यहीं रह कर उन्हें सिखाते हैं,पढ़ाते हैं। आसपास के आर्थिक रूप से असक्षम परिवारों के बच्चों को न सिर्फ संगीत बल्कि बहुमुखी विकास की ,आवासीय   भरपूर सुविधा है यहाँ। इसके बाद सेल्को की कहानी सुनी। कि  क्यूँ भारत को दूसरे  ऊर्जा स्त्रोतों के अलावा सौर ऊर्जा का ही सबसे अच्छा विकल्प लेना चाहिए।सौर ऊर्जा के वितरण में और इसकी स्थायित्व ये कुछ प्रमुख चुनौतियाँ हैं उनके सामने।एक जो बात मुझे अच्छी लगी कि शिक्षा को कैसे उन्होंने सौर ऊर्जा से जोड़ा ....स्कूल जाओगे तभी घर पर रोशनी होगी। सेल्को की इस लम्बी यात्रा को  शब्दों में विस्तार देना मुश्किल है। 
इसके बाद हम मिले टो होल्ड हुनरमंदों से ....महाराष्ट्र के कोल्हापुरी चप्पलों को गढ़ते हैं ...और कैसे महिला सशक्तिकरण की पहल के पन्नों में भी खुद को दर्ज करा रहे हैं।पति-पत्नी दोनों मिलकर काम करते हैं फिर भी मालिकाना हक पत्नी का होता है।शिक्षा और अशिक्षा दोनों के साथ भी इनकी पीढियां इस कला को देश विदेश में नाम दिला रही हैं।
                                            

अगला गढ़ था,इन्फोसिस  बंगलुरु कैंपस .इतनी शांति,हरियाली, और ईको  फ्रेंडली वाहन,साइकल्स पर सवार एम्प्लोयीज़ देखकर बेहद सुकून मिलता है।प्रेक्षाग्रह में हमने इन्फोसिस की यात्रा सुनी।'' Be daring,be different !! ''..ये एक बात जो मैंने उनके डाक्यूमेंट्री फिल्म से खासकर के नोट की .कैसे विश्व की शीर्ष आई .टी .कंपनियों में से एक इन्फोसिस की बिनाह किन मूल्यों पर आधारित है।इन्फोसिस परिवार का हर सदस्य कितना महत्व पाता है।एक और बात काबिले गौर है कि उन्होंने कहा कि आप इसे मानव संसाधन विकास कहें (H.R.D.)कहें न कि टेक्नोलॉजी का विकास! उपभोक्ताओं की संतुष्टि,उत्कृष्टता ,ईमानदारी ,पारदर्शिता उनके कुछ आधारबिन्दु हैं।
फिर सुना हमने किरण मजुमदार शॉ को ....एक हिन्दुस्तानी औरत की संघर्ष से कामयाबी के शिखर पर पहुँचने की कहानी! डॉक्टर बनना चाहती थी पर आज बायोकॉन की सर्वेसर्वा हैं। ज़िन्दगी हारों से सीखकर आगे बढ़ना सिखाती है .लेकिन हारेंगे नही तो फिर जीतना कैसे सीखेंगे। तो ज़िन्दगी में हार बेहद ज़रूरी है। आज 40% शोधकर्ता महिलाएं हैं बायोकॉन में .पहले दो कर्मचारी सेवानिवृत्त होने वाले दो कार मेकेनिक थे ...और पहली सेक्रेटरी और कोई नही मिलने पर एक दोस्त! पहला दफ्तर घर के गेराज  में! 
फिर पैनल डिस्कशन -रेड्बस,फ्लिप्कार्ट ,ज़ेवामे और डैल के प्रतिनिधि मेहमानों से मिले। दरअसल लंच के बाद मैं ऊंघ रही थी (मानव स्वभाव !) तो ज्यादा कुछ तो लिख नही पायी।पर जो चीज़ मैंने अपनी डायरी के पन्नों में दर्ज की वो -आप को किसी भी चीज़ के बारे में जूनून और सच में उसे करने का ज़ज्बा होना चाहिए।इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कि आप तकनीकी रूप से दक्ष है या नही।

                                             ---------------- स्पर्श चौधरी

सोमवार, 21 जनवरी 2013

जागृति : यात्रा यादों भरी (भाग दो)


 
पहले दिन हमें 22 समूहों में बांटा गया .हमारे समूह-f  के सदस्यों से और मेंटर से परिचय हुआ .सभी अलग अलग पृष्ठभूमि और संस्कृति से आये  -तो अब हम भी गर्व से कह सकते हैं कि हमारे ही जैसे उद्देश्यों वाले और कुछ करने की जिद लिए हुए लोग हमारे मित्रों का अब ये समूह सारे  विश्व में फैला है। 

दिन-दूसरा -क्रिसमस का दिन हमने रेल में ही बिताया .इससे पहले कुर्ला स्टेशन  पर ही क्रिसमस मनाया .मुझे यकीन है कि ऐसा अनोखा क्रिसमस किसी ने भी नहीं मनाया होगा-450 के बड़े परिवार के साथ!

