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सोमवार, 3 जून 2013

आपकी कलम से #2 कौन क्या-क्या खाता है ?


खान-पान की कृपा से, तोंद हो गई गोल,
रोगी खाते औषधी, लड्डू खाएँ किलोल।
लड्डू खाएँ किलोल, जपें खाने की माला,
ऊँची रिश्वत खाते, ऊँचे अफसर आला।
दादा टाइप छात्र, मास्टरों का सर खाते,
लेखक की रायल्टी, चतुर पब्लिशर खाते।

दर्प खाय इंसान को, खाय सर्प को मोर,
हवा जेल की खा रहे, कातिल-डाकू-चोर।
कातिल-डाकू-चोर, ब्लैक खाएँ भ्रष्टाजी,
बैंक-बौहरे-वणिक, ब्याज खाने में राजी।
दीन-दुखी-दुर्बल, बेचारे गम खाते हैं,
न्यायालय में बेईमान कसम खाते हैं।

सास खा रही बहू को, घास खा रही गाय,
चली बिलाई हज्ज को, नौ सौ चूहे खाय।
नौ सौ चूहे खाय, मार अपराधी खाएँ,
पिटते-पिटते कोतवाल की हा-हा खाएँ।
उत्पाती बच्चे, चच्चे के थप्पड़ खाते,
छेड़छाड़ में नकली मजनूँ, चप्पल खाते।

सूरदास जी मार्ग में, ठोकर-टक्कर खायं,
राजीव जी के सामने मंत्री चक्कर खायं।
मंत्री चक्कर खायं, टिकिट तिकड़म से लाएँ,
एलेक्शन में हार जायं तो मुँह की खाएँ।
जीजाजी खाते देखे साली की गाली,
पति के कान खा रही झगड़ालू घरवाली।

मंदिर जाकर भक्तगण खाते प्रभू प्रसाद,
चुगली खाकर आ रहा चुगलखोर को स्वाद।
चुगलखोर को स्वाद, देंय साहब परमीशन,
कंट्रैक्टर से इंजीनियर जी खायं कमीशन।
अनुभवहीन व्यक्ति दर-दर की ठोकर खाते,
बच्चों की फटकारें, बूढ़े होकर खाते।

दद्दा खाएँ दहेज में, दो नंबर के नोट,
पाखंडी मेवा चरें, पंडित चाटें होट।
पंडित चाटें होट, वोट खाते हैं नेता,
खायं मुनाफा उच्च, निच्च राशन विक्रेता।
काकी मैके गई, रेल में खाकर धक्का,
कक्का स्वयं बनाकर खाते कच्चा-पक्का।

                                                                    ----------- काका हाथरसी

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

क्या अपराधों की जन्मभूमि बन रही है राजनीति !




राजनीति के  एकदम सफेद चक गलियारों में आज ताज़े खून के धब्बों  का होना कोई नई या ख़ास खबर नही है ! राजनीति के मायने अब बदल गये हैं .वैसे राजनीति के खेल तो ऐसे ही चलते आये हैं बरसों से पर अब राजनीति की आड़ में अपराधियों को खासी पनाह मिल रही है या यह कहिये कि उन्हें इस सफ़ेद पोशाक का जो नाजायज़ फायदा मिल रहा है वो अब अपराध की श्रेणी में आ चुका है .इसमें कोई दो राय नही कि वोट बैंक की खातिर  नेतागण कुछ भी कर सकते हैं .1992 के बाबरी विध्वंस को क्यूँ नही रोका गया ....सामने खड़े होकर सत्तादल के कार्यकर्ता तमाशा देखते रहे क्यूँ ..कहीं बहुसंख्यक हिन्दु भड़क गये तो .....! 
     अब राजनीति में प्रवेश करने की वजह जनता की सेवा नही रह गयी है . अब नेतागिरी का मतलब अधिकांशतः सिर्फ सत्ता में आना और सत्ता के नाम पर गुंडागर्दी को शह देना  रह गया है ताकि आम लोगों पर उनका रौब बना रहे .इसी खौफ के चलते लोग इनकी हरक़तों का विरोध करने से भी खार खाते हैं ,क्यूंकि अगर इनमें से कोई भी सच्चाई का साथ देने के लिए आगे बढ़ता है तो उसे रोकने के लिए ये गुंडे-नेता अपने छुटभैय्ये आदमियों से उनके इन बढ़ते कदमों को रुकवा देते हैं ;उन्हें और उनके करीबियों को जान  से ही मरवा देते हैं ! ' हमसे जो टकराएगा वो चूर चूर हो जाएगा ' की धमकियों के ज़रिये लोगों में दहशत फैला देने से  उनके राजनीतिक मंसूबे पूरे होने में कोई खलल भी नही होता  !! उत्तरप्रदेश ,बिहार ,राजस्थान और मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में तो खुल्लमखुल्ला धड़ल्ले से क़ानून और खाकी वर्दी को ठेंगा दिखाकर या फिर उसकी कुछ कमज़ोर कड़ियों को अपने साथ मिलाकर संविधान और जिन मतदाताओं के कारण वे कुर्सी पर काबिज़ हुए हैं उन्ही का बड़ी बेशर्मी से मखौल उड़ा रहे हैं ! और इन्ही हिस्सों में ही क्यूँ अब तो सभी जगह खासकर भारत में तो राजनीति आपको सारे अधिकार दे देती है -सारे -किसी की इज्ज़त लूटने का,किसी को अगवा करवाने का ,किसी की हत्या करवाने का ,और हर किस्म का कोई भी अत्याचार करने का ! क्यूँ ...अरे भाई हम तो नेता हैं ..नेता ! हमें कौन पकड़ेगा और अगर जाँच के घेरे में आ भी गये तो हम  हाथ पर हाथ धरे यूँ अपनी कुर्सी और इज्ज़त को जाते हुए देखते रहेंगे क्या भैय्या ?  ... तभी तो 'हम ' अभी तक उस मुस्लिम पुलिस अधिकारी के केस में गिरफ्तार नही हुए ....अरे ऐसे ही थोड़ी न 'राजा भैय्या 'कहलाते हैं हम ;हमारी लोगों तक पहुँच,रुतबा ,हमारे कार्यकर्ताओं की पकड़ के कारण तो मुख्यमंत्री साहब ने भी;  हमारे नाम पर इतने अपराध दर्ज होने के बाद भी हमें अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया ;सी.बी. आई .तक को चकमा दे दिए हम ! हाँ अब ये इस्तीफ़ा देना तो लोगों का मुँह बंद कराने का एक तरीका है ...वो क्या है न अभी चुनावों में तो जनता ही हमारी इष्ट है !! तो उनके क्रोध को तो शांत करना होगा न !! 
         अब इन्ही महाशय सचिन सूर्यवंशी को देख लीजिये ,ये ठहरे वर्ली चौकी के एक अदने से नए नवेले सब-इंस्पेक्टर और हमें ही ट्रैफिक के कायदे कानून सिखाने चले थे .....अब खुद ही अपनी नौकरी से हाथ धो लिए न !! अब थोड़ी न हमारे साथी ऍम .एल. ए .चुप बैठेंगे .....!!!!   इतना ही नही हम चाहे किसी सामूहिक बलात्कार केस के आरोपों को भी नकार सकते हैं ....थोड़ी न मनाही है कि कोई तथाकथित 'बलात्कारी  ' संसद जैसी गरिमा वाले स्थल में नही प्रवेश कर सकते .!! 

