लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

धर्म और उसके मायने ?

                                हिन्दू हो ,मुस्लिम हो या क्रिस्चियन या कोई और .....धर्म सब एक जैसे हैं मेरे लिए और सभी का मूल उद्देश्य भी एक ही होता है पर क्यूँ ऐसा है कि हम उस धर्म के पीछे ,उसके रिवाजों के पीछे की भावनाओं को तो भूल जाते हैं पर उन रिवाजों को बड़े अच्छे से फॉलो करते हैं ! क्या परंपरा को विवेक और ह्रदय के तराजू पर तौलकर हम ये खुशियाँ नही मना सकते ....क्या सिर्फ 'ऐसा तो होता ही है ' की वजह से ही हम अपने दिलो दिमाग को ठन्डे बस्ते में डालकर करेंगे ?; शायद -शायद कभी तो पढ़े लिखे और समझदार मानुस (भावना छोडिये आप लॉजिक की बात कीजिये ) उस पर प्रश्नचिन्ह लगाते होंगे ! 

मुझे पता है कि ये विवाद का मुद्दा है पर मैं पढ़े लिखे ,समझदार दोस्तों की बात कर रही हूँ ,हर धर्म के ,हर मज़हब के !

क्या कभी आपने ये सवाल नही उठाया कि माँ आप के करवाचौथ करने से सचमुच पापा की उम्र बढ़ जाएगी और अगर आप ये व्रत की बजाय सचमुच उनकी सेहत के लिए कोई उपाय करें तो कैसा रहेगा ? या घनघोर पूजा पाठ से जीवन सुखमय बनता है या अच्छे से ,मेहनत से काम करके छोटी सी प्रार्थना करके भी इंसान खुश रह सकता है ,हमारे यहाँ हिन्दू धर्म में भी काफी समय पहले तक देवी को प्रसन्न करने के लिए बलि चढ़ाई जाती थी ....माँ असुरों के नरमुंड से प्रसन्न होती थीं शायद इसलिए क्यूंकि वे विनाशकारी और बुरे थे पर ये मासूम बच्चों,बच्चियों और पशुओं की बात कहाँ से आई ....नही पता ! ईद पर होने वाली बलियों की जहाँ तक मुझे जानकारी है ,उसका लॉजिक भी आजतक नही समझा मुझे .....मतलब जान लेने पर जश्न या जान लेकर मनाया जाने वाला जश्न .....हर एक धर्म के अपने नकारात्मक पक्ष हैं ....हम हिन्दु भी कम नही हैं ...ढकोसले निभाने के मामले में .....दूसरों को क्या कहें ....ये बताओ हम सबके घरों में कुछ न कुछ ऐसा ही परंपरा के नाम पर फॉलो होता है पर उसके पीछे का कारण जाने की कोशिश कब की हमने ? और की तो क्या उस कारण के साथ साथ वो रिवाज़ को कायम रखने का तरीका बदलना चाहिए वक़्त के साथ ?

# इतने त्यौहार आते हैं न इस देश में ....कि समझ नही आता कि हम भारत वाले काम कैसे और कब कर लेते हैं ! एकता में अनेकता ,विविध रंग भारत के वगैरह वगैरह सब सही है पर क्या उस एसेंस को कायम रख पाए हैं हम ?


सोमवार, 26 अगस्त 2013

मुंबई डायरीज़ –भाग एक


(मेरी  लिखी गयी कुल 4 -5  कविताओं में से ये ‘लोकल ‘ के लिए टिकट की कतार में लगे हुए बाहर ठीक कान्जुर स्टेशन से सटे रहवासों को देखकर ;दो तरह की जिंदगियों के विरोधाभास पर उमड़ते ख्यालों से प्रेरित होकर लिखी गयी है ....लोकल में अगर आपको बैठने को मिल जाए और हाथ में डायरी पैन हो ,लिखने की खुजली हो रही हो तो क्या ही बात ! खैर आगे के पन्ने भी मुंबई से जुड़ी यादों से भरे हैं   )

एक ऐसी भी ज़िन्दगी !
 
झरोखे से झाँकती ज़िन्दगी
ठीक रेल की पटरियों से सटी ;
सरपट भागती रेलें औ’
उससे भी तेज़ भागती यह ज़िन्दगी ,
कहीं तो आलीशान महलों से
सजा है जीवन
तो कहीं मजबूर है कोई
माचिस के डिब्बों से ‘घर’ के हिस्से में
ज़मीं भी ज़रा कुछ कम ही आती है
कुछ अटके हैं आसमां और ज़मी के बीच
तो कुछ रातें कटती हैं तारे गिनते
वहीँ पड़े हैं कुछ भीगे तौलिये
तो कबूतरों ने भी सोचा चलो !
चलो ...आज करें यहीं बसेरा ..
गर भूल गये हों आप
रफ्तारों को ,कतारों को ....
अरे ट्रेन तो पकड़ी ही होगी आपने
आज चलो उसी ‘घर ‘ को चलें

यह रंग भी है अजब ज़िन्दगी का ,
जो दूर से तो फबता है
पर नजदीकियां आँखों में देती हैं चुभन !
ठीक वैसे ही जैसे ये भागती भीड़
यूँ तो नही करती असर
पर जब हम हों हिस्सा उस ‘सैलाब ‘ का
तो कुछ भुनभुनाहट आ जाती है ,
कभी त्योरियाँ चढ़ जाती हैं
तो कभी ‘बढती आबादी ‘लगती खटकने ऐसे ही
वह गज भर की जगह
एक घरौंदा
किसी का ‘सब कुछ ‘ होता है
ताउम्र मोल चुकाएगा कोई उसे अपना बनाने के लिए

ऐसी कितनी जिंदगियों को पार कर
होता है आज का यह ‘ सफ़र ‘ पूरा
और फिर ऐसी भी होती है इक ज़िन्दगी !

मुंबई के ये रंग हर दफ़ा  जब भी मैं आई.आई. टी की दुनिया से बाहर निकलती हूँ मुझसे रूबरू होते हैं.सपनों का शहर –ग्लैमर की चकाचौंध ,कुछ नया करने का सोचने वाला दिमाग ;सभी का यह शहर बाँहें  फैलाये स्वागत करता है –लोकल में बैठे बैठे आज फिर  मैं इसी ज़िन्दगी के अलग-अलग पन्नों को पढ़ रही हूँ !

रहते हुए तीसरा बरस है मेरा यहाँ पर एक घर मेरा भी है –मेरा ठौर ,मेरा हॉस्टल ....कभी कभी सोचती थी कि यार लड़कियों (खासकर ) के लिए मुंबई ही सबसे अच्छा शहर है पढने और जॉब के लिए ...
खैर सब कुछ खेल नज़रिए का ही तो है –हो सकता है किसी को इस शहर ने कडवी यादें दी हों तो कसी को हमेशा के लिए इसे छोड़ने पर मजबूर कर दिया हो ...पर अभी तक मेरे लिए इस शहर के मायने कई हैं .और हर वक़्त पापा के सुरक्षा के घेरे में चलने वाली स्पर्श अब बड़ी हो गयी थी उसे अब हर काम अकेले करना था और ये बड़ा रोमांचक और मजेदार प्रतीत होता था ....और बस इस तरह धीरे धीरे इस शहर से दिल जुड़ गया .....:) J








       

गुरुवार, 15 अगस्त 2013

जलियांवाला बाग़ : इतिहास के झरोखों से 

 स्वतंत्रता दिवस पर विशेष

१३ अप्रैल १९१९ के पहले जलियांवाला बाग़  अन्य किसी सामान्य बाग़ की तरह ही था. स्वर्ण मंदिर के नजदीक स्थित इस बाग़ का नाम जलियावाला इसके पुराने मलिक के नाम पर है . यह बाग़ चारो तरफ से ऊँची दीवालों से घिरा है, जिसके  बाहर निकलने के लिए सिर्फ एक तरफ का संकरा रास्ता है. इस बाग़ में एक कुआँ एवं एक छोटा सा मंदिर भी है. इस वर्ष के  ग्रीष्मावकाश  में मुझे इस तीर्थ के दर्शन का  अवसर मिला.


