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गुरुवार, 15 अगस्त 2013

जलियांवाला बाग़ : इतिहास के झरोखों से 

 स्वतंत्रता दिवस पर विशेष

१३ अप्रैल १९१९ के पहले जलियांवाला बाग़  अन्य किसी सामान्य बाग़ की तरह ही था. स्वर्ण मंदिर के नजदीक स्थित इस बाग़ का नाम जलियावाला इसके पुराने मलिक के नाम पर है . यह बाग़ चारो तरफ से ऊँची दीवालों से घिरा है, जिसके  बाहर निकलने के लिए सिर्फ एक तरफ का संकरा रास्ता है. इस बाग़ में एक कुआँ एवं एक छोटा सा मंदिर भी है. इस वर्ष के  ग्रीष्मावकाश  में मुझे इस तीर्थ के दर्शन का  अवसर मिला.


आज यहाँ बेहद शांति है. आसमान में सूरज निखर आया है . बड़ी संख्या में लोग इस बाग़ में घुमने आये हैं.  विश्वास ही नहीं होता यहीं वह जगह है , जहाँ कभी जनरल डायर संकरे रास्ते से कुछ सैनिको के साथ आ कर एक निहत्थी सभा कर रहे लोगों पर गोलियां चलाता है.


जलियाँवाला बाग़ में प्रवेश का संकरा रास्ता




जरा कैलेण्डर को पीछे घुमा कर देखते हैं.  
अप्रैल १९१९ , सारे देश की तरह अमृतसर शहर में भी महात्मा गाँधी के आह्वान पर सत्याग्रह का आन्दोलन जोड़ पकड़ने लगता है. ६ अप्रैल १९१९ को अमृतसर में एक आम हड़ताल रखी जाती है. आज  ९ अप्रैल रामनवमी का दिन है. सत्याग्रह के समर्थन में एक बड़ी रैली निकाली जा रही है. इस रैली के नेता डॉ सैफुदीन किचलू एवं डॉ सत्यपाल को पुलिस गिरफ्तार करके धर्मशाला भेज देती है.


 डॉ सैफुदीन किचलू 

डॉ सत्यपाल 
अगले दिन कुछ लोग उप कमिश्नर से मिलकर इन दोनों के रिहाई के लिए ज्ञापन देना चाहते है. लेकिन इनके ऊपर गोलियां चला दी जाती है. शहर में हिंसा भड़क उठती है, बेंक एवं रेलवे स्टशन को निशाना बनाया जाता है. फिर १२ अप्रैल को दो अन्य स्थानीय नेताओ चौधरी बग्गामल और महाशय रतनचंद को गिरफ्तार किया जाता है. शहर के नागरिक प्रशासन की जिम्मेवारी ब्रिगेडियर जनरल आर ई अच् डायर को दे दी जाती है. जो शहर में कफ्यू लगाता है एवं अपने सैनिको को किसी को सड़क पर देखते ही गोली मारने का आदेश देता है. लेकिन इस बात की सूचना का प्रचार नागरिको के बीच नहीं कराया जाता है.
१३ अप्रैल १९१९ , आज बैशाखी का दिन है. जालियावाला बैग में शाम में एक आम सभा हो रही है.  सूर्यास्त होने में कुल १० मिनट के करीब शेष रहे होंगे. लेकिन तभी जनरल डायर १५० सैनिको के साथ यहाँ दाखिल होता और अंधाधुंध गोलियां चला देता है. लोग जान बचाने की लिए जमीन पर लेट रहे है. तो कोई आवेश में आकर आगे बढ़ रहा है. कई लोग कुएं  में कूद कर जान बचाने की कोशिश कर रहे हैं. 
शहीदी कुआँ 
लेकिन तभी गोलियां उधर चलने लगती है. लोग दीवारों पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं,
दीवारों पर गोलियों के निशान 
  डायर उन दीवारों की तरफ अपने सैनिको को इशारा कर रहा है. गोलियां चलती है, लोग गिर जाते हैं. चारो तरफ से चीखें हैं, क्रंदन हैं , लाशें हैं. सूर्यास्त हो चूका है . करीब ४०० लोग दम तोड़ चुके हैं .शहर में कफ्यू है, लोग अपने मित्रो को इलाज या  अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं ले जा पा रहे हैं.

