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सोमवार, 22 जुलाई 2013

गुरु


गुरु –कोई भी हो सकता है ! सृष्टि के कण कण को ,हर जीव को भगवान् ने बिलकुल अलग और ख़ास बनाया है –सबमें कुछ ख़ास है -कोई किसी के जैसा नही ! इसीलिए जिसे आप बिलकुल अनुपयोगी या मूर्ख प्राणी समझते हैं क्या पता वही आपको आपकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा जाए !! इसीलिए व्यर्थ अहंकार में रहने की बजाय सबको सुनें,समझें,सीखें और इसे स्वीकार करें बिना किसी हिचकिचाहट के चाहे वह व्यक्ति या चीज़ आपको पसंद न हो पर ये तो आपको मानना ही चाहिए कि उसने आपको कुछ सिखाया और शुक्रगुज़ार भी होना पड़ेगा !!इसीलिए कोई एक गुरु नही ; भगवान् की ही नही बल्कि इंसान की कृतियों  को भी अपना गुरु बना सकते हैं –जो आपको सिखा दे वो गुरु ,हाँ अब इसमें बुरे कामों के लिए भी गुरु मिलते हैं इस दुनिया में -अब आप पर निर्भर करता है कि आपको आपके अन्य अच्छे ‘गुरुओं’ की सीख अपनानाकर अपना विवेक और ह्रदय को साथ लेकर चलना है !! सीखने की न तो कोई उम्र होती है न ही वक़्त होता है –इस वक़्त कोई बड़ा उदाहरण देने की बजाय -अक्सर माँ घर पर कहा करती हैं कि काम कोई भी बड़ा छोटा नही होता इसलिए जब कोई अच्छे से सफाई करता है,झाडू लगाता है तो भी वो काबिले तारीफ़ होता है कि कैसे उसने अपने हिस्से का काम परफेक्शन के साथ किया ! तो उस वक़्त इस मामले में वही गुरु !
हमारे जन्म लेने के साथ ही हमारे जीवन को हमारे माता –पिता ही आकार  देना शुरू करते हैं और हम आज जैसे भी हैं  वो उनकी वजह से हैं ,और अगर कभी कोई गलत रास्ते पर जाता है तो उसे सही करने की हर संभव कोशिश भी की जाती है पर चूँकि  संतान पर दूसरों का फर्क भी पड़ता है ,उसे चुनना है कि वो माता पिता जो कभी उसके लिए बुरा नही सोच सकते –अपनी बुद्धि का प्रयोग कर अपने प्रथम गुरुओं का पथ अपनाये !
कभी कभी कला के विविध रूपों ,उसकी रचनाओं ,विचारों में भी अच्छी सीख ढूंढ सकते हैं ,प्रकृति के हर अंश में एक गुरु का तत्व छुपा है !! गुरु और शिष्य का रिश्ता सिर्फ ओहदे का या सम्मान का नही होता ,क्यूंकि कभी कभी कहते हैं न बच्चे भी बड़ों को सिखा देते हैं तब तो वही गुरु हो गये !!
वैसे तो अभी तक और आगे भी औपचारिक रूप की शिक्षा में मुझे जिन्होंने भी पढाया और पढ़ाएंगे वो सम्मानीय हैं क्यूंकि हरेक ने मुझे कुछ न कुछ सिखाया है  पर मेरे  कुछ टीचर्स की  मैं ज़िन्दगी भर आभारी रहूंगी –जिनमें से दो मेरी स्कूल में थीं और कुछ बंसल क्लासेज कोटा में ! मुझे आज भी याद है एक बार क्लास में किसी सिलसिले में जॉर्ज मैडम ने  मुझे लड़कों के बीच बिठा दिया अपने बिलकुल सामने और मैं जो ज़रा अंतर्मुखी हूँ. मन के भाव पढ़ते हुए उन्होंने मुझसे कहा अरे हम तो तुम्हे पी.एम .बनाना चाहते हैं और तुम इतने में ही डर रही हो ! रेड्डी मैडम की वजह से ही कोटा का विचार आया ,नहीं तो घर से इतना दूर जाने का कभी सोचा ही नही था और इसके बाद भी जब मैं उनसे  मिली तो उन्हें मुझपर मुझसे ज्यादा विश्वास था क्यूंकि वो मुझे बहुत अच्छे तरह से जानती थीं ! तो बंसल क्लासेज कोटा में वैसे तो वो कुछ साल मेरी ज़िन्दगी के सबसे बेहतरीन साल थे पर कुछ टीचर्स थे (Vishal joshi sir , A.K.K  sir , M.K.S sir (उनकी सादगी और उनका काम और कंपोज्ड नेचर मुझे बहुत अच्छा लगता था इसके अलावा कि फिज़िक्स मुझे इन्ही से समझ में आई  :p )जिन्होंने इस कठिन तैयारी को बड़ा ही मजेदार और सार्थक बना दिया था जिनके साथ पढने की जब जब यादें ताज़ा होती हैं वो सुखद अनुभूति लाती हैं .
गुरु पूर्णिमा की आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें और भगवान करे आप आगे भी यूँ सीखते रहे और अपने हर गुरु के पाठों को अमल लाकर ज़िन्दगी में सफल और प्रसन्न बनें !!