आज यहाँ बेहद शांति है. आसमान में सूरज निखर आया है . बड़ी संख्या में लोग इस बाग़ में घुमने आये हैं.  विश्वास ही नहीं होता यहीं वह जगह है , जहाँ कभी जनरल डायर संकरे रास्ते से कुछ सैनिको के साथ आ कर एक निहत्थी सभा कर रहे लोगों पर गोलियां चलाता है.


जलियाँवाला बाग़ में प्रवेश का संकरा रास्ता




जरा कैलेण्डर को पीछे घुमा कर देखते हैं.  
अप्रैल १९१९ , सारे देश की तरह अमृतसर शहर में भी महात्मा गाँधी के आह्वान पर सत्याग्रह का आन्दोलन जोड़ पकड़ने लगता है. ६ अप्रैल १९१९ को अमृतसर में एक आम हड़ताल रखी जाती है. आज  ९ अप्रैल रामनवमी का दिन है. सत्याग्रह के समर्थन में एक बड़ी रैली निकाली जा रही है. इस रैली के नेता डॉ सैफुदीन किचलू एवं डॉ सत्यपाल को पुलिस गिरफ्तार करके धर्मशाला भेज देती है.


 डॉ सैफुदीन किचलू 

डॉ सत्यपाल 
अगले दिन कुछ लोग उप कमिश्नर से मिलकर इन दोनों के रिहाई के लिए ज्ञापन देना चाहते है. लेकिन इनके ऊपर गोलियां चला दी जाती है. शहर में हिंसा भड़क उठती है, बेंक एवं रेलवे स्टशन को निशाना बनाया जाता है. फिर १२ अप्रैल को दो अन्य स्थानीय नेताओ चौधरी बग्गामल और महाशय रतनचंद को गिरफ्तार किया जाता है. शहर के नागरिक प्रशासन की जिम्मेवारी ब्रिगेडियर जनरल आर ई अच् डायर को दे दी जाती है. जो शहर में कफ्यू लगाता है एवं अपने सैनिको को किसी को सड़क पर देखते ही गोली मारने का आदेश देता है. लेकिन इस बात की सूचना का प्रचार नागरिको के बीच नहीं कराया जाता है.
१३ अप्रैल १९१९ , आज बैशाखी का दिन है. जालियावाला बैग में शाम में एक आम सभा हो रही है.  सूर्यास्त होने में कुल १० मिनट के करीब शेष रहे होंगे. लेकिन तभी जनरल डायर १५० सैनिको के साथ यहाँ दाखिल होता और अंधाधुंध गोलियां चला देता है. लोग जान बचाने की लिए जमीन पर लेट रहे है. तो कोई आवेश में आकर आगे बढ़ रहा है. कई लोग कुएं  में कूद कर जान बचाने की कोशिश कर रहे हैं. 
शहीदी कुआँ 
लेकिन तभी गोलियां उधर चलने लगती है. लोग दीवारों पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं,
दीवारों पर गोलियों के निशान 
  डायर उन दीवारों की तरफ अपने सैनिको को इशारा कर रहा है. गोलियां चलती है, लोग गिर जाते हैं. चारो तरफ से चीखें हैं, क्रंदन हैं , लाशें हैं. सूर्यास्त हो चूका है . करीब ४०० लोग दम तोड़ चुके हैं .शहर में कफ्यू है, लोग अपने मित्रो को इलाज या  अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं ले जा पा रहे हैं.

केलेंडर को फिर समेटते हैं, और वर्तमान मैं लौटते है.
भाई साहेब थोडा सा हतियेगा , एक तस्वीर निकालनी है.
जरुर साब जी ..
शहीद स्मारक 

हँसते खिलते बच्चे एवं उनके परिवार शहीद स्मारक के  नजदीक जा कर फोटो के लिए पोज दे रहे है.  बाग़ के एक और एक छोटा सा संग्रहालय है, जहाँ इस घटना, उस समय के समाचार पत्रों में इसके कवरेज एवं तात्कालिक परिस्थितयों के बारे में विस्तार से  लिखा है. रविन्द्रनाथ टगोर द्वारा सर की उपाधि वापस करने से लेकर चर्चिल के ब्यान तक मौजूद है.  लेकिन मुझे दुःख इस बात का लगा, बहुत खोजने पर भी मुझे कोई ऐसा दस्तावेज या डायरी देखने को नहीं मिला ,जहाँ शहीद हुए सभी लोगों का नाम या तस्वीर उपलब्ध हो . हाँ यदा कदा कुछ संस्मरणों में कुछ शहीदों की तस्वीरें एवं उनकी कहानियां जरुर लिखी है. यह सही है, उनकी शहीदी किसी नाम या परिचय का मोहताज नहीं , वो सब अपने वतन पर मिटने वाले लोग थे. लेकिन  हमारी जनतांत्रिक सरकार इस दिशा में थोडा पहल तो कर ही सकती है. 

सग्रहालय में बनी एक पेंटिंग 

- नेपथ्य निशांत 

आज़ादी और कुछ सवाल !!

    
आज़ादी के कुछ छियासठ साल पूरे होने को आये हैं ! और हर बार हम सोचते हैं कि शायद अगले साल हम कुछ बेहतर होंगे पर बेहतरी का तो पता नही हम अपने मानकों से नीचे ज़रूर गिरते नज़र आ रहे हैं.हाल ही की ख़बरों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि सी.बी.आई. तो अभी भी ‘आज़ाद’ नही हो पायी और न ही इस ‘ तथाकथित ‘लोकतांत्रिक देश में राजनीतिक दलों से यह सहन हुआ कि सूचना के अधिकार के तहत ही सही उन्हें चुनने वाले आम लोग उनसे कोई सवाल पूछ सकें ! हाल ही में देश में संविधान निर्देशित कुछ अधिकारों से जुड़े गंभीर प्रश्न हमारे समक्ष और भी डटकर खड़े हो गये हैं मसलन क्या देश के नौनिहालों को साफ सुथरे माहौल में पोषक आहार पाने का अधिकार नही है ,क्या एक गरीब की पेट की आग और उसकी ज़िन्दगी इतनी सस्ती है ?; क्या समाज के एक तबके से उनकी आजीविका के अधिकार को छीनने के बाद उनसे जीने की सभी उम्मीदें भी ले लेना चाहिए ,जितनी संवेदना सुरक्षा को लेकर है क्या वो इस बात की अनुमति देती है कि आप उसी तबके की ज़िन्दगी गर्त में धकेल दें ;क्या भाषा और अन्य के आधार पर बँटता जा रहा यह देश पहले से ही नक्सलवाद जैसे आन्तरिक शत्रुओं से नही जूझ रहा है और पहले से ही हज़ार हिस्सों में बंटा हुआ है !क्या एक माँ जिसके पहले से ही इतने सारे बच्चे हों और सब किसी न किसी समस्या से जूझ रहे हों तब एक और बच्चे का जन्म क्या कुछ बेहतर करेगा ?;क्या इससे बाकी बच्चे भी बिदक नहीं जायेंगे ?क्या ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा को पालने वालों को ऐसे ही ‘तोहफे’ मिलते रहेंगे ? ;क्या सभी गलतियाँ सरकार की हैं या हम और हमारा समाज जो इस देश को बनाता है -भी इसके कहीं न कहीं ज़िम्मेदार हैं ? क्या एक लोकतंत्र में अपने अधिकारों के तहत राजनीतिक दलों से सवाल पूछने का हक बेमानी है ? क्या हम सचमुच ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी ‘का जश्न मना सकते हैं इतने सालों बाद भी पूरी तरह ? क्या पुलिस ,क़ानून की असंवेदनशीलता को अब भी हम चुपचाप झेलने की हालत में हैं ? क्या अब भी हम स्वार्थी बने रहना चाहते हैं ;क्या अब भी हम छोटे छोटे ,निरर्थक और अनावश्यक प्रपंचों और बातों में पड़े रहकर अपने देश की नैय्या को डूबते रहने देना चाहते हैं क्यूंकि हम उन अभागों में से नही हैं जिनके लिए ज़िन्दगी का हर दिन एक जंग के बराबर है !!