केलेंडर को फिर समेटते हैं, और वर्तमान मैं लौटते है.
भाई साहेब थोडा सा हतियेगा , एक तस्वीर निकालनी है.
जरुर साब जी ..
शहीद स्मारक 

हँसते खिलते बच्चे एवं उनके परिवार शहीद स्मारक के  नजदीक जा कर फोटो के लिए पोज दे रहे है.  बाग़ के एक और एक छोटा सा संग्रहालय है, जहाँ इस घटना, उस समय के समाचार पत्रों में इसके कवरेज एवं तात्कालिक परिस्थितयों के बारे में विस्तार से  लिखा है. रविन्द्रनाथ टगोर द्वारा सर की उपाधि वापस करने से लेकर चर्चिल के ब्यान तक मौजूद है.  लेकिन मुझे दुःख इस बात का लगा, बहुत खोजने पर भी मुझे कोई ऐसा दस्तावेज या डायरी देखने को नहीं मिला ,जहाँ शहीद हुए सभी लोगों का नाम या तस्वीर उपलब्ध हो . हाँ यदा कदा कुछ संस्मरणों में कुछ शहीदों की तस्वीरें एवं उनकी कहानियां जरुर लिखी है. यह सही है, उनकी शहीदी किसी नाम या परिचय का मोहताज नहीं , वो सब अपने वतन पर मिटने वाले लोग थे. लेकिन  हमारी जनतांत्रिक सरकार इस दिशा में थोडा पहल तो कर ही सकती है. 

सग्रहालय में बनी एक पेंटिंग 

- नेपथ्य निशांत 

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

कुछ लिखा है...

१. दूर कहीं से एक पास आती हुई आवाज़ आती है,
      धीरे-धीरे एक धुंधली से चीज़ करीब आती दिखती है
बढ़ी धडकनों और हडबडआहट के बेच, सूटकेस उठाकर
        चल पड़ता हूँ अपनी मंजिल की और, प्लेटफार्म पर सबसे आगे
#ट्रेन आ रही है

 २. ट्रक सामने है, और उसके पीछे कुछ कारें
         इनके बाद कुछ ऑटो हैं, चलो धीरे धीरे आगे बढें
     सामने आती हुई तेज़ बाईक को इशारा कर दो
        और भागकर जल्दी से उस पार पहुँचो
#रोड पार करना है

३. उस वक़्त वो दृश्य अलौकिक सा लगता है, चुम्बकीय आकर्षण
      और मन की साड़ी मलिनता , चिंता बह जाती हैं
  उस भीनी ऊष्मा और हलकी पीली लाल रोशिनी में नहाये
      आकाश में उड़ते परिंदे किसी की याद दिलाते हैं
#ढलता सूरज 

रविवार, 3 फ़रवरी 2013

जागृति : यात्रा यादों भरी (भाग तीन)



अगला पड़ाव था हुबली कर्नाटक के एक छोटे से गाँव -कालकेरी संगीत विद्यालय और सेल्को ! इस धारवाड़ जैसे छोटे से शहर से दूर बसा हुआ यह स्कूल बिलकुल गुरुकुल की तर्ज़ पर चलता है।एक पूरी तरह से सौर ऊर्जा से जगमगाता गाँव ....प्रकृति के सर्व सुलभ,सहज उपलब्ध ऊर्जा के इस स्त्रोत का लाभ !प्रकृति की गोद में ,बियाबान के चहचहाते पंछियों के बीच,पेड़ों से छनती धूप ,गोबर से लीपे रंगोली से सजे आँगन !फिजा में ही सुर बसते हैं यहाँ की (मैं यहाँ वापस आना चाहूंगी ..खुद की तो दिली ख्वाहिश है ...आगे खुदा  की ख्वाहिश पर है! )हमने सबसे पहले वहां के छात्रों का शानदार परफॉरमेंस देखा और  तबला वादन से तो खासा प्रभावित हुए।उनकी सच्ची मेहनत झलक रही थी।फिर आगे हम उनके स्टाफ से मिले।इस स्कूल का प्रशासन एडम  चलाते हैं जो 7 सालों से भारत में रहते हैं .वहां मौजूद और भी  2-3 विलायती लोगों से मिले। मुझे लगा कि हम भारत के होकर भी ऐसे माहौल से वंचित हैं।और वो लोग यहीं के होकर रह गये ....कला और बच्चों से प्रेम और भारत की आबो हवा ...यहाँ की फिजा ने जो उन्हें अपने आगोश में लिया तो बस अब वे यहीं रह कर उन्हें सिखाते हैं,पढ़ाते हैं। आसपास के आर्थिक रूप से असक्षम परिवारों के बच्चों को न सिर्फ संगीत बल्कि बहुमुखी विकास की ,आवासीय   भरपूर सुविधा है यहाँ। इसके बाद सेल्को की कहानी सुनी। कि  क्यूँ भारत को दूसरे  ऊर्जा स्त्रोतों के अलावा सौर ऊर्जा का ही सबसे अच्छा विकल्प लेना चाहिए।सौर ऊर्जा के वितरण में और इसकी स्थायित्व ये कुछ प्रमुख चुनौतियाँ हैं उनके सामने।एक जो बात मुझे अच्छी लगी कि शिक्षा को कैसे उन्होंने सौर ऊर्जा से जोड़ा ....स्कूल जाओगे तभी घर पर रोशनी होगी। सेल्को की इस लम्बी यात्रा को  शब्दों में विस्तार देना मुश्किल है। 
इसके बाद हम मिले टो होल्ड हुनरमंदों से ....महाराष्ट्र के कोल्हापुरी चप्पलों को गढ़ते हैं ...और कैसे महिला सशक्तिकरण की पहल के पन्नों में भी खुद को दर्ज करा रहे हैं।पति-पत्नी दोनों मिलकर काम करते हैं फिर भी मालिकाना हक पत्नी का होता है।शिक्षा और अशिक्षा दोनों के साथ भी इनकी पीढियां इस कला को देश विदेश में नाम दिला रही हैं।
                                            