मंज़र है कुछ निराला सा -भावनाएं अपने पूरे उफान पर हैं।सफ़र तो अभी शुरू हुआ था .हर एक पड़ाव ही मानों मंजिल नज़र आ रही हो। बाहर  खिड़की से झाँकने पर लगता है कि जब समंदर में गोते लगाने में उसकी गहराईओं में खोने में,लहरों के साथ अठखेलियाँ करने में इतना मज़ा आ रहा हो तो किनारे तक पहुँचने की जल्दी किसे है!!  अपने सुविधापूर्ण जीवन से बाहर निकलकर उद्यम और उद्यमिता के ज़रिये  नवीन भारत  का एक नया ढांचा तैयार करने का अद्भुत सफ़र है यह।( मुझे यहाँ एक और बात शशांक सर के उद्बोधन की यहाँ याद आ रही है कि उद्यमिता एक बड़ा ही विस्तृत क्षेत्र है-आप एक उद्यमी नौकरशाह भी हो सकते हो -बस कुछ  नया करने के लिए ,सीखने के लिए अपने कानों और मस्तिष्क के दरवाज़े और खिडकियों को नए विचारों के लिए खोल दें।अपने उद्यमी हाथों को भी बख्श दें .-क्यूंकि

                       जब मंजिल बिलकुल उजले पानी की तरह साफ़ नज़र आये
                      और उसे पाने की चाहत और पागलपन सर पर सवार हो
                      तब ही हासिल होता है इस दुनिया में कुछ ....

और ये बात तो हर एक रोल मॉडल से मिलकर और भी साफ़ होती जा रही थी। कि कुछ करने का जूनून,आत्मविश्वास हो तो आर्थिक समस्याएं और अन्य बाक़ी मुद्दे भी धीरे धीरे हल हो जायेंगे।


आज रेल में पहला दिन था तो -ख़ास रूप से बनाये गये बाथरूम्स ,कम्पार्टमेंट जो इस रेल के बड़े से चलित घर
का हमारा कमरा था जिसे हमें और 4-5 लोगों के साथ बांटना था जोकि मुझे लगता था बेहद प्यारा था -से परिचय हुआ।
नेहा,नेहा,दिव्या,अमृता ,पल्लवी,एलिज़ाबेथ,संजना  मेरे सह -कम्पार्टमेंट यात्री थे।अगले कम्पार्टमेंट में भी हमारे ही समूह के लोग थे .और वहीँ हमारी मेंटर भी थी तो औपचारिक और अनौपचारिक चर्चाएं वहीँ हुआ करती थीं।

मैंने सपने में भी नही सोचा था कि  चूंकि मैं थोड़ी अंतर्मुखी किस्म की हूँ तो इतनी जल्दी दोस्ती कर लुंगी .
पर मुझे याद है कि मैं बीमार हो गयी थी , कोई मेरे सर पर बाम लगा रहा था- कोई दवाई दे रहा था तो कोई मेरे लिए खिचड़ी का इंतजाम कर रहा था। इतना प्यार,केयर और सहयोग सालों की गहरी दोस्ती में ही देखने को मिलता है पर यात्रा की बात ही निराली थी!! :) :) मुझे बड़ा भावुक सा महसूस हो रहा है।

                                           ---------------- स्पर्श चौधरी 

रविवार, 13 जनवरी 2013

जागृति : यात्रा यादों भरी (भाग एक )

एक यादगार दिन मेरे जीवन का -उर्जा और जोश से लबरेज ,परिवर्तन की लहर का एक हिस्सा बनने के उत्सुक,जुनूनी हम 450 युवा जो देश भर के 24 राज्यों के साथ साथ 13 देशों के 27 अंतर्राष्ट्रीय यात्री हैं टाटा सामाजिक विकास संस्थान ,चेम्बूर में लॉन्चिंग समारोह में -भारतीय संस्कृति की खूबसूरत छटाओं का अवलोकन .जागृति परिवार की-कार्य यात्रा ,उद्देश्य ,परिवार के सदस्यों से परिचय ,उनका परिवार से जुड़ाव ,सब को जानना ;वातानुकूलित कक्ष में उंघते लोगों को (ये तो हम हमेशा करते ही हैं पुनः एनर्जी का रिफिल करने का काम किया सुन्दर और भावपूर्ण जागृति गीत ने जिसे प्रसून जोशी ने कलमबद्ध और बाबुल सुप्रियो ने लयबद्ध ,आदेश श्रीवास्तव ने संगीत निर्देशन किया है ....ये इन दिनों मेरे अन्दर ज़ज्ब हो गया है ....जब भी गुनगुनाती हूँ ,रोंगटे से खड़े हो जाते हैं और यादें ताज़ा हो जाती हैं -                                                                                    