खैर प्रश्नों की यह फेहरिस्त निहायत ही लम्बी है पर अब हरेक को गिनाने की शायद ज़रुरत नही होगी क्यूंकि ये सवाल कहीं न कहीं हम में से हरेक की ज़िन्दगी और वजूद से राब्ता रखते हैं इसीलिए यह कुछ सवाल आपके विवेक और ज़ज्बे को जगाने के लिए काफी हैं !! वो ज़ज्बा जो सिस्टम की गंदगी की दुर्गन्ध से नाक मुंह को सिकोड़ने की बजाय खुद उस में उतरने कर उसे साफ़ करने का हो ,जोकि हमेशा सरकार जो हमारे ही वोटों से बनी है उसे उसके काम तो याद दिलाये ही पर खुद हमें भी एक नागरिक के कर्त्तव्य और ज़िम्मेदारी का भी एहसास कराये क्यूंकि अपने गिरेबान में झांकेंगे तो पाएंगे कि उसे आका हमने ही बनाया है और वो हमारे जैसा ही एक इंसान है!

कहते हैं एक लकीर को ऐसे छोटा किया जा सकता है कि हम उसके सामने एक और बड़ी लकीर खींच दें तो बस हमें वही करना है सरकार की लकीर को अगर सीधा करना संभव हो तो करो नही तो जी जान लगाकर एक इतनी बड़ी लकीर खींचों कि सब की नज़रें बस अब उस नयी लकीर पर हो !! वैसे एक बात जो अक्सर हमारे जैसे सोशल नेटवर्क पर बात करने वालों को शायद सुनने को मिलती हो कि क्या हो जायेगा चर्चा करके,लिखके , एक पेटिशन साईन करके तो ऐसे लोगों के लिए मेरे चेहरे पर एक मंद सी मुस्कराहट आ जाती है और एक ही जवाब जोकि एक प्रश्न है-होता है कि क्या आप अभी भी जनता याने कि खुद की आवाज़ ,दबाव और ताक़त से नावाकिफ हैं ? दरअसल हमारी पीढ़ी को ‘प्रवचन’ सुनने की आदत नही है इसीलिए ऐसे लोगों के साथ तर्क वितर्क शायद कोई परिणाम ना लाये पर जब आप खुद से ये सवाल करेंगे तो पायेंगे कि भले ही इस देश में कितना गड़बड़ घोटाला हो रहा हो ,कितनी ही ‘दुर्गा’ सज़ा पा रही हों ,कितनी ही निर्भया बेआबरू हो रही हों पर इन मुद्दों पर चर्चा और न्याय की संस्थाओं को हिलाने का माद्दा आज भी हमारे पास सुरक्षित है !! क्यूंकि वो ‘शौर्य ‘ ,वो आतंक, तानाशाही और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना न सिर्फ हमारी ज़रुरत है बल्कि वक़्त की बेसब्र मांग भी है !!

(आप कॉर्पोरेट जॉब में हैं ,ढेरों बधाईयाँ !! पर जनाब मैक डोनाल्डस में खाने वाले ,एयर कंडिशनर की हवा में मुस्कुराने वाले आप –कभी यह ख्याल नही आता आपके दिमाग में कि देश तकनीकी तरक्की काफी कर चुका है और उसकी फ़िक्र करने वाले बैठे हैं न संसद में पर नंगे भूखे ‘हल्कू’ की तकलीफ की कहानियाँ सिर्फ कचौरी खाकर फेंक दिए गये अख़बार के टुकड़े में दबी कूड़ेदान में चली जाती हैं !! )
तो बस हमारे जैसे और आपके जैसे युवाओं की ,जोशीले लोगों की ज़रुरत है इस मुल्क को वरना कहीं हम फिर से ‘देसी’ हुकूमत के गुलामी के शिकंजे में जकड न जायें !!
उठो ,जागो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति तक न रुको (स्वामी विवेकानंद)
                                                                                            - स्पर्श चौधरी 

सोमवार, 22 जुलाई 2013

गुरु


गुरु –कोई भी हो सकता है ! सृष्टि के कण कण को ,हर जीव को भगवान् ने बिलकुल अलग और ख़ास बनाया है –सबमें कुछ ख़ास है -कोई किसी के जैसा नही ! इसीलिए जिसे आप बिलकुल अनुपयोगी या मूर्ख प्राणी समझते हैं क्या पता वही आपको आपकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा जाए !! इसीलिए व्यर्थ अहंकार में रहने की बजाय सबको सुनें,समझें,सीखें और इसे स्वीकार करें बिना किसी हिचकिचाहट के चाहे वह व्यक्ति या चीज़ आपको पसंद न हो पर ये तो आपको मानना ही चाहिए कि उसने आपको कुछ सिखाया और शुक्रगुज़ार भी होना पड़ेगा !!इसीलिए कोई एक गुरु नही ; भगवान् की ही नही बल्कि इंसान की कृतियों  को भी अपना गुरु बना सकते हैं –जो आपको सिखा दे वो गुरु ,हाँ अब इसमें बुरे कामों के लिए भी गुरु मिलते हैं इस दुनिया में -अब आप पर निर्भर करता है कि आपको आपके अन्य अच्छे ‘गुरुओं’ की सीख अपनानाकर अपना विवेक और ह्रदय को साथ लेकर चलना है !! सीखने की न तो कोई उम्र होती है न ही वक़्त होता है –इस वक़्त कोई बड़ा उदाहरण देने की बजाय -अक्सर माँ घर पर कहा करती हैं कि काम कोई भी बड़ा छोटा नही होता इसलिए जब कोई अच्छे से सफाई करता है,झाडू लगाता है तो भी वो काबिले तारीफ़ होता है कि कैसे उसने अपने हिस्से का काम परफेक्शन के साथ किया ! तो उस वक़्त इस मामले में वही गुरु !
हमारे जन्म लेने के साथ ही हमारे जीवन को हमारे माता –पिता ही आकार  देना शुरू करते हैं और हम आज जैसे भी हैं  वो उनकी वजह से हैं ,और अगर कभी कोई गलत रास्ते पर जाता है तो उसे सही करने की हर संभव कोशिश भी की जाती है पर चूँकि  संतान पर दूसरों का फर्क भी पड़ता है ,उसे चुनना है कि वो माता पिता जो कभी उसके लिए बुरा नही सोच सकते –अपनी बुद्धि का प्रयोग कर अपने प्रथम गुरुओं का पथ अपनाये !
कभी कभी कला के विविध रूपों ,उसकी रचनाओं ,विचारों में भी अच्छी सीख ढूंढ सकते हैं ,प्रकृति के हर अंश में एक गुरु का तत्व छुपा है !! गुरु और शिष्य का रिश्ता सिर्फ ओहदे का या सम्मान का नही होता ,क्यूंकि कभी कभी कहते हैं न बच्चे भी बड़ों को सिखा देते हैं तब तो वही गुरु हो गये !!
वैसे तो अभी तक और आगे भी औपचारिक रूप की शिक्षा में मुझे जिन्होंने भी पढाया और पढ़ाएंगे वो सम्मानीय हैं क्यूंकि हरेक ने मुझे कुछ न कुछ सिखाया है  पर मेरे  कुछ टीचर्स की  मैं ज़िन्दगी भर आभारी रहूंगी –जिनमें से दो मेरी स्कूल में थीं और कुछ बंसल क्लासेज कोटा में ! मुझे आज भी याद है एक बार क्लास में किसी सिलसिले में जॉर्ज मैडम ने  मुझे लड़कों के बीच बिठा दिया अपने बिलकुल सामने और मैं जो ज़रा अंतर्मुखी हूँ. मन के भाव पढ़ते हुए उन्होंने मुझसे कहा अरे हम तो तुम्हे पी.एम .बनाना चाहते हैं और तुम इतने में ही डर रही हो ! रेड्डी मैडम की वजह से ही कोटा का विचार आया ,नहीं तो घर से इतना दूर जाने का कभी सोचा ही नही था और इसके बाद भी जब मैं उनसे  मिली तो उन्हें मुझपर मुझसे ज्यादा विश्वास था क्यूंकि वो मुझे बहुत अच्छे तरह से जानती थीं ! तो बंसल क्लासेज कोटा में वैसे तो वो कुछ साल मेरी ज़िन्दगी के सबसे बेहतरीन साल थे पर कुछ टीचर्स थे (Vishal joshi sir , A.K.K  sir , M.K.S sir (उनकी सादगी और उनका काम और कंपोज्ड नेचर मुझे बहुत अच्छा लगता था इसके अलावा कि फिज़िक्स मुझे इन्ही से समझ में आई  :p )जिन्होंने इस कठिन तैयारी को बड़ा ही मजेदार और सार्थक बना दिया था जिनके साथ पढने की जब जब यादें ताज़ा होती हैं वो सुखद अनुभूति लाती हैं .
गुरु पूर्णिमा की आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें और भगवान करे आप आगे भी यूँ सीखते रहे और अपने हर गुरु के पाठों को अमल लाकर ज़िन्दगी में सफल और प्रसन्न बनें !!