प्रिय पाठक-पाठिकाओं  ,दरअसल अपराध आज राजनीति के अन्दर इस हद तक  समाविष्ट हो चुका है कि ज़ेहन में इस विषय में बेहद क्षोभ भरा हुआ है जो उपर्युक्त  शब्दों में इस  त्रासदी  के उदाहरण के व्यंग्यात्मक  रूप में बाहर निकला है !! आंकड़ों पर जाए बिना ही हम सभी जानते हैं कि राजनीति की गोटियाँ खेलने वाले हर शख्स को किन नज़रों से देखा जाता है और हो भी क्यूँ न !
           बहरहाल  आज कितने युवा हैं जो राजनीति में जाना चाहते हैं?-खुद मुझे भी जनता की सेवा करने के लिए राजनीति बेहद कठिन परन्तु सटीक उपाय सूझ पड़ता है पर परिवार इस बात से असहमत है क्यूंकि अब तो 'डर्टी पॉलिटिक्स ' ही शेष रह गयी है- एक आम युवा जो संवैधानिक अधिकारों और शक्ति के बल पर जनता की समस्याओं को हल करना चाहता है वो भी ऐसा सोचने से डरता है क्यूंकि जो हैं वो उन्हें सीधे साधे थोड़ी न टिकने देंगे और वैसे भी एक सड़ी हुई मछली सारे तालाब को ख़त्म कर देती है फिर यहाँ तो सारा तालाब ही दुर्गन्ध से सराबोर है -अब कोई दूसरी स्वस्थ  मछली वहाँ  कितने दिन टिक पायेगी !! राजनीति और जनता के मतों के दम पर चुन कर आये हुए उनके प्रतिनिधि होने का अब सिर्फ मिथक रह गया है ...सब अपने स्वार्थ तो पूरे कर ही रहे हैं पर उन स्वार्थों को पूरा करने के लिए लोगों की जान,इज्ज़त, और भी सब कुछ छीन लेने में कोई हिचकिचाहट नही होती इन्हें !
             संसद में बैठकर एंटी-रेप बिल के बारे में चर्चा में वे सांसद भी शामिल थे जिनके खिलाफ खुद मोलेस्टेशन और बलात्कार के संगीन जुर्म दर्ज थे ! कितनी बेशर्मी की  बात है यह -क़ानून को अपने हाथों का खिलौना समझने वाले क़ानून बनाते हैं इस देश में ! चुनाव आयोग जो एक स्वतंत्र इकाई है विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के कार्यकारी विभाग की  -वह कैसे ऐसे हत्यारों,दुष्कर्मियों को चुनाव लड़ने की अनुमति दे सकता है ! तो राजनीति से अपराध की गंदगी दूर करना भले ही कितना मुश्किल हो पर नामुमकिन नही है -अगर अच्छे मूल्यों वाले  युवा राजनीति में आयें और देश की संवैधानिक ईकाईयाँ बेख़ौफ़ होकर अपने अधिकारों का बखूबी प्रयोग करके अपना फ़र्ज़ निभाएं !!  