                                                          ------------- स्पर्श चौधरी 

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

ज़िन्दगी के पन्नों से ३ ...


बारिश हो रही थी| हम 'शाखा' में खेल रहे थे| खेलते-खेलते मेरी चप्पल का कस्सा निकल गया था| 'शाखा' खत्म होने के बाद मैं कस्से को वापस जोड़ने की कोशिश कर रहा था| मुझसे हो नहीं रहा था, तो मेरे एक मित्र मेरे पास आए और कहा, "लाओ, मैं जोड़ देता हूँ कस्सा| आखिर 'जोड़ने' का ही तो कार्य है अपना|
'जोड़ना' अर्थात् देशवासियों को एकता के सूत्र में पिरोना|

लोग और मैं!!

 

एक इंजीनियरिंग की छात्रा होने के बावजूद मुझे मशीनों और फॉर्मूले से कभी ह्रदय से जुड़ाव नही हो पाया या यूँ कहें मैं इस में रस नही ढून्ढ पायी तो मुझे ये नीरस लगता है !   मैंने कई बार कोशिश की कि मैं काफी प्रयासों के बाद आई .आई .टी में आई हूँ तो क्या मुझे उसमें दिल नही लगाना चाहिए ? प्रथम वर्ष तो मैंने अपने को शायद कन्फ्यूज्ड पाया पर फिर भी नए नवेलों को जो कहा जाता है ,नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है की तर्ज़ पर बड़ा जोश चढ़ता है ...तो वे सब कुछ करते हैं ....पढाई भी एक हद तक आने वाले सालों की तुलना में ज्यादा सीरियसली ले लेते हैं  :P धीरे धीरे सब मोह माया लगने लगती है ! :D पर शायद वक़्त से बड़ा गुरु कोई कोई नही होता यह बात तो सब मानते हैं ...समझ में आने लगता है और वो समझ ज़िन्दगी में कही उथल पुथल भी मचाती है ...और फिर कभी कभी बिलकुल सटीक बताती है कि इस दिल को क्या पसंद है !! .. लोगों में मुझे हमेशा रूचि रही है ....अब ,अच्छा -बुरा कुछ  नही होता ...हर किसी में कोई न कोई बुराई और अच्छाई दोनों होती है .देखने और परखने वाला होना चाहिए ! किसी ने कभी मुझसे पूछा कि क्या मैं उससे नफरत करती हूँ या पसंद नही करती हूँ ....तो मैंने कहा ...फिलहाल तो कोई ऐसा नही मिला मुझे जिससे मैं नफरत कर सकूं और अगर कोई नापसंद है तो शायद इसलिए कि हम उसे ज्यादा अच्छे से नहीं जानते !( आप क्या कहते हैं कि क्या बुरे से बुरा इंसान में भी अच्छाई ढून्ढ सकते हैं हम या नही ?) तरह तरह के लोगों से बातें करना रुचिकर तो होता ही है ,कुछ क्षणिक प्रसन्नता भी देता है ....हम अपने दोस्तों से तो अक्सर बातें करते हैं ...