                                                          ------------- स्पर्श चौधरी 

बुधवार, 5 जून 2013

आइये जाने # 2 विश्व पर्यावरण दिवस

विश्व पर्यावरण दिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा सकारात्मक पर्यावरणकार्य हेतु दुनियाभर में मनाया जाने वाला सबसे बड़ा उत्सव है। पर्यावरण औरजीवन का अन्योन्याश्रित संबंध है तथापि हमें अलग से यह दिवस मनाकर पर्यावरणके संरक्षण, संवर्धन और विकास का संकल्प लेने की आवश्यकता पड़ रही है। यहचिंताजनक ही नहीं, शर्मनाक भी है। पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर सन् 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टाकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों कापहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया। इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहलीबारएक ही पृथ्वी का सिद्धांतमान्य किया। इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP)का जन्म हुआ तथा प्रति वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस आयोजित करके नागरिकों को प्रदूषण की समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया गया। तथा इसका मुख्य उद्देश्यपर्यावरण के प्रति जागरूकता लाते हुए राजनीतिक चेतना जागृत करना और आम जनताको प्रेरित करना था। उक्त गोष्ठी में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 'पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभाव' विषय पर व्याख्यान दिया था। पर्यावरण-सुरक्षा की दिशा में यह भारत का प्रारंभिक क़दम था। तभी से हम प्रति वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते आ रहे हैं।

दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक,भारत हरित अर्थव्यवस्था बनने का प्रयास कर रहा है। नए सर्वेक्षण में खुलासा हुआहै कि भारतीय लोग आर्थिक वृद्धि पर पर्यावरण रक्षा को मामूली रूप सेप्राथमिकता देते हैं। अमेरिका की प्रमुख सर्वेक्षण एजेंसी गैलपने अपने ताजा सर्वेक्षण में कहा किज़्यादातर आबादी अर्थव्यवस्था से ज़्यादा पर्यावरण पर ध्यान केंद्रित किएहुए हैं। गैलप की मानें तो भारत ने वैश्विक भूभाग पर हरित क्षेत्र कोबढ़ाने के उल्लेखनीय प्रयास किए हैं। इसकी एक बानगी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली है, जहाँ हाल के वर्षो में हरित क्षेत्र में वृद्धि दर्ज की गई है। दिल्लीका लगभग 20 फीसदी हिस्सा वनों से ढका हुआ है। सरकार ने अगले कुछ सालों में इसे बढ़ाकर 25 फीसदी करने का लक्ष्य रखा है।

शनिवार, 27 अप्रैल 2013

लोग और मैं!!

 

एक इंजीनियरिंग की छात्रा होने के बावजूद मुझे मशीनों और फॉर्मूले से कभी ह्रदय से जुड़ाव नही हो पाया या यूँ कहें मैं इस में रस नही ढून्ढ पायी तो मुझे ये नीरस लगता है !   मैंने कई बार कोशिश की कि मैं काफी प्रयासों के बाद आई .आई .टी में आई हूँ तो क्या मुझे उसमें दिल नही लगाना चाहिए ? प्रथम वर्ष तो मैंने अपने को शायद कन्फ्यूज्ड पाया पर फिर भी नए नवेलों को जो कहा जाता है ,नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है की तर्ज़ पर बड़ा जोश चढ़ता है ...तो वे सब कुछ करते हैं ....पढाई भी एक हद तक आने वाले सालों की तुलना में ज्यादा सीरियसली ले लेते हैं  :P धीरे धीरे सब मोह माया लगने लगती है ! :D पर शायद वक़्त से बड़ा गुरु कोई कोई नही होता यह बात तो सब मानते हैं ...समझ में आने लगता है और वो समझ ज़िन्दगी में कही उथल पुथल भी मचाती है ...और फिर कभी कभी बिलकुल सटीक बताती है कि इस दिल को क्या पसंद है !! .. लोगों में मुझे हमेशा रूचि रही है ....अब ,अच्छा -बुरा कुछ  नही होता ...हर किसी में कोई न कोई बुराई और अच्छाई दोनों होती है .देखने और परखने वाला होना चाहिए ! किसी ने कभी मुझसे पूछा कि क्या मैं उससे नफरत करती हूँ या पसंद नही करती हूँ ....तो मैंने कहा ...फिलहाल तो कोई ऐसा नही मिला मुझे जिससे मैं नफरत कर सकूं और अगर कोई नापसंद है तो शायद इसलिए कि हम उसे ज्यादा अच्छे से नहीं जानते !( आप क्या कहते हैं कि क्या बुरे से बुरा इंसान में भी अच्छाई ढून्ढ सकते हैं हम या नही ?) तरह तरह के लोगों से बातें करना रुचिकर तो होता ही है ,कुछ क्षणिक प्रसन्नता भी देता है ....हम अपने दोस्तों से तो अक्सर बातें करते हैं ...उन्हें जानते हैं या फिर जानने का भ्रम रखते हैं पर कितने लोग हैं जो अनजाने को देखकर मुस्काते हैं ,बातें करते हैं या उनकी कोई चीज़ अच्छी लगी हो तो तारीफ करते हैं .....क्या हम इसमें भी कंजूस होते जा रहे हैं ....या फिर ये वही हमारे स्वार्थी स्वाभाव का ही एक हिस्सा है ...या फिर सामने वाला क्या सोचेगा ....अच्छा इंसान है न जान न पहचान ...शुरू कर दी बात ! ...क्या ऐसा सोचने के कारण यह होता है या फिर कोई और वजह? आपने कभी गौर फरमाया है इस बारे में कि लोग और परिस्थितियाँ व्यक्ति को बहुत कुछ सिखा जाते हैं ! जो भी आपकी ज़िन्दगी में मिलता है उसका कोई तो कारण होता ही है और इसीलिए शायद यह बुरा भी है और अच्छा भी कि मुझे अपनी आगे की ज़िन्दगी में वो बातें जो ज़िन्दगी जीने में और उसके उतार चढ़ाव में स्थिर रहने में मदद करेंगी ...वो बातें और लोग ही याद रहेंगे न कि वो सैद्धांतिक पढाई जो पिछले तीन साल से कर रहे हैं ! लोग अक्सर कहते हैं ....कैसा आदमी है ....कितना भाषण  सुना के गया पर उस भाषण में क्या पता कुछ स्वार्थ का मटेरियल मिल जाए !! अलग बात है कि अर्थ हीन और सिर्फ वक़्त बिताने के लिए की जाने वाली बातों का भी अपना अलग महत्व होता है ....क्यूंकि ज़िन्दगी में हंसने के पल ,मज़ाक उड़ाने के पल, और ठहाका लगाने के पल आपको तरोताजा करते हैं ! ज्ञान वाली बातें तो कम लोग पसंद करते हैं और उसे उबाऊ भी समझते हैं ! और ये तो जायज़ है कि हर वक़्त हर कोई सीरियस  नही हो सकता या नही रह सकता ...उसके आनंद ,मनोरंजन के तरीके आप से जुदा हो सकते हैं पर होते तो हैं नही तो उसका दम घुटेगा ! और हर वक़्त खुश रहना सबके बस की बात नही ...ख़ुशी ,हंसी बांटना बेहद मुश्किल काम होता है ! और कई लोग अपना सारा दर्द छुपकर भी मुस्कुराते हैं,जोर जोर से हँसते हैं ,या और भी पागलपन करते हैं  ,मुझे बेहद आश्चर्य होता है ..कैसे ? पर जो भी हो वो भी एक रंग है लोगों का !
क्यूंकि इम्तिहानों के बाद अक्सर सच और भी अच्छे से स्पष्ट हो जाता है !!  ....:) :)
                                                                          ---------- स्पर्श चौधरी 