बुधवार, 20 मार्च 2013

इस्लाम से पुरानी है पाकिस्तान की तारीख

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इस्लामी जम्हूरिया पाकिस्तान की तारीख़ हिन्दुस्तान से बहुत पुरानी है, बल्कि इस्लाम से भी पुरानी है। जब आठवीं सदी में मुहम्मद बिन क़ासिम इस्लाम फैलाने बार-ए-सगीर तशरीफ लाए तो ये जान कर शर्मिंदा हुए कि यहां तो पहले ही इस्लामी रियासत मौजूद है।
यहां कुफ्र का जनम तो हुआ जलालुद्दीन अकबर के दौर में, जो इस्लाम को झुठलाकर अपना मज़हब बनाने को चल दिया, शायद अल्लाह-हो-अकबर के लुगवी मानी ले गया था।
बहरहाल, इन काफिरों ने बुतपरस्ती और मेहकशी जैसे गैरमुनासिब काम शुरू कर दिए और अपने आप को हिंदू बुलाने लगे। शराब की आमद से पाकिस्तान की वो ताक़त ना रही जो तारीख़ के तसल्सुल से होनी चाहिए थी। इसकी वजह ये नहीं थी कि मुसलमान शराब पीने लग पड़े थे, बल्कि ये कि उनकी सारी कुव्वत-ए-नफ्स शराब को ना पीने में वक्फ हो जाती थी, हुक्मरानी के लिए बचता ही क्या था। इसके बावजूद मुसलमानों ने मज़ीद दो सौ साल पाकिस्तान पर राज किया, फिर कुछ दिनों के लिए अंग्रेजों हुकूमत आ गई। (हमारी तफ्तीश के मुताबिक यही कोई चालिस हज़ार दिन होंगे)
सन् 1900 तक पाकिस्तान के मुसलमानों की हालत नासाज़ हो चुकी थी। इस दौरान एक अहम शख्सियत हमारी ख़िदमत में हाज़िर हुई, जिसका नाम अल्लामा इक़बाल था। इक़बाल ने हमें दो क़ौमी नज़रिया दिया। यही इनसे पहले सईद अहमद ख़ान ने भी दिया था, मगर इन्होंने ज़्यादा दिया। इस नज़रिये के मुताबिक पाकिस्तान में दो फर्क कौमें मौजूद थीं, एक हुक्मरानी के लायक मुसलमान कौम और एक गुलामी के लायक हिंदू कौम। इन दोनों का आपस में समझौता मुमकिन नहीं था।
सैयद अहमद खान ने भी मुसलमानों के लिए अंथक मेहनत की, मगर बीच में अंग्रेज़ के सामने सिर झुका कर सर का ख़िताब ले लिया। अंग्रेज़ी तालीम की वाह-वाह करने लगे। भला अंग्रेज़ी सीखने से किसी को क्या फ़ायदा। हर ज़रूरी चीज़ तो उर्दू में थी, पुरानी भी। सहाब-ए-कराम उर्दू बोलते थे। नबी-ए-करीम खुद भी। आपने अक्सर हदीस सुनी होगी, दीन में कोई जब्बार नहीं, ये उर्दू नहीं तो क्या है? अंग्रेज़ी में क्या था? बहरहाल इक़बाल से मुतास्सिर होकर एक गुजराती बैरिस्टर ने अंग्रेजों से छुटकारा हासिल करने की तहरीक शुरू कर दी। इस तहरीक का जोश और वलवले के साथ इस्तक़बाल किया।
इस बैरिस्टर का नाम मोहम्मद अली जिन्ना उर्फ क़ायद-ए-आज़म था। इन्होंने पाकिस्तान से आम तालीम हासिल करने के बाद ब्रिटेन से आला तालीम हासिल की और बैरिस्टर हो गए। क़ायद-ए-आज़म को भी सर का ख़िताब पेश किया गया था, बल्कि मलिका ब्रतानिया तो कहने लगीं कि अब से आप हमारे मुल्क में रहेंगे, बल्कि हमारे महल में रहेंगे और हम कहीं किराये पर घर ले लेंगे। मगर क़ायद की सांसें तो पाकिस्तान से वाबस्ता थीं, वो अपने मुल्क को कैसे नज़रअंदाज कर सकते थे।
1934 में क़ायद वापस आए तो पाकिस्तान का सियासी माहौल बदल चुका था। लोग मायूसी में मुब्तला थे। उधर दूसरी जंग-ए-अज़ीम शुरू होने वाली थी और गांधीजी ने अपनी फूहश नंग-धड़ंग मुहिम चला रखी थी। कभी इधर कपड़े उतारे बैठ जाते थे, कभी उधर। साथ एक नेहरू नामी हिंदू इक़बाल के दो क़ौमी नज़रिये का ग़लत मतलब निकाल बैठा था, लोग कहते हैं कि नेहरू बचपन से ही अलहदगी पसंद था। घर में अलहदा रहता था, खाना अलहदा बर्तन में खाता था और अपने खिलौने भी बाकी बच्चों से अलहदा रखता था। नेहरू का क़ायद-ए-आज़म के साथ वैसे भी मुक़ाबला था, पढ़ाई लिखाई में, सियासत में, मोहल्ले की लड़कियां ताड़ने में। ज़ाहिर है जीत हमेशा क़ायद की होती थी। लॉ के पर्चों में भी उनके नेहरू से ज़्यादा नंबर थे।
आज़ादी क़रीब थी। मुसलमानों का ख्वाब सच्चा होने वाला था, फिर नेहरू ने अपना पत्ता खेला। कहने लगा कि हिंदुओं को अलग मुल्क चाहिए। ये सिला दिया उन्होंने उस क़ौम का, जिसने उन्हें जनम दिया, पाल-पोस कर बड़ा किया। हमारी बिल्ली हमे ही भाव? नेहरू की साज़िश के बाइस जब 14 अगस्त 1947 को अंग्रेज़ यहां से लौट कर गए तो पाकिस्तानव के दो हिस्से कर गए।
अलहेदगी के फौरन बाद हिन्दुस्तान ने कश्मीर पर कब्ज़े का एलान कर दिया। दोनों मुल्कों के पटवारी फीते लेकर पहुंच गए। हमसाए मुमालिक फितरत से मजबूर तमाशा देखने पहुंच गए। खूब तू-तू, मैं-मैं हुई, गोलियां चलीं, बहुत सारे इंसान ज़ख्मी हुए, कुछ फौजी भी। फिर हिंदुओं ने एक और बड़ी साज़िश ये की कि पाकिस्तान से जाते हुए हमारे दो-तीन दरिया भी साथ ले गए। ये पूछना भी गवारा नहीं किया कि भाई, चाहिए तो नहीं? कपड़े वगैरह धो लिए? भैंसों ने नहा लिया?
ये मुआमलात अभी तक नहीं सुलझे, इसलिए इन पर मज़ीद बात करना बेकार है। तारीख़ सिर्फ वो होती है जो सुलझ चुकी हो या कम से कम दफ़न हो चुकी हो, जिस तरह क़ायद-ए-आज़म आज़ादी के दूसरे साल में हो गए। वो उस साल वैसे भी कुछ अलील थे और क्योंकि क़ौम की भरपूर दुआएं उनके साथ थीं, इसलिए जल्द ही वफात पा गए।