http://youtu.be/2xYJsMtMns8

आई .आई .टी .दिल्ली के भूतपूर्व छात्र शशांक मणि त्रिपाठी की इस नयी सोच की शुरुआत हुई थी 1997 में आज़ादी के 50 सालों के जश्न पर 'आज़ाद भारत की रेल यात्रा ' से जो बाद में 2007 में 'उद्यम के ज़रिये भारत निर्माण ' पर आधारित हो गयी।वन्दे मातरम-इस धरती को सुजलाम सुफलाम बनाने के लिए हम निकले हैं सच्चे भारत की यात्रा पर या आत्म अन्वेषण की यात्रा पर -गाँधी के दांडी मार्च से प्रेरित होकर उन्ही के पदचिन्हों पर चलकर ही 'भारत ' की खोज के लिए शुरुआत हुई थी इस यात्रा की .

इसके बाद हम मिले अपने प्रथम रोल मॉडल से -डब्बावाला के प्रमुख से -



घर से दूर रहने वालों से अच्छा कौन घर के बने खाने की महक की महत्ता समझ सकता है ! मुंबई एक महानगर -हर वक़्त भाग दौड़ में लगा रहने वाला -इंसान को अपने खाने की भी फुर्सत नही ...!
ऐसे में कोई तो है यहाँ जिसे उन तमाम लोगों के भोजन के प्रबंध की चिंता है ...डब्बावाला ! जिससे तकरीबन 2 लाख लोग रोज़ लाभान्वित होते हैं .(2.5 मिलियन -मैन्युअल ट्रांजिट है )-आज तक कोई गलती नही हुई ...या बोले तो त्रुटि की दर 1 इन 16 मिलियन है।
इस तकनीकी ज़माने में बिना किसी तकनीक के सहारे के रोजाना समय पर डब्बे ले जाना और वापस लाना आसन काम नही है - ऐसा प्रबंधन वो भी बिना किसी एम् .बी . ए के ही नही सभी सदस्य अशिक्षित या
अतिअल्प शिक्षित हैं तब ये कर रहे हैं। 114 साल पुराना ये ट्रस्ट लगातार काम करता रहता है -इसमें कोई सेवानिवृत्ति की उम्र नही है .हर एक सदस्य को 40 उपभोक्ताओं के लिए डब्बे लाना लेजाना होता है। लोकल ट्रेन पर ,साइकल्स ,हाथ ठेला ,पर हाथों में 60-65 किलो के टिफ़िन बास्केट्स लिए सर पर सफ़ेद गाँधी टोपी-(ट्रेडमार्क ) लगाये अगर आपको कोई दिखे तो वो डब्बावाला के ही सदस्य हैं . एक बारगी एक घडी ख़राब हो सकती है -पर डब्बावाले नही! आज तक अपनी अंदरूनी वजहों से कोई हड़ताल नही-इनके भी अपने उसूल हैं- काम के दौरान शराब नही,पहचान पत्र और गाँधी टोपी पहनना -नही मानने पर जुर्माना भरना होता है
एक कोडिंग सिस्टम जो माशेलकर जी(प्रमुख) के ही दिमाग की उपज है के अनुसारकाम होता है वरना इतने बड़े मुंबई में 4 लाख डब्बों को लेजाना और वापिस लाना आसान नही है -
चाहे कोई ही क्यूँ न आ जाये वो रोज़ के काम में बाधा नही बन सकता-प्रिंस चार्ल्स ने जब उनसे मिलना चाहा तो उन्होंने कहा कि वे पांच सितारा होटल में नही आयेंगे क्यूंकि काम का वक़्त है-तो उन्हें उनसे मिलने फूटपाथ पर ही आना पड़ा -बड़े गर्व के साथ बताते हैं वे कि आज बर्मिंघम में कोहिनूर के बाजू में उनका डब्बा और सफ़ेद टोपी रखी गयी है .50 प्रभावशाली व्यक्तियों की फेहरिस्त में शामिल हैं वे -गिनीस बुक में दर्ज आदि से बढ़कर उनका काम है-प्रदुषण हीन ,बिना किसी निवेश के ,शांतिपूर्ण तरीके से ,99.99% सेवा ,100% उपभोक्ता की संतुष्टि उनकी विशेषताएं हैं


सचमुच उस एक घंटे में उन्होंने हमें वो सिखा दिया जो शायद किसी प्रबंधन के संस्थान में भी कोई क्या ही सिखाएगा! मंत्रमुग्ध कर दिया उन्होंने और उन के काम ने -लगा कि बड़ी बड़ी डिग्री फीकी पड़ गयी उनके सामने !!!


                              -------------------- स्पर्श चौधरी