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

क्या अपराधों की जन्मभूमि बन रही है राजनीति !




राजनीति के  एकदम सफेद चक गलियारों में आज ताज़े खून के धब्बों  का होना कोई नई या ख़ास खबर नही है ! राजनीति के मायने अब बदल गये हैं .वैसे राजनीति के खेल तो ऐसे ही चलते आये हैं बरसों से पर अब राजनीति की आड़ में अपराधियों को खासी पनाह मिल रही है या यह कहिये कि उन्हें इस सफ़ेद पोशाक का जो नाजायज़ फायदा मिल रहा है वो अब अपराध की श्रेणी में आ चुका है .इसमें कोई दो राय नही कि वोट बैंक की खातिर  नेतागण कुछ भी कर सकते हैं .1992 के बाबरी विध्वंस को क्यूँ नही रोका गया ....सामने खड़े होकर सत्तादल के कार्यकर्ता तमाशा देखते रहे क्यूँ ..कहीं बहुसंख्यक हिन्दु भड़क गये तो .....! 
     अब राजनीति में प्रवेश करने की वजह जनता की सेवा नही रह गयी है . अब नेतागिरी का मतलब अधिकांशतः सिर्फ सत्ता में आना और सत्ता के नाम पर गुंडागर्दी को शह देना  रह गया है ताकि आम लोगों पर उनका रौब बना रहे .इसी खौफ के चलते लोग इनकी हरक़तों का विरोध करने से भी खार खाते हैं ,क्यूंकि अगर इनमें से कोई भी सच्चाई का साथ देने के लिए आगे बढ़ता है तो उसे रोकने के लिए ये गुंडे-नेता अपने छुटभैय्ये आदमियों से उनके इन बढ़ते कदमों को रुकवा देते हैं ;उन्हें और उनके करीबियों को जान  से ही मरवा देते हैं ! ' हमसे जो टकराएगा वो चूर चूर हो जाएगा ' की धमकियों के ज़रिये लोगों में दहशत फैला देने से  उनके राजनीतिक मंसूबे पूरे होने में कोई खलल भी नही होता  !! उत्तरप्रदेश ,बिहार ,राजस्थान और मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में तो खुल्लमखुल्ला धड़ल्ले से क़ानून और खाकी वर्दी को ठेंगा दिखाकर या फिर उसकी कुछ कमज़ोर कड़ियों को अपने साथ मिलाकर संविधान और जिन मतदाताओं के कारण वे कुर्सी पर काबिज़ हुए हैं उन्ही का बड़ी बेशर्मी से मखौल उड़ा रहे हैं ! और इन्ही हिस्सों में ही क्यूँ अब तो सभी जगह खासकर भारत में तो राजनीति आपको सारे अधिकार दे देती है -सारे -किसी की इज्ज़त लूटने का,किसी को अगवा करवाने का ,किसी की हत्या करवाने का ,और हर किस्म का कोई भी अत्याचार करने का ! क्यूँ ...अरे भाई हम तो नेता हैं ..नेता ! हमें कौन पकड़ेगा और अगर जाँच के घेरे में आ भी गये तो हम  हाथ पर हाथ धरे यूँ अपनी कुर्सी और इज्ज़त को जाते हुए देखते रहेंगे क्या भैय्या ?  ... तभी तो 'हम ' अभी तक उस मुस्लिम पुलिस अधिकारी के केस में गिरफ्तार नही हुए ....अरे ऐसे ही थोड़ी न 'राजा भैय्या 'कहलाते हैं हम ;हमारी लोगों तक पहुँच,रुतबा ,हमारे कार्यकर्ताओं की पकड़ के कारण तो मुख्यमंत्री साहब ने भी;  हमारे नाम पर इतने अपराध दर्ज होने के बाद भी हमें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया ;सी.बी. आई .तक को चकमा दे दिए हम ! हाँ अब ये इस्तीफ़ा देना तो लोगों का मुँह बंद कराने का एक तरीका है ...वो क्या है न अभी चुनावों में तो जनता ही हमारी इष्ट है !! तो उनके क्रोध को तो शांत करना होगा न !! 
         अब इन्ही महाशय सचिन सूर्यवंशी को देख लीजिये ,ये ठहरे वर्ली चौकी के एक अदने से नए नवेले सब-इंस्पेक्टर और हमें ही ट्रैफिक के कायदे कानून सिखाने चले थे .....अब खुद ही अपनी नौकरी से हाथ धो लिए न !! अब थोड़ी न हमारे साथी ऍम .एल. ए .चुप बैठेंगे .....!!!!   इतना ही नही हम चाहे किसी सामूहिक बलात्कार केस के आरोपों को भी नकार सकते हैं ....थोड़ी न मनाही है कि कोई तथाकथित 'बलात्कारी  ' संसद जैसी गरिमा वाले स्थल में नही प्रवेश कर सकते .!! 