जिन्ना की वफात के बाद बहुत सारे लोगों ने क़ायद बनने की कोशिश की। इनमें पहले लियाक़त अली ख़ान थे, क्योंकि ख़ान साहेब अलील नहीं हो रहे थे (और उनको तीन साल का मौका दिया गया था इस आसान मश्क़ के लिए) लिहाज़ा उनको 1951 में खुद ही मामा पड़ा। फिर आए ख्वाज़ा निज़ामुद्दीन। अब नाम का नाज़िम हो और ओहदे का वज़ीर, ये बात किसको लुभाती है। इसलिए चंद ही अरसे में गवर्नर जनरल गुलाम मोहम्मद ने इनकी छुट्टी कर दी। जी हां, पाकिस्तान में उस वक्त सदर की बजाय गवर्नर जनरल होता था। आने वाले सालों में इख्तिसार की मुनासिबत से ये सिर्फ जनरल रह गए, गवर्नर गायब हो गया।
जनरल का ओहदा पाकिस्तान का सबसे बड़ा सियासी ओहदा है। उसके बाद कर्नल, मेजर वगैरह आते हैं। आखिर में वज़ीर मुशीर आती हैं। पाकिस्तान की आज़ादी के कई सालों तक कोई हमे आईन ना दे पाया। फिर जब इस्कंदर मिर्ज़ा ने आईन नाफिज़ किया तो उसमें जरनैलों को अपना मुक़ाम पसंद नहीं आया। आईन और इस्कंदर मिर्ज़ा को एक साथ उठाकर फेंक दिया गया। फील्ड मार्शल अयूब ख़ान ने हुकूमत संभाल ली। लड़खड़ा रही थी, किसी ने तो संभालनी थी। इस फैसले का क़ौम ने जोश और वलवले के साथ इस्तक़बाल किया।
अयूब ख़ान जमहूरियत को बेहाल करने, हमारा मतलब है, बहाल करने आया था। असल में जम्हूरियत क़ौम की शिरकत से नहीं मज़बूत होती, इमारतों और दीवारों की तरह सीमेंट से मज़बूत होती है, फौजी सीमेंट से। जी हां, आप भी अपनी जम्हूरियत के लिए फौजी सीमेंट का आज ही इंतिख़ाब करें। इस मौक़े पर शायर ने क्या ख़ूब कहा है- फौज़ी सीमेंटः पायेदार, लज़्ज़तदार, आलमदार।
अयूब ख़ान ने अपने दौर में कुछ मखोलिया इलेक्शन करवाए ताकि लोग अच्छी तरह वोट डालना सीख लें और जब असल इलेक्शन की बारी आए तो कोई गलती ना हो। मगर जब 1970 के इलेक्शन हुए तो लोगों ने फिर गलती कर दी, एक फितने को वोट डाल दिए। इस पर आगे तफ्सील में बात होगी। वैसे अयूब ख़ान का दौर तरक्की का दौर भी था। उन्होंने दावा किया था कि वो पाकिस्तान को मंजिल-ए-मक्सूद तक पहुंचाएंगे। मक्सूद कौन था और किस मंजिल में रहता था, ये हम नहीं जानते, मगर इस ऐलान का कौम ने जोश और वलवले के साथ इस्तक़बाल किया।
1965 में हिन्दुस्तान ने हमारी मिल्कियत में दोबारा टांग अड़ाई, जंग का भी ऐलान कर दिया, लेकिन बेइमान होने का पूरा सबूत दिया। हमे कश्मीर का कहकर खुद लाहौर पहुंच गए। हमारी फौज वादियों में ठंड से बेहाल हो गई और ये इधर शालीमार बाग़ की सैरें करते रहे। इस दग़ाबाज़ी के खिलाफ अयूब खान ने अक्वाम-ए-मुत्ताहेदा को शिकायत लगाई। वो ख़फा हुए और हिन्दुस्तान को एक कोने में हाथ ऊपर करके खड़े होने की सज़ा मिली, जैसे कि मिलनी चाहिए थी। इस फैसले का भी क़ौम ने जोश और वलवले के साथ स्वागत किया।
मगर हिंदू वो, जो बाज़ ना आए। 1971 में जब हम सबको इल्म हुआ कि बंगाली भी दरअसल पाकिस्तान का हिस्सा हैं, तो हिंदू उधर भी हमलावर हो गए। अब आप खुद बताएं, इतनी दूर जाकर जंग लड़ना किसको भाता है? हमने चंद हज़ार फौजी भेज दिए, इतना कहकर कि अगर दिल करे तो लड़ लेना। वैसे मजबूरी कोई नहीं है। मगर हिंदुओं को खुलूस कौन सिखाए, उन्होंने ना सिर्फ हमारे फौजियों के साथ बदतमीज़ी की बल्कि उन्हें कई साल तक वापस भी नहीं आने दिया। बंगाल भी हमारे से जुदा कर दिया और तशद्दुद के सच्चे इल्ज़ामात भी लगाए। आख़िर सच्चा इल्ज़मा झूठे इल्ज़ाम से ज़्यादा ख़तरनाक होता है क्योंकि वो साबित भी हो सकता है।
इसके बाद दुनिया में हमारी काफी बदनामी हुई। लोग यहां आना पसंद नहीं करते थे बल्कि हमारे हमसाए मुमालिक भी किसी दूसरे बार-ए-आज़म में जगह तलाश करने लगे कि इनके पास तो रहना ही फिज़ूल है। ऐसे मौके पर हमें एक मुस्तक़िल मिजाज़ और दानिशवर लीडर की ज़रूरत थी, मगर हमारे नसीब में ज़ुल्फिक़ार अली भुट्टो था। जी हां, वही फितना जिसका कुछ देर पहले ज़िक्र हुआ था।
भुट्टो एक छोटी सोच का छोटा आदमी था, उसके ख्याल में मुसलमानों की तक़दीर रोटी, कपड़े और मकान तक महदूद थी। उसके पाकिस्तान में महलों और तख़्तों और शहंशाही की जगह नहीं थी, हमारी अपनी तारीख़ से महरूम कर देना चाहता था हमें। भुट्टो से पहले हम रूस से इस्तेमाल शुदा हथियार मंगाते होते थे। भुट्टो ने रूस से इस्तेमाल शुदा नज़रिया भी मांग लिया, लेकिन इस्तेमाल शुदा चीज़ें कम ही चलती हैं। ना कभी वो हथियार चले, ना नज़रिया।
तमाम सनत ज़ब्त करके सरकारी खाते में डाल दी गई। साम्यकारी की खूब आत्मा रोली गई, उसको मजाज़ी तौर पर दफना कर उसकी मजाज़ी कब्र पर मुजरे किए गए। लोगों से उनकी ज़मीनें छीन ली गईं। वो ज़मीनें भी जो उन्होंने किसी और के नाम पर लिखवाई हुई थीं। ये ज़ुल्मत नहीं तो क्या है? ये पाकिस्तान का सबसे तश्विशनाक मरहला था, ऐसे में क़ौमी सलामती के लिए आगे बढ़े हज़रत जनरल ज़िया-उल-हक़, (रहमतुल्लाह अलह)।
उन्होंने भुट्टो से हुकूमत छीन ली और उनर क़ातिल और मुल्क दुश्मन होने के इल्ज़ामात लगा दिए। ज़िया-उल-हक़ ने कानून का एहतराम करते हुए भुट्टो को अदालत का वक्त ज़ाया नहीं करने दिया। बस इल्ज़ाम की बिना पर ही फैसला ले लिया और भुट्टो को फांसी दिलवा दी। इस हरकत का कौम ने जोश और वलवले के साथ इस्तक़बाल किया।
हज़रत ज़िया-उल-हक़ पाकिस्तानियों के लिए एक नमूना थे, हमारा मतलब है, मिसाली नमूना। उन्होंने यहां शरियत का तार्रुफ करवाया, हद के क़वानीन लगाए, नशाबंदी कराई। इस इक़दाम का क़ौम ने होश और वलवले के साथ इस्तक़बाल किया।