उन्हें जानते हैं या फिर जानने का भ्रम रखते हैं पर कितने लोग हैं जो अनजाने को देखकर मुस्काते हैं ,बातें करते हैं या उनकी कोई चीज़ अच्छी लगी हो तो तारीफ करते हैं .....क्या हम इसमें भी कंजूस होते जा रहे हैं ....या फिर ये वही हमारे स्वार्थी स्वाभाव का ही एक हिस्सा है ...या फिर सामने वाला क्या सोचेगा ....अच्छा इंसान है न जान न पहचान ...शुरू कर दी बात ! ...क्या ऐसा सोचने के कारण यह होता है या फिर कोई और वजह? आपने कभी गौर फरमाया है इस बारे में कि लोग और परिस्थितियाँ व्यक्ति को बहुत कुछ सिखा जाते हैं ! जो भी आपकी ज़िन्दगी में मिलता है उसका कोई तो कारण होता ही है और इसीलिए शायद यह बुरा भी है और अच्छा भी कि मुझे अपनी आगे की ज़िन्दगी में वो बातें जो ज़िन्दगी जीने में और उसके उतार चढ़ाव में स्थिर रहने में मदद करेंगी ...वो बातें और लोग ही याद रहेंगे न कि वो सैद्धांतिक पढाई जो पिछले तीन साल से कर रहे हैं ! लोग अक्सर कहते हैं ....कैसा आदमी है ....कितना भाषण  सुना के गया पर उस भाषण में क्या पता कुछ स्वार्थ का मटेरियल मिल जाए !! अलग बात है कि अर्थ हीन और सिर्फ वक़्त बिताने के लिए की जाने वाली बातों का भी अपना अलग महत्व होता है ....क्यूंकि ज़िन्दगी में हंसने के पल ,मज़ाक उड़ाने के पल, और ठहाका लगाने के पल आपको तरोताजा करते हैं ! ज्ञान वाली बातें तो कम लोग पसंद करते हैं और उसे उबाऊ भी समझते हैं ! और ये तो जायज़ है कि हर वक़्त हर कोई सीरियस  नही हो सकता या नही रह सकता ...उसके आनंद ,मनोरंजन के तरीके आप से जुदा हो सकते हैं पर होते तो हैं नही तो उसका दम घुटेगा ! और हर वक़्त खुश रहना सबके बस की बात नही ...ख़ुशी ,हंसी बांटना बेहद मुश्किल काम होता है ! और कई लोग अपना सारा दर्द छुपकर भी मुस्कुराते हैं,जोर जोर से हँसते हैं ,या और भी पागलपन करते हैं  ,मुझे बेहद आश्चर्य होता है ..कैसे ? पर जो भी हो वो भी एक रंग है लोगों का !
क्यूंकि इम्तिहानों के बाद अक्सर सच और भी अच्छे से स्पष्ट हो जाता है !!  ....:) :)
                                                                          ---------- स्पर्श चौधरी 

मंगलवार, 12 मार्च 2013

ज़िन्दगी के पन्नों से ! -3

          
                         

                                                    एक फलसफा और एक दुआ !!                
                          