प्रिय पाठक-पाठिकाओं  ,दरअसल अपराध आज राजनीति के अन्दर इस हद तक  समाविष्ट हो चुका है कि ज़ेहन में इस विषय में बेहद क्षोभ भरा हुआ है जो उपर्युक्त  शब्दों में इस  त्रासदी  के उदाहरण के व्यंग्यात्मक  रूप में बाहर निकला है !! आंकड़ों पर जाए बिना ही हम सभी जानते हैं कि राजनीति की गोटियाँ खेलने वाले हर शख्स को किन नज़रों से देखा जाता है और हो भी क्यूँ न !
           बहरहाल  आज कितने युवा हैं जो राजनीति में जाना चाहते हैं?-खुद मुझे भी जनता की सेवा करने के लिए राजनीति बेहद कठिन परन्तु सटीक उपाय सूझ पड़ता है पर परिवार इस बात से असहमत है क्यूंकि अब तो 'डर्टी पॉलिटिक्स ' ही शेष रह गयी है- एक आम युवा जो संवैधानिक अधिकारों और शक्ति के बल पर जनता की समस्याओं को हल करना चाहता है वो भी ऐसा सोचने से डरता है क्यूंकि जो हैं वो उन्हें सीधे साधे थोड़ी न टिकने देंगे और वैसे भी एक सड़ी हुई मछली सारे तालाब को ख़त्म कर देती है फिर यहाँ तो सारा तालाब ही दुर्गन्ध से सराबोर है -अब कोई दूसरी स्वस्थ  मछली वहाँ  कितने दिन टिक पायेगी !! राजनीति और जनता के मतों के दम पर चुन कर आये हुए उनके प्रतिनिधि होने का अब सिर्फ मिथक रह गया है ...सब अपने स्वार्थ तो पूरे कर ही रहे हैं पर उन स्वार्थों को पूरा करने के लिए लोगों की जान,इज्ज़त, और भी सब कुछ छीन लेने में कोई हिचकिचाहट नही होती इन्हें !
             संसद में बैठकर एंटी-रेप बिल के बारे में चर्चा में वे सांसद भी शामिल थे जिनके खिलाफ खुद मोलेस्टेशन और बलात्कार के संगीन जुर्म दर्ज थे ! कितनी बेशर्मी की  बात है यह -क़ानून को अपने हाथों का खिलौना समझने वाले क़ानून बनाते हैं इस देश में ! चुनाव आयोग जो एक स्वतंत्र इकाई है विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के कार्यकारी विभाग की  -वह कैसे ऐसे हत्यारों,दुष्कर्मियों को चुनाव लड़ने की अनुमति दे सकता है ! तो राजनीति से अपराध की गंदगी दूर करना भले ही कितना मुश्किल हो पर नामुमकिन नही है -अगर अच्छे मूल्यों वाले  युवा राजनीति में आयें और देश की संवैधानिक ईकाईयाँ बेख़ौफ़ होकर अपने अधिकारों का बखूबी प्रयोग करके अपना फ़र्ज़ निभाएं !!  

रविवार, 7 अप्रैल 2013

कौन हैं भ्रष्ट?



आज पूरा भारत क्रांति के पथ  पर  अग्रसर हैं। क्रांति- इस देश से भ्रष्टाचार को मिटाने की।

एक तिहत्तर साल का वृद्ध पुरुष जब अनशन किए इस देश से गुहार लगा रहा है तो सबसे बड़ी

तादाद मे युवा पीढ़ी उनकी समर्थन मे आगे बढ़ रही है। बड़े बड़े घोटालो के खुलासे हो रहे है – कभी

2जी को कभी जीजाजी( रोबर्ट वदरा केस) तो कभी कोल-गेट।

लेकिन सवाल ये है कि- क्या यह भ्रष्ट भारत इनहि मंत्रियों और ऊंचे पदो पर बैठे देश के लुटेरो

तक सीमित है ?

जब मैं अपने घर मे शीत का अवकाश खुशी से मना रहा था तो मैं इस सवाल पर सोचने के लिए

विवश हो उठा। जब झारखंड सरकार बिजली के उत्पादन और वितरण की ज़िम्मेदारी असार्वजनिक

संगठनो के हाथों मे सौपने का निर्णय लिया, तो झारखंड राज्य बिजली मण्डल ने विरोध के रूप

मे पूरे राज्य को अंधकार मे पिरो दिया। हमारे घरों मे छत्तीस घंटो तक बिजली नहीं आई। मैंने

इस मसले के बारे मे पता करने की कोशिश की पहले क्या समस्या थी जो सरकार ने ऐसा कदम

उठाने का फैसला किया। अगर हम सिर्फ अपने जिले की बात करे तो ये ज्ञात हुआ की लगभग 5

करोड़ की बिजली हुमे सरकार की तरफ से दी जाती है। लेकिन जनता से सिर्फ 50-60 लाख तक

ही राशि का संग्रह हो पता है।इसके अलावा बिजली विभाग के सभी कर्मचारियों और मजदूरों की

पगार!! क्या है इसका कारण? भ्रष्टाचार!!

इन मजदूरो को लोग पचास रुपये देते है और ये आसानी से बिजली के खंबों पर छड़कर उनके घरो

को रोशनी से उजागर कर देते है।

ऐसा ही एक और  मसला मेरे समक्ष आया। इसी बीच मेरी दीदी, जो IGNOU से M.Com कर रही

है, की परीक्षा चल रही थी।उन्होने मुझे बताया की परीक्षा-कक्ष मे सभी परीक्षार्थी आराम से

पर्चो से चोरी कर इम्तिहान मे उत्तीर्ण होने के अपने अरमानो को पूरा कर रहे थे। और उनके इन

अरमानो के सारथी थे- परीक्षा निरीक्षक। कारण- कुछ बच्चों ने उन्हे पाँच सौ रुपये थमा दिये और

अब पूरे अधिकार के साथ चोरी कर रहे थे।

इन दोनों मसलो से यही प्रतीत होता है की जो भ्रष्टाचार हैं, वो सिर्फ मंत्रियों के हाथों की

पाप नहीं हैं। ये आम जनता के भी रगों-रगों मे हैं। ये मजदूर , शिक्षकगण और वो लोग जो इन्हे

पैसा दे रहे हैं, ये वही लोग हैं जो आपको अन्ना हज़ारे या अरविंद केजरीवाल के भाषणों मे नजर

आएंगे। ये तो सिर्फ दो आम मसले थे, जो मेरी  नज़रो के समक्ष आये.  ऐसे न जाने कितने भ्रष्ट

कामो को हम आम जनता ही अंजाम देते है और ये सपने देखते हैं  कि  हमपर शासन करने वाले लोग

भ्रष्टमुक्त हो। अरे ये लोग भी तो हममे से ही एक हैं।

जरा सोचो, जब इतने छोटे चीजों मे तुम्हारा जमीर तुम्हें इजाजत दे रहा है, तो बड़ी कुर्सी पर बैठने

पर तुम क्यों रुकोगे।

आज अगर हम इस देश को भ्रष्टमुक्त करना चाहते है तो शुरुआत अपने आप से करनी होगी।

माना कई हैं यहाँ...... भ्रष्ट नेता

सिर्फ उनपर ही हैं क्यों ध्यान

लोकतंत्र मे पलने वाली जनता...

तुम्ही हो समस्या, तुम्ही समाधान।
                                                                    ------------- श्याम सुन्दर

क्या आधुनिकता महिलाओं में बढती असुरक्षा का कारण है ?



आधुनिकता क्या है ? सबसे पहला प्रश्न तो यही है .!! खैर वही इस आलेख में बात करते हैं .
कपड़ों से मनुष्य की पहचान होती है का जुमला बहुत पुराना हो गया है अब।पर लोगों के दिमाग तो  उसी में उलझे हुए हैं .अगर कोई लड़की या महिला किसी स्कर्ट या अन्य किसी गैर भारतीय परिधान में दिखती है तो हमारे सामाजिक सदस्य उसके प्रति एक धारणा  ही बना लेते हैं और फिर उसे उसकी   '  आज़ादी ' की  'सज़ा'  देने के लिए उसे परेशान करते हैं -क्यूँ! संविधान के अनुसार महिलाओं को हर प्रकार से पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गये हैं तो मर्ज़ी के कपडे पहनने की आज़ादी भी उसी में शामिल है! हाँ और बात है कि इसके साथ यह नैतिक कर्त्तव्य या कहें कॉमन सेंस भी है-उस ' आधुनिक पहनावे  'से किसी को अजीब न लगे या आप खुद ही के लिए सच में मुसीबत को आमंत्रित न कर रही हों .