उनके दौर में हमारी फौज-अल-अज़ीम ने रूस पर जंगी फतह हासिल की। रूस अफगानिस्तान में जंग लामय आया था। उसने सोचा होगा कि यहां अफगानियों से लड़ाई होगी, ये उसकी खेमख्याली थी। इस मौक़े पर शायर ने खूब कहा है- तेरा जूता है जापानी, ये बंदूक इंग्लिस्तानी, सिर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी जीत गए पाकिस्तानी।
आखिर अफसोस कि इस्लाम के इस मुजाहिद के खिलाफ बाहरी ताक़तें साज़िश कर रही थीं। 1987 में यहूद-ए-नसारा ने इनके जहाज़ में से इंजन निकालकर पानी का नल्का लगा दिया, इसलिए परवाज़ के दौरान आसमान से गिर पड़ा और टूट के चूर हो गया। ज़िया-उल-हक़ भी टूट कर चूर हो गए और पाकिस्तान टूटे बग़ैर चूर हो गया क्योंकि हुकूमत में वापस आ गया भुट्टो ख़ानदान।
जैसा बाप, वैसी बेटी। इख्तियार में आते ही बेनज़ीर ने इस मुल्क को वो लूटा, वो खाया कि जो लोग ज़िया-उल-हक़ के दौर में बंगलों में रिहाइश पज़ीर थे, अब सड़कों पर रुलने लगे। जल्द ही बेनज़ीर को हुकूमत से ढकेल दिया गया और उसकी जगह बैठा दिया मियां मोहम्मद नवाज़ शरीफ को। लेकिन मियां साहेब ज़्यादा देर नहीं बैठ सके, उन्होंने आगे कहीं जाना था शायद और कुछ अरसे बाद बेनज़ीर वापस आ गईं। बेनज़ीर का दूसरा दौर-ए-हुकूमत मुल्क के लिए और बुरा साबित हुआ, पर ये अभी साबित हो ही रहा था कि उनकी हुकूमत को फिर से खत्म कर दिया गया। एक मर्तबा दोबारा नवाज़ शरीफ को ले आया गया। इस कारनामे का क़ौम ने जोश और वलवले के साथ इस्तक़बाल किया।
हां, नवाज़ शरीफ ने इस दौरान एक अच्छा काम ज़रूर किया। वो हमें एटमी हथियार दे गया, इसके होते हुए हमें कोई कुछ नहीं कह सकता था, इसके बलबूते पर हम दिल्ली से लेकर दिल्ली के इर्द-गिर्द कुछ बस्तियों तक, कहीं भी हमला कर सकते थे। अगर आपको भी लोग बातें बनाते हैं, तंग करते हैं, घर पर, काम पर तो एटमी हथियार बना लीजिए। ख़ुद ही बाज़ आ जाएंगे।
मगर ये बात अमरीका को पसंद नहीं आई और नवाज़ शरीफ उनके साथ वो ताल्लुक ना रख पाए जोकि एक इस्लामी रियासत के होने चाहिएं (मसलन सउदी वगैरह)। ऊपर से मियां साहेब ने कारगिल ऑपरेशन की भी मुखालिफत की, हालांकि हमारे से कसम उठवा लें जो मियां साहेब को पता हो कि कारगिल है कहां। इस बुज़दिली का सामना करने और पाकिस्तान को राह-ए-रास्त पर लाने का बोझ अब एक और जनरल परवेज़ मुशर्रफ के गले पड़ा और वो इस आज़माइश पर पूरा उतरे। उन्होंने आते के साथ क़ौम का दिल और खज़ाना लूट लिया।
परवेज़ मुशर्रफ का दौर भी तरक्की का दौर था, मुल्क में बाहर से बहुत सारा पैसा आया, खासकर अमरीका से। अमरीका को किसी ओसामा नामी आदमी की तलाश थी। हमने फौरन उन्हें दावत दी कि पाकिस्तान आकर ढूंढ लें, यहां पर हर दूसरे आदमी का नाम ओसामा है। मुशर्रफ साहेब का अपना नाम ओसामा पड़ते-पड़ते रह गया था। मुशर्रफ साहेब का दौर इंसाफ का दौर था, कोई नहीं कहता था कि इंसाफ नहीं मिल रहा बल्कि कहते थे कि इतना इंसाफ मिल रहा है कि समझ नहीं आती इसके साथ क्या करें? मगर उनके खिलाफ भी साज़िशी कार्रवाई शुरू थी। एक भेंगे जज ने शोर डाल दिया कि उन्होंने क़ौम के साथ ज़्यादती की है। क़ौम भी इनकी बातों में आकर समझने लगी कि उसके साथ ज़्यादती हुई है। लोग मुशर्रफ को कहने लगे कि वर्दी उतार दो। अब भला ये कैसी नाज़ेबा दरख्वास्त है। वैसे भी वर्दी तो वो रोज़ उतारते थे, आखिर वर्दी में सोते तो नहीं थे। मगर लोग मुतमईन नहीं हुए, वर्दी उतारनी पड़ी। ताक़त छोड़नी पड़ी। आम इंतिखाबात का ऐलान करना पड़ा।
बेनज़ीर भुट्टो साहिबा मुल्क वापस आईं, लेकिन सेहत ठीक ना होने की बाइस वो अपने ऊपर जानलेवा हमला नहीं बर्दाश्त कर पाईं। सियासत में जानलेवा हमले तो होते रहते हैं। मुशर्रफ साहेब ने खुद झेले, अभी तक जिंदा हैं, यही उनकी लीडरी का सबूत है। फिर भी इन इंतिखाबात में जीत पीपुल्स पार्टी की ही हुई। बेनज़ीर की बेवा, आसिफ अली ज़रदारी को सरदार मुंतखिब कर दिया गया। इससे पार्टी में बदला कुछ नहीं, फरक इतना पड़ा कि बेनज़ीर सिर्फ बाप की तस्वीर लगाकर तकरीब करती थी, ज़रदारी को दौ तस्वीरें लगानी पड़ती थीं।
अब पाकिस्तान के हालात फिर बिगड़ते जा रहे हैं। बिजली नहीं है, गैस नहीं है, अमन-ओ-इमान नहीं है, इक्तिदार में लुटेरे बैठे हुए हैं। फौज फिर से मुंतज़िर है कि कब आवाम पुकारे और कब वो आकर मुआशरे की इस्लाह करें। अच्छे-खासे लगे हुए मार्शल ला के दरमियान जब जम्हूरियत नाफिज़ हो जाती है तो तमाम निज़ाम उल्टा-सीधा हो जाता है। पिछली इस्लाह का कोई फायदा नहीं रहता, नए सिरे से इस्लाह करनी पड़ती है।
अभी कुछ ही रोज़ पहले ही सदर ज़रदारी दिल के दौरे पर मुल्क से बाहर गए थे। पीछे से साबिक़ क्रिकेटर इमरान खान जलसे पे जलसा कर रहे हैं। लोग कहते हैं कि इमरान खान फौज के साथ मिलकर हुकूमत को हटाना चाहता है। लोगों के मुंह में घी-शक्कर। शायर ने भी इमरान खान के बारे में क्या खूब कहा है- जब भी कोई वर्दी देखूं, मेरा दिल दीवाना बोले, ओले, ओले, ओले। उम्मीद रखें, जैसे लोग कहते हैं, वैसा ही हो। और इसके साथ हमारे मज़मून का वक्त खत्म हुआ चाहता है। हमें यक़ीन है इस बात का क़ौम जोश और वलवले के साथ इस्तकबाल कराएगी।