ज़िन्दगी कब क्या सिखा जाए पता नहीं ! ज़िन्दगी गम का सागर भी है ..हँस के उस पार जाना पड़ेगा ....पिछले कुछ  दिनों ' किशोरदा के इस गीत ने मानों मेरी ज़िन्दगी में अपनी रंगत सचमुच दिखानी शुरू की है ! कभी तो कुछ ऐसा हो जाता है कि मैं अचानक बेहद खुश महसूस  करने लगती हूँ तो कुछ लम्हे मायूस कर जाते हैं .शायद इसे ही ज़िन्दगी कहते हैं !जहां उपलब्धियां ,अपने दिल की मर्ज़ी का काम करने पर मिलने वाली ख़ुशी ...आह्लादित करती है वहीँ कभी कभी पता नही सब कुछ दुखी करता है ....पर हम अपने से जुड़े हर इंसान को अपनी खुशियों और गम में शामिल करते हैं . उनकी सलामती की दुआ करते हैं .उनकी समस्याओं को साझा भी करते हैं और उनके साथ  भी अपनी समस्याओं को साझा करते हैं .हमारी ज़िन्दगी  में 'अपनों' की अहमियत सबसे बढ़कर है।अगर हम आगे बढ़ते हैं तो ये वही होते हैं जो जो शाबाशी देते हैं सबसे पहले ...और गिरते हैं या दिशा भटकते हैं तो भी ये ही हमें प्रेरणा देते हैं .इसीलिए मुझे सबसे ज्यादा अगर किसी चीज़ का डर होता है तो वह है अपनों को खोने का ! यही वजह है कि जागृत या सुप्त अवस्था दोनों में ही मैं अपने शुभचिंतकों ,मित्रों और परिवार के स्नेह की भागीदार हमेशा बनी रहना चाहती हूँ . क्यूंकि आपके 'अपनों' से अधिक इस दुनिया में शायद कोई आपके बारे में सोचेगा ....पर जब अचानक आपको पता चले कि उन्ही में से एक तकलीफ में है ....तो चिंता करना स्वाभाविक है !  ज़िन्दगी सचमुच हर पल एक इम्तिहान है ,अब ईश्वर या प्रकृति ने आपके लिए क्या सोचकर रखा है आप नही जानते .उसके हर इम्तेहान में दरअसल आपको और भी मज़बूत बनाने का रहस्य छुपा होता है ....पर जो भी हो हम खासकर  ऐसे हालातों में थोड़ी देर के लिए विचलित हो उठते हैं ....पर ज़िन्दगी इन सबसे आगे बढ़कर जीने का नाम है ....मेरी माँ की जब दिसंबर २०११  में सर्जरी हुई थी ....मैं हर पल उनकी कुशलता के समाचार के इंतज़ार में रहती थी ....और पहली बार मुझे उन्हें खोने का डर लगा जो हो सकता है अब हास्यास्पद लगता हो ,आज ही भीषण गर्मी और कार्य की अधिकता के कारण पापा बोले थोडा बीमार हूँ तो थोडा चिंता हुई ! पता नही मुझे हमेशा से हॉस्पिटल ,मौत या फिर किसी के जाने के बाद के खालीपन से डर लगता है ...जानती हूँ छोटी मोटी बीमारियाँ तो ज़िन्दगी में होती रहती हैं .लोग तो बड़ी बड़ी बीमारियों से जंग  लड़ आते हैं लेकिन  सिर्फ यही सुनकर कि कोई बीमार है ....भले ही वह औपचारिक मित्र भी हो तो चिंता का एक ख्याल ज़ेहन में आता ही है. माना आजकल यह सब दूसरों के बारे में ज़ज्बाती होना सही नही है .पर हमसे जुड़ा कोई भी हो ....चाहे हमने उससे एक ही बार बात की हो तो भी उसकी कमी और बातें याद आती ही हैं हालाँकि मैं खुशनसीब हूँ कि मुझे भगवान् ने इतने प्यारे लोगों के सुरक्षा और स्नेह के घेरे में रख रखा है पर दुआ करती हूँ जिनके पास अपने नही हों उन्हें मैं भी अपनापन दे पाऊँ क्यूंकि कुछ रिश्ते खून के न होते हुए भी स्नेह और सहयोग के लिए हमेशा तैयार रहते हैं .

तो इस विचार-मंथन से जो बात निकल कर सामने आई कि ये सब ज़िन्दगी का ही हिस्सा है -किसी के भी साथ हो सकता है. ..तो शान्ति से झेलकर उससे बाहर निकल आयें ! और आगे बढें .जब तक साँसे हैं ....इस के इन इम्तिहानों को तो चाहे मजबूरी में चाहे हँसकर पार करना ही है !!