         इसीलिये 99 प्रतिशत मामलों में आधुनिकता से असुरक्षा का कोई सम्बन्ध नही है विशेषकर भारत में क्यूंकि विदेशों में तो बिलकुल बिंदास रहन सहन होता है फिर भी  महिला अपराधों की वजह सिर्फ पहनावा नही होता।पुरुष भी जब चाहे जैसे अपनी सुविधा के अनुसार कपडे पहन सकते हैं ,महिलाएं तो नही न सड़क चलते उनपर फिकरे कसती हैं या उनपर कुदृष्टि डालती हैं ! तो फिर महिलाएं ही क्यूँ ?

यही कारण है कि आज एक बेटी घर से बाहर निकलती है तो माता -पिता उसकी चिंता में लगे रहते हैं -तरह तरह की हिदायतों और नसीहतों के साथ उसे जाने देते हैं-और अगर बेटी मेरी तरह घर से मीलों दूर बैठी हो तो माँ हर फ़ोन पर सुरक्षा का ध्यान रखने वाली बात को दोहराना नही भूलतीं ! बात मानसिकता की है -बात पुरुष की है जिसे इस पितृसत्तात्मक समाज में सब कुछ करने की आज़ादी है -वो चाहे तो पीकर अपने खोये हुए होशो-हवास में किसी के साथ कुछ भी अभद्र कर या कह सकता है -हाल  ही में जबकि मुंबई को  बेहद सुरक्षित माना जाता है ,वहीँ हमारे कॉलेज  कैंपस के अन्दर भी रात को 2-3 बजे कई बार कुछ छात्र ऐसी असभ्य हरक़तें करते पाए गये हैं जिसकी प्रत्यक्ष शिकार या गवाह मेरी कई शोध कर रही वरिष्ठ छात्राएं रहीं हैं -शिकायत की गयी -कार्यवाही भी होगी -सकारात्मक रूप से होगी-सब अपनी जगह सही है पर बात एक विश्वास की है -बात अन्दर ज़ज्ब की हुई सुरक्षित होकर निडर होकर घूमने की भावना की है जो संवैधानिक रूप से सभी को मिलनी चाहिए -गुवाहाटी में हुई छात्र के साथ दुर्भाग्यपूर्ण घटना के वक़्त कुछ लोगों का कहना था  -
कि उसे 10 बजे रात  को बाहर  बार नही जाना चाहिए था -मेरा सवाल है क्या उन सरेआम उसे मोलेस्ट करने वाले लोगों से किसीने पुछा इतनी रात को वो क्या कर रहे थे -कपड़ों की बात करें तो चलिए वो भी ले लेते हैं उसने जींस टी-शर्ट पहनी थी  -जो उसके तन को अच्छे से ढंकी हुई थी -और अपने दोस्तों के साथ बाहर आई हुई थी -क्या इतना हक भी नही है उसे! तो कुलमिलाकर अगर आधुनिक जीवनशैली के नाम पर आप किसी और के संवैधानिक अधिकारों  का हनन करते हैं तो यह बेहद गलत है .
                मेरी स्कर्ट से मेरी आवाज़ ऊंची है -एक विरोधाभास् को दर्शाता है -पूर्वकाल में स्कर्ट और आवाज़ दोनों ही ऊंची नही थी तब भी कहाँ महिलाएं महफूज़ रहा करती थीं -आज भी बुर्के और हिजाब में ढँकी मुस्लिम महिलाओं के साथ छेड़खानी और बलात्कार होते हैं तो अब कौन इसके लिए कुसूरवार है?
मेरी इन दलीलों से लग रहा हो अगर हमारे प्रबुद्ध पाठक पाठिकाओं को कि मैं एक पक्की फेमिनिस्ट की तरह बातें कर रही हूँ पर इसका मतलब यह नही कि मैं सिक्के के दूसरे पहलू के बारे में बातें नही करना चाहती ! तो चलिए अब आधुनिक ' सोच ' की चर्चा करते हैं जो आधुनिक पहनावे का स्त्रोत ही है पर इसका दायरा विस्तृत है -आधुनिकता के साथ आज़ाद ख़यालात भी आते हैं -हमेशा यह सही साबित नही हुआ है -कई लोग आधुनिक होने के बाद भी या कहें बाहर से आधुनिकता की तस्वीर पेश करने के बाद भी दिमाग से सत्रहवी सदी में जीते हैं जिनमें पुरुष और महिलाएं दोनों शामिल होती हैं  .कई बार 
 तथाकथित आधुनिकता के कारण पुरुष तो पुरुष महिला से ही असुरक्षा महसूस होने लगती है -एक टीवी शो 'उड़ान' में एक संभ्रांत परिवार की डॉक्टर महिला हैं -महिला मरीजों को आत्मविश्वास देती हैं -उसे यह समझाती हैं कि औलाद पैदा न करना उसे कमतर नही बना देता पर वहीँ अपनी बहू  को कमतर साबित करने पर आमादा  होती हैं -वह अपने ही ससुराल में ही असुरक्षित रहती है -दरअसल ' आधुनिकता ' ही एक गहन चर्चा का मुद्दा है .जब भी किसी विचार ,व्यवहार या शैली में अति होती है तो उस में अवांछितता आना पूरी तरह संभव है -अति सर्वत्र वर्जयेत ! वैसे भी मनुष्य एक विवेकशील प्राणी है -तात्पर्य है कि हम यह क्यूँ भूल जाते हैं कि इसका उद्देश्य सुविधा बढ़ाना था -समाज के एक अहम् वर्ग को असुविधा और असुरक्षा देना नही ! 

                 सामान्यतः महिलाओं ,बच्चों और बूढों को समाज के शारीरिक ,मानसिक रूप से कमज़ोर माना जाता रहा है .इस भ्रांति के अपवाद बेशक सभी वर्गों में सभी समयों पर रहे हैं।उन्हें परिवार के शक्तिशाली या प्रभावशाली पुरुष सदस्य की छत्रछाया में रहना होता है -पर अब ऐसा नही है -ज़माना बदला -महिलाएं और बच्चे भी अपनी सुरक्षा खुद करने में सक्षम महसूस करते हैं पर इसी तेज़ी से होते बदलाव ने उन्हें प्रोत्साहित किया है तो इन दुर्भाग्यशाली घटनाओं ने हिचकिचाने पर भी मजबूर किया है .क्योंकि पुरुष /अन्य शक्तिशाली वर्ग के लोगों को यह मंज़ूर नही हुआ कि उनके प्रभुत्व के बिना ,रौब जमाये बिना वे बेख़ौफ़ होकर ,'आज़ाद 'होकर घूम सकती हैं तो फिर उन्हें फिर से वही याद दिलाने के नापाक मंसूबे और यह दम्भी मानसिकता महिलाओं का कारण है न कि सिर्फ आधुनिकता !! 
                                                            ----------------- स्पर्श चौधरी

शनिवार, 16 मार्च 2013

नारी : मजबूर या दोषी ?