(हसीब आसिफ पाकिस्तान के मज़ाह निगार हैं। यह व्यंग्य काफिला से साभार। )

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

गुमनाम मौतें



                                                             

उनकी मौत पर,

ना कभी टी.वी. एंकरों ने चीख चीख कर बहसें की,

ना कभी बुद्धिप्राणियों ने लच्छेदार भाषाओँ में,

मानवाधिकार की वकालत की,

ना ही अखबारों के सम्पादकीय में उनका जिक्र था,

ना ही नेताओं के भाषणों में उनका फ़िक्र था,

ना तो कोई मोमबती लेकर इण्डिया गेट पर जलाने आया ,

ना ही किसी शहर को जबरदस्ती बंद कराया गया,

ना ही किसी ने फेसबुक पर इसे लेकर कोई टिप्पणी की,

ना ही किसी की भावनाए कभी आहत हुई,

ना ही किसी ने भेदभाव की शिकायत की,

ना ही किसी ने न्याय मिलने पर ख़ुशी जताई,

ना ही किसी ने देशभक्ति/द्रोह की रोटियाँ सेंकी,

ना ही किसी ने स्वायत्ता की सियासी गोटियाँ फेंकी,

किसी ने जहमत नहीं उठाई,

मरने के पहले या बाद में,

कहीं भी स्पीड पोस्ट भेजने की,

बस एक गुमनाम मौतों के रजिस्टर में ,

एक संख्या जोड़ दी गयी ,

कभी कभी आलसवश वह भी छोड़ दी गयी,

उनके मौत के पहले कभी,

उनकी अंतिम इच्छा भी नहीं पूछी गयी ,

यदि पूछा भी जाता तो शायद वह ,

एक कम्बल और बिस्तर से ज्यादा कुछ नहीं बताता ,

मरने से पहले काश वह, एक दिन चैन से सो तो पाता.

                                                                           - नेपथ्य निशांत

शनिवार, 19 जनवरी 2013

चीटियों की बस्ती



http://news.stanford.edu/news/2003/may7/gifs/Ant_Chat2_300.jpg

एक सूखी हुई बारिश की छोटी सी धारा के दोनों और चीटियों की दो बस्तियां थी. मानसून के दरम्यान दोनों बस्तियों की चीटियाँ दूर रहती. बारिश के ख़त्म होते ही दोनों बस्तियों की लड़ाकू चीटियाँ एक दूसरे के नजदीक अपने संगीने तान लेती . चीटियों मैं वैसे तो बहुत तरह की चीटियाँ थी. लेकिन मुख्यत: तीन तरह की चीटियाँ थी. हुकुमती  चीटियाँ, लड़ाकू  चीटियाँ और आम चीटियाँ. कहने को तो दोनों बस्तियों मैं चीटीतंत्र था, जहाँ हर चीटी के चीटीधिकार बराबर थे . लेकिन बड़ी ही खूबसूरती से हुकुमती चीटियाँ, कभी कूट तो कभी फुट नीति से  आम चीटियों पर शासन करती और बहुत सारा माल पानी सिर्फ हुकुमती चीटियाँ चट कर जाती . बचा हुआ के आधे में  रसद पानी लड़ाकू चीटियों को अपने स्वास्थ्य एवं कुरबानी के लिए तैयार रहने के लिए मिलता. बाकी बचे हुए में  आम चीटियों को जिनकी संख्या सबसे ज्यादा थी गुजरा करना पड़ता. इधर कुछ समय से दोनों ही बस्तियों के आम चीटियों  मैं काफी आक्रोश पाया गया. वे सियासती या हुकुमती  चीटियों से हिसाब मांगना शुरू कर दे रही थी. शुरू में आम चीटियों को दबाने के लिए लड़ाकू चीटियों का प्रयोग किया गया. फिर उनके बीच में मतभेद करने की कोशिश की गयी . लेकिन हर २ या ३ दिनों के बाद फिर किसी ना किसी मुद्दे पर आम चीटियाँ हुकुमती चीटियों से हिसाब मांगने लगती.
 इन सबसे परेशान होकर दोनों तरफ की हुकुमती चीटियों ने एक गहरी चाल चली. एक दिन दोनों बस्तियों के कुछ लड़ाकू चीटियाँ को मरा हुआ पाया गया. अब दोनों तरफ की  आम चीटियाँ, हुकुमती चीटियों के साथ हो गयी और दूसरे बस्ती पर जल्द से जल्द आक्रमण करने की बात कही  जा रही थी. आम चीटियों के सारे मुद्दे और बेचेनी ठन्डे बस्ते में पड़ गए थे. दोनों तरफ से खिलाडी , कलाकार एवं अन्य आम चीटियों को वापस बुलाया या भेजा जा रहा था.
शुक्र था, तब तक बारिश हो गयी . धारा के प्रवाह ने दोनों और के लड़ाकू  चीटियों को वापस लौटने पर मजबूर किया. हुकुमतीं चीटियों ने फिर से शांतिवार्ता का स्वांग रचाया. दोनों और के चीतापति , चीतामंत्री एक दूसरे की बस्ती मैं अपने परिवार सहित पिकनिक मनाये , अच्छा अच्छा खानापीना खाकर , नाच गाना देख कर लौट आये. इस ख़ुशी के मौके पर एक दूसरे की बस्ती मैं गलती से घुस आये कुछ चीटियों को छोड़ा गया. कुछ को रख लिया गया , जिन्हें विश्वास बहाली के नाम पर आने वाले सालों मैं छोड़ा जायेगा.
दोनों बस्ती के ज्यादातर आम  चीटियों को फिर से कुछ समझ में  नहीं आ रहा है  .
                                            
                                                  ----------    नेपथ्य निशांत


शनिवार, 12 जनवरी 2013

सख्त जांच



सब जगह
शोर है ,
संदेह है .
मन के अन्दर
ही अन्दर
कई तूफ़ान हैं ,
एक इस्तीफे के
मांग है  .

पर बिल्ला  तो
साफ़ कहता है,
मलाई का कटोरा
नहीं छोडूंगा !
इस्तीफा ! नहीं नहीं
वो तो नहीं दूंगा .

एक काम हो
सकता है ,
कार्यवाही होगी ,
इस सबके के पीछे
सख्त जांच होगी .