 -स्पर्श चौधरी "

सोमवार, 11 मार्च 2013

ज़िन्दगी के पन्नों से! - 2

कभी कभी मैं सोचती हूँ, कि लोग हमको खुश करने के लिए दो standard बातें बोलते हैं:
first, कि जो होता है, अच्छे के लिए होता है.
second, कि ending तक सब ठीक हो जायेगा.

ऐसा नहीं होता है! ये सब बस कहने की बातें हैं. दूसरों को बहलाना हमेशा आसान होता है, जब खुद की band बजती है, तो ये बातें समझ नहीं आतीं. और ऐसा कहने का क्या logic है कि ending तक सब ठीक हो जायेगा?? कितनी सारी movies होती हैं, जिनकी ending बुरी होती है, और खाली movies ही नहीं, real life में भी कितने सारे लोगों की stories sad होती हैं! कोई हार जाता है, या किसी का बुरा वाला कटता है, तो भी सब आकर उसको यही बोलते हैं कि tension न ले, सब ठीक हो जायेगा! उनको कैसे पता है कि सब ठीक हो जायेगा?? future देख कर तो नहीं बैठे होते न ये लोग!!


ज़िन्दगी के पन्नों से !

         

# ऐसा क्यूँ होता है कि हम जिस चश्मे से देखते हैं हमको सभी वैसे ही दिखाई देते हैं और अगर ऐसा कोई हो भी जो  बिलकुल वैसा न हो तब भी सिर्फ आँखों पर पड़े चश्मे में  वह जैसा दिखेगा हम उसी पर विश्वास करते हैं !! और फिर गलतफहमियाँ   उठती हैं दो लोगों के दरमियान !!   

# मैं यह जानती हूँ कि आजकल के प्रैक्टिकल ज़माने में सब अपने में मगन रहते हैं -काम से काम रखते हैं -पर उन लोगों का क्या -जिन्हें आजकल के वक़्त में बेवकूफ कहा जाता है- क्यूंकि जिनके लिए अगर उनके दिल में थोड़ी सी भी केयर होती है तो उनसे जुडी छोटी सी परेशानी उन्हें भी प्रभावित करती है कहीं न कहीं ....चाहे सामने वाला उन्हें अपना शुभचिंतक मानता हो या दुश्मन या सतही दोस्त ! पर उन्हें लगता है कि दूसरों की चिंता को अपनी चिंता का हिस्सा बनाने की क्या ज़रुरत है किसी को -पर हम उन्हें कभी सराहते नही बल्कि उन्हें अपराध -बोध से ग्रसित कर देते हैं -खैर भावनाओं में बहने का वक़्त कहाँ है हमारे पास! सुम-वेदना -तो दूर की बात है ...वैसे क्या कभी कभी लगता नही आपको कि निःस्वार्थ रूप से 'सब' के बारे में सोचना फ़िज़ूल है आजकल क्यूंकि क्या मालूम आपकी मदद का स्वागत तो दूर आप ही को लोग गलत समझ बैठें -अरे क्या पड़ी है किसी को किसी के फटे में पाँव डालने की भला ! अरे अपने काम से काम रखो न साहब !! और वैसे भी ज्यादा व्यक्तिगत बातें सिर्फ घनिष्ठ -तम मित्रों के साथ साझा होती हैं अक्सर !

   इसीलिए मेरे प्यारे फेसबुक मित्रों माफ़ कीजियेगा आप में से कुछ चुनिन्दा ही हैं जो मेरे नज़दीक हैं सचमुच !!   तो जनाब आप भी फेसबुक से परे ऐसे ही घनिष्ठ मित्रों को पहचानिए और बस उन्ही के साथ दिल खोल के बातें कीजिये क्यूंकि वे ही हैं जो आपको शायद जज नहीं करेंगे वरना तो कहीं आपकी भलमनसाहत उन्हें रास नही आये ! वह क्या है न आजकल सलाह ही ऐसी चीज़ है जो मुफ्त में अगर मिलती है तो लोग उसे संदेह की दृष्टि से देखते हैं -लोग हैरान हो जाते हैं -आदत नही रही न अब ...किया भी क्या जा सकता है -हम जैसे अधिकांश लोगों को देखते हैं उसी तराजू पर सभी को तौलते हैं !!!
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