 
 आज जहां समाज में नारी बहुत ही मजबूर प्रतीत होती है और उसकी मजबूरी का सम्पूण दारोमदार पुरुष समाज पे डाल दिया जाता है, मैं भी इस समाज का एक अंग होने के नाते ये लेख लिखने के लिए विवश  हूँ !
कहा जाता है, माता - पिता ही बच्चे के पहले अध्यापक होते हैं , वो जो घर से सीखता है वही व्यवहार वो समाज में रह के अपनाता है, दुसरे शब्दों में कहा जाये तो समाज लोगों के बचपन में सीखे हुए संस्कारों का ही आईना होता है । तो आज समाज से पुरुषत्व क्यूँ गायब होता जा रहा है ? बहनों की इज्ज़तें लुट रही हैं , भाई लड़ना नहीं चाहते ! माताओं को बीच बाज़ार चार बदमाश परेशान करके चले जाते हैं , बेटे विरोध करने की जगह लडकियां बने घूम रहे हैं ! ये समाज की आज़ादी है या कायरता ?? और अगर कायरता है तो किसने बनाया है इस समाज को कायर ? घूम फिर के सारी बातें परिवार की उस प्राथमिक सीख पे ही केन्द्रित हो जाती हैं जिसके जिम्मेदार एक बच्चे के माँ- बाप होते हैं , किन्तु समाज का ये बदलाव नया नहीं है और अगर कुछ समय पहले का विश्लेषण करें तो पाएंगे बच्चे अधिकांश समय अपनी माँ के साथ बिताते थे और आज भी अधिकांश घरों की यही स्तिथि है ।
अगर आपको याद हो तो अपने इस समाज में नारियों की शिक्षा प्रारभ ही इसलिए हुई थी कि, वो पढ़- लिख कर एक नए समाज को सही दिशा दें ! उनके बच्चे जो कल का भविष्य हैं, उन्हें उचित संस्कार और ज्ञान दें , उनकी जरूरतों को समझें , उनके लिए एक प्रेरणा स्त्रोत्र बनें । किन्तु, आज जो सक्षम हैं वो स्त्रियाँ समाज कि इस महत्वपूण जिम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार नहीं हैं । शिक्षा ग्रहण करते करते उनके खुद के सपने समाज के विकास के उस आवश्यक कार्य पर हावी हो जाते हैं और समाज को शिक्षा देने के लिए ज्यादर बस दो तरह के ही माहौल मिलते हैं ।
एक! जहां माँ को कभी अपनी बात कहने का मौका नहीं मिला , वो अशिक्षित रही , घरेलु हिंसा का शिकार बनी, और अपना सारा लाड़- प्यार अपने बच्चे पे उड़ेल दिया । पर बच्चे को सीखने को क्या मिला - जो दब जाये उसे दबाने का हुनर? बेशक इस सीख में उसका पिता भी बराबर का जिम्मेदार है और दोषी भी किन्तु, माँ शायद उसे अन्याय के खिलाफ खड़ा होना सिखा सकती थी पर उसने उसे जो दिया वो है - "डर", " समझौता " । साफ़- साफ़ कहा जाये तो ये वो बच्चे हैं जो बड़े हो कर अपने से कमजोर को डरायेंगे और जब कोई इनपे हावी हो जायेगा तो ये डर के उससे समझौता कर लेंगे । यानी इनकी सारी  बहादुरी कमजोरों के लिए है , अपनी माँ जैसी नारियों के लिए भी शायद किन्तु, रास्ते पे चलती लड़की को छेड़ने वालों को रोकने की हिम्मत इनमें नहीं है । ये अपने क्रोध से समझौता कर के आगे बढ़ जाते हैं क्यूंकि बचपन में माँ ने अपने लाड़ प्यार की वजह से इन्हें कभी लड़ने झगड़ने न दे कर नपुंसक बना दिया , उसके लिए वो प्यार था उसके एक मात्र सहारे के लिए ! "मेरे बच्चे! मेरे लाल ! स्कूल में नहीं झगड़ते । तुझे भी क्या अपने पापा की तरह बनना है ।" " पर माँ उसने मेरी पेंसिल तोड़ दी ! " " कोई बात नहीं ! माँ तुम्हारे लिए नयी पेंसिल ला देगी " ये एक मामूली सी बातचीत भी समाज को किस तरह पतन की तरफ ले जा सकती है शायद उसको अंदाज़ा ही नहीं होगा ! पिता का ध्यान न देना स्कूल में बच्चों की हरकतों पे गौर न करना भी इतना ही महत्वपूण है पर अगर समाज में समस्या नारियों को ज्यादा है तो सुधरने की जिम्मेदारी भी उनकी होनी चाहिए !
दूसरी तरफ हमे मिलती हैं ऐसी माँ जिन्हें शिक्षा भी मिली , आज़ादी का माहौल भी ! उनके लिए तो बातें और भी सीधी थीं दूसरों को मत देखो, तुम्हे जो करना है वो करो पर इसकी अति भी समाज को ले डूबी । उन्होंने बच्चो की जिम्मेदारी (समाज के भविष्य की जिम्मेदारी ) से ज्यादा महत्वपूण खुद के भविष्य को समझा और उनसे उनके बच्चों ने भी । दूसरों की फिकर मत करो और अपना भविष्य बनाओ, समाज की चिंता तो वो पहले ही छोड़ चुके थे तो किसी राह चलती युवती के लिये किसी से लड़ के अपने भविष्य को खतरे में डालना तो उनके लिये असंभव ही था , उनकी माँ ने उन्हें बचपन में ही सिखा दिया था " तुम्हारी फ़िज़ूल की बातों के लिये मेरे पास वक्त नहीं है, मुझे ऑफिस जाना होता है और भी बहुत से काम हैं ! आगे से कोई लड़ाई - झगड़े की खबर मिली तो बोर्डिंग में भेज देंगे " "पर मेरी बात तो सुनो... " वक्त के ये कमी समाज को इस मुकाम पे ले आएगी शायद उनकी शिक्षा उन्हें ये समझाने में असफल रह गयी ।
समस्या तो अब और भी बढ़ गयी है क्यूंकि ये कहानी एक पीढ़ी पहले की है , अब वो बच्चे बड़े हो गये हैं और अपने बच्चों को वही शिक्षा देने लगे हैं- " तुम्हे वहां पढने भेजा है लड़ने नहीं , जिसकी समस्या है वो खुद देख लेगा। तुम्हे नवाब बनने की जरूरत नहीं है !" और इसी समाज की नारी जब बीच बाजार अपराधियों के सामने हिजड़ों की फौज देखती है तो गुहार लगती है कि, क्या इस समाज में कोई मर्द नहीं है ?
मर्द !! मर्द को मर्द रहने ही कहाँ दिया आपने ! और अब उसके पुरषार्थ को ललकारती हो । अपने भाई , बेटे को कब आपने जगाया , डांटा, मारा, समझाया जब वो बीच सड़क एक औरत को असहाय देख कर खामोश  लौट आया था खुद को बेबस समझ कर ! आप पढ़ी-लिखी औरतों ने कब अपने बेटे को ज्ञान दिया की खुद से ज्यादा महत्वपूण भी कुछ है इस समाज में, आप तो बता सकतीं थीं उसे कि, तेरी माँ पढ़ी लिखी है कोई समस्या आएगी तो मैं देख लूँगी पर, तू कोई अपराध अपनी आँखों के सामने मत होने देना !
एक समय था जब अशिक्षित माँ भी अपने देश के लिये अपने बेटों को कुर्बान कर देती थी , इतना ज्ञान तो उन्हें भी था । हमने शिक्षा भले ही पा ली हो लेकिन उसकी मूलभूत आवश्यकता से हम बहुत दूर हो गए हैं, शायद ! पुरुष और स्त्री की इस आपसी प्रतिस्पर्धा में हमने समाज को खो दिया है ! 
                                                                    ............... शक्ति शर्मा