जांच ? सख्त ?
ये तो वही है ना
जो ढीले लोग करते
हैं , उबासियाँ भरते हुए.
वो ख़त्म हो जाते हैं ,
पर ये जांच ..ये
ख़त्म नहीं होतीं .

सख्त जो ठहरीं !

                 --------- दीपशिखा वर्मा 

स्वाद

http://www.myindiapictures.com/pictures/up1/2011/11/beautiful-indian-women-painting-art.jpg

एक दिन नीरू की शादी हुई . लड़केवाले उसे देखने आये थे. होने वाले पति की दादी ने उससे रामयाण की चौपाईयां सुनी थीं. होने वाली सास ने भी जब तक उसके रूप और गुणों की तारीफ नहीं की तब तक उसकी माँ  को चैन की सांस नहीं आई. होने वाले ससुर ने घर की तारीफ़ की और बेटे और बहु के लिए नयी गाडी की मांग मनवा ली. होने वाले पतिदेव ने उसके कॉलेज , उसकी पढाई का पूरा ब्यौरा ले लिया . भई आज के ज़माने में सबको पढ़ी लिखी बीवी चाहिए न. फिर रिश्ता पक्का हो गया. तो आखिर शादी भी हो गयी.

कहावतों में तो चार दिन की चांदनी फिर भी मिलती है नीरू को तो वो भी नसीब नहीं हुयी. दुसरे ही दिन जब शगुन का मीठा बनाने की बात चली तो पता चला की बहुरानी को तो बस चाय ही बनानी आती है. तब उस दिन मिल्क मेड के गुलाब जामुन बनाकर किसी तरह काम चलाया गया. मेहमानों के जाते ही उसे सबकी बातें सुनने को मिली की इतनी बड़ी हो गयी अब तक खाना बनाना नहीं सीखा?? पता नहीं लोग अपनी बेटियों की शादी क्यों कर देते हैं जब उन्हें कुछ सिखा के नहीं भेजते तो. नीरू को माँ ने सिखाया था हर परिस्थिति में सामंजस्य बिठा कर रखना. उसने माफ़ी मांगी और खाना बनान सीख लिया धीरे धीरे. 

कुछ दिन शान्ति से कटे फिर एक दिन तूफ़ान आ गया. नीरू को ऑफिस में एक फाइल पूरी कर के देनी थी जिसको वो ननद की शादी के चलते वक़्त पे पूरा नहीं कर पायी थी.  देर तक रुक कर उसने काम किया तो उसको  घर छोड़ने आया उसका एक पुराना दोस्त जोकि उसी के साथ काम भी करता था .  बस ये देखते ही ससुराल  के सब लोग उसे बातें सुनाने लगे कि उसे घर की मर्यादा का बिलकुल भी ध्यान नहीं है.

उस रात नीरू और उसके पति में झगडा हो गया. वो बोला कि तुम कुछ भी ठीक से नहीं कर सकती हो और फिर बेचारी बनकर सबकी सहानुभूति जीतना चाहती हो बस. जो खाना तुम बनाती हो उसे क्या खाना कहते हैं?? माँ के हाथ के खाने जैसा स्वाद ही नहीं. आते ही मेरे ऊपर राज चलाना चाहती हो. जूते ऐसे मत रखो, सिगरेट मत पियो, ज्यादा देर से घर मत आया करो. और जो तुम किसी के भी साथ इतनी रात को घर आती हो, पडोसी बातें बनायेंगे तो क्या जवाब देंगे हम उनको?? इतना ही शौक है अगर ऑफिस में रुकने का तो वहीँ पे रह जाती न घर आने कि क्या ज़रुरत है??? ये सब सुनकर नीरू कि आँखों में आसूं आ गए. उसका पति फिर चिल्लाया कि अब एक और नाटक शुरू करने कि ज़रुरत नहीं है. 

अगली सुबह किसी ने उसपर ध्यान नहीं दिया.  उसे ऑफिस भी नहीं जाने दिया गया. उसके बाद पूरे दिन नीरू सोचती रही कि मैंने क्या बिगाड़ा था किसी का जो ऐसे लोग मुझे मिले हैं. मेरी किसी को परवाह नहीं और हर छोटी बात को बड़ा इलज़ाम बना कर मेरे सर डाल दिया जाता है. उस दिन उसने फैसला किया की अपने पति को उनकी सारी बातों का जवाब देना है. उस शाम जब पति ने उससे कुछ बोलना चाहा तो नीरू ने बीच में टोक कर बोलना शुरू किया . " घर पे पढ़ी लिखी बीवी की क्या ज़रुरत है जब उसे अपनी मर्ज़ी से जीने का हक देना ही नहीं है तो. मुझे खाना बनाना नहीं आता,  नहीं बनाती अच्छा खाना , क्योंकि जब मेरे पढने के दिन थे तो मैं बस पढ़ती थी आपके और आपकी बहिन  की तरह. किसी प्रवेश परीक्षा में लड़कियों के खाना बनाने के गुर को देख कर ज्यादा मार्क्स नहीं दिए जाते.  और रहा ऑफिस में ज्यादा देर रुक कर घर देर से आने का सवाल तो जब आपको ऑफिस का कोई काम करना होता है किसी डैडलाइन  में और आप नहीं कर पाते हैं तो क्या आपको ज़रूरत नहीं होती रुककर काम करने की?अगर मेरा कोई दोस्त मुझे छोड़ने घर आया तो उसको शुक्रिया कहने की जगह मुझ पर ही  दोष डाल रहे हो. जब आप अपने ऑफिस से किसी के साथ घर आते हैं तो उसके लिए तो चाय नाश्ता सजाया जाता है. सिगरेट आपकी खुद की भलाई के लिए छोड़ने को कहती हूँ मैं. मैंने अपना प्रमोशन  लेने से मन कर दिया ताकि बीवी की कमाई ज्यादा देखकर कहीं आपके अहम् को ठेस न पहुंचे. मैंने अपने घर बदला, नए लोगों को अपना परिवार माना, अपनी पहचान भी बदल दी शादी के बाद और आप अपने कमरे में जूते रखने की जगह भी नहीं बदल सकते क्या?? पता है बहुत सोचने के बाद मुझे ध्यान आया की एक चीज़ है जिसमें आपकी माँ के हाथ जैसा स्वाद आएगा" ये कह कर नीरू ने अपने पति को जोर का एक तमाचा मारा और पूछा इसमें तो आया होगा न माँ के हाथ जैसा स्वाद.

बुधवार, 19 सितंबर 2012

लापता जिंदगी..



चश्मे के डब्बे में आँखे रख़ कर
चश्मा पहन मैं निकला घर से..
जूते पहनने के बाद ख़याल आया,
पैर तो भूल आया पिछले ही रास्ते में..!!
छींक आते आते रुक गयी
आँख खुली की खुली रह गयी..
नाक पे हाथ गया तो याद आया,
नाक तो घर पे टंगे पतलून की जेब में रखे
उस सफ़ेद रूमाल में रह गयी..!!
कुछ कहने लगा फुसफुसा कर,
किसी को उसके कान में 
आवाज़ का ढूंढे पता नहीं लगा,
लगता है रह गयी फोन के रिसीवर में..!!
लिखने के लिए पेन टटोला 
कमीज की जेब में,
पर सिवाय डायरी के कुछ ना मिला,
लगता है लिखते लिखते कागज़ में गुम हो गया..!!
मैं मौजूद हूँ किसी महफ़िल में..
हाथ-मिलाते, गपियाते, हँसते-मुस्कुराते..
अचानक याद आया बाथरूम में जिसे छोड़ आया था
उसकी कितनी शकल मिलती थी मुझसे...!!!

- कन्हैया (कनु)

शनिवार, 18 अगस्त 2012

भारतीय कौन ???


सवाल उठता है भारतीय कौन है इस भारत में .. इसी सवाल को जानने कि जेद्दोजेहद में मैंने पाया कोई १% सिरफिरे है इस १२० करोर में जो भारतीय है | यहाँ कोई हिन्दू है तू कोई मुस्लिम कोई सिख कोई जैन ,सब कुछ न कुछ है तो, हिन्दुस्तानी कहा
ँ है ?
१२० हिन्दुस्तानियों में सब बटें है , पहले धर्म के नाम पर, फिर जाति के नाम पर, फिर भाषा के नाम पर जो बचे जो छेत्र के नाम पर| बचपन से ही सिखा दिया जाता है तुम मुसलमान हो मुसलमान के साथ रहो, तू हिन्दू है मुस्लिम से मत बात कर .. मुस्लिम को हिन्दू के मंदिर में नहीं जाना है और हिन्दू को मस्जिद और चर्च में.. ये सब भूल जाते है कि पैदा तो तुम सब यहीं हुए हो तुम्हारी सैकड़ों पुश्तें इस धरती पर बीत गयीं जाहे मुसलमान हो या हिन्दू या ईसाई| धर्म में घुसो तो ये चमार है ये ब्रह्मिन है ये बनिया है ये लाला है ये धोबी है .. इसके यहाँ नहीं जाना उसके यहाँ नहीं जाना .. इसके साथ नहीं बैठना .. इसके साथ मत खाओ .. बड़े लोग समझा देते है और हम सब मानते है हमही सब... तब सब का दिमाग घास चरने जाता है .. और जो पदे है उनमे ये भावना और बलवती होती है . वो खुद तो कट्टर्पथी बन जाते है १०-२० को और जोड़ लेते है | राष्ट्र वाद कि भावना मार जाती है | जाति के अन्दर भी बटवारा है .. वो कहेगा में पिछड़ों में ऊँचा हूँ .. मैं अगड़ों में ऊँचा हूँ... जो समाज के लोगों मैं खुद को नीचे समझते है वो भी किसी न किसी तरीके से खुद को अपनी ही जाति के दूसरों साथियों से ऊँचे बताने लगेंगे |
जो बंगाली है उसका कोई दूसरा बंगाली साथी मिल गया तो उसके और साथ चलने वाले भाद मै जाये उसको फ़िक्र नहीं रहती किसी बिहारी को बिहारी मिल गया तो उसकी भी बात बन गयी .. इनमे जो भारतीय है वो अकेला रह जायेगा| ये सभी हर कहीं भारत के किसी कोने में मिलेगा |
जब कोई भारतीय ओलंपिक में जीत गया लोगों को उसकी फिकर नहीं लेकिन असम में कुछ बंगलादेशी और बोडो में झड़प हो गयी तो सभी कुछ सर पर उठालंगे ..क्यूंकि उनके धर्म पर प्रहार है, उनकी प्रतिष्ठा का प्रशन है . वो वोट उसे ही देंगे जो उनके धर्म का विकास करें न कि उनका ..कहीं किसी भी देश में उनके धर्म पर विपदा आ जाये तो लगेगा उनकी जान निकल ली किसी ने, जायेंगे .. कुछ राष्ट्रीय संपत्ति जला देंगे.. और एक दो जब तक मार न जाये तब तक सफल नही होगा आन्दोलन ..
अमेरिका इतना बड़ा देश है और भारत कि तरह ही संघीय देश है ..क्या इस तरह का छेत्रवाद वहां दिखता है..नहीं ..
अब बात की जाये राष्ट्रवाद पर . कितने है यहाँ जो राष्ट्रगान बजने पर उठ जाते है .. कई तो 'विजई विश्व तिरंगा प्यारा को " राष्ट्रगान बता देंगे . और जो जानते है की ये भी राष्ट्रगान है तो उनको इस गीत को सम्मान देने की फुर्सत नहीं है .. कहाँ है तुम लोगों के बीच का हिन्दुस्तानी भाग.. अब किसी को जबरदस्ती तो की नहीं जा सकती की भाई इसका सम्मान कर उसका सम्मान कर ... हिन्दू है तो उसे पता है मंदिर का सम्मान करना है ..मुस्लिम है नमाज़ के लिए समय निकल ही लेगा वो भी कितना ही बिजी हो .. क्यूँ ?? भैया धर्म की बात है इसको सम्मान नहीं करेगा तो नरक में जायेगा ,जहन्नुम में जायेगा .. इनको ये नहीं पता ऐसे ही तुम्हारे अन्दर की भारतीयता मरती रही तो तो जल्द ही समय आएगा की कहीं के नहीं रहोगे ..
यही कारन है की हम जापान , जर्मनी , इसराईल जैसे अदने से देशों से पीछे है क्यूंकि हमको अपनी जाति को आगे बढाना है, हमको अपने धर्म को बढाना है .. कितना भी जाहिल नेता हो अगर मेरेa धर्म का है तो वोट उसे ही दूंगा चाहे जीतने के बाद मुझे ही लुट ले .. तुम्हे तो लूटेगा ही और तेरे जैसे हजारों को भी लूटेगा .. लकिन हम बाज़ आते कहाँ है ..

अरे सम्हल जाओ नहीं तो न तेरा धर्म बचेगा न जाति , इस देश को जिस तरह बल्लभ भाई पटेल ने टुकड़े -२ लेके जोड़ा है वो वैसे ही बट जायेगा और वो समय जल्द ही आएगा |