अगला गढ़ था,इन्फोसिस  बंगलुरु कैंपस .इतनी शांति,हरियाली, और ईको  फ्रेंडली वाहन,साइकल्स पर सवार एम्प्लोयीज़ देखकर बेहद सुकून मिलता है।प्रेक्षाग्रह में हमने इन्फोसिस की यात्रा सुनी।'' Be daring,be different !! ''..ये एक बात जो मैंने उनके डाक्यूमेंट्री फिल्म से खासकर के नोट की .कैसे विश्व की शीर्ष आई .टी .कंपनियों में से एक इन्फोसिस की बिनाह किन मूल्यों पर आधारित है।इन्फोसिस परिवार का हर सदस्य कितना महत्व पाता है।एक और बात काबिले गौर है कि उन्होंने कहा कि आप इसे मानव संसाधन विकास कहें (H.R.D.)कहें न कि टेक्नोलॉजी का विकास! उपभोक्ताओं की संतुष्टि,उत्कृष्टता ,ईमानदारी ,पारदर्शिता उनके कुछ आधारबिन्दु हैं।
फिर सुना हमने किरण मजुमदार शॉ को ....एक हिन्दुस्तानी औरत की संघर्ष से कामयाबी के शिखर पर पहुँचने की कहानी! डॉक्टर बनना चाहती थी पर आज बायोकॉन की सर्वेसर्वा हैं। ज़िन्दगी हारों से सीखकर आगे बढ़ना सिखाती है .लेकिन हारेंगे नही तो फिर जीतना कैसे सीखेंगे। तो ज़िन्दगी में हार बेहद ज़रूरी है। आज 40% शोधकर्ता महिलाएं हैं बायोकॉन में .पहले दो कर्मचारी सेवानिवृत्त होने वाले दो कार मेकेनिक थे ...और पहली सेक्रेटरी और कोई नही मिलने पर एक दोस्त! पहला दफ्तर घर के गेराज  में! 
फिर पैनल डिस्कशन -रेड्बस,फ्लिप्कार्ट ,ज़ेवामे और डैल के प्रतिनिधि मेहमानों से मिले। दरअसल लंच के बाद मैं ऊंघ रही थी (मानव स्वभाव !) तो ज्यादा कुछ तो लिख नही पायी।पर जो चीज़ मैंने अपनी डायरी के पन्नों में दर्ज की वो -आप को किसी भी चीज़ के बारे में जूनून और सच में उसे करने का ज़ज्बा होना चाहिए।इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कि आप तकनीकी रूप से दक्ष है या नही।

                                             ---------------- स्पर्श चौधरी

सोमवार, 21 जनवरी 2013

जागृति : यात्रा यादों भरी (भाग दो)


 
पहले दिन हमें 22 समूहों में बांटा गया .हमारे समूह-f  के सदस्यों से और मेंटर से परिचय हुआ .सभी अलग अलग पृष्ठभूमि और संस्कृति से आये  -तो अब हम भी गर्व से कह सकते हैं कि हमारे ही जैसे उद्देश्यों वाले और कुछ करने की जिद लिए हुए लोग हमारे मित्रों का अब ये समूह सारे  विश्व में फैला है। 

दिन-दूसरा -क्रिसमस का दिन हमने रेल में ही बिताया .इससे पहले कुर्ला स्टेशन  पर ही क्रिसमस मनाया .मुझे यकीन है कि ऐसा अनोखा क्रिसमस किसी ने भी नहीं मनाया होगा-450 के बड़े परिवार के साथ!

मंज़र है कुछ निराला सा -भावनाएं अपने पूरे उफान पर हैं।सफ़र तो अभी शुरू हुआ था .हर एक पड़ाव ही मानों मंजिल नज़र आ रही हो। बाहर  खिड़की से झाँकने पर लगता है कि जब समंदर में गोते लगाने में उसकी गहराईओं में खोने में,लहरों के साथ अठखेलियाँ करने में इतना मज़ा आ रहा हो तो किनारे तक पहुँचने की जल्दी किसे है!!  अपने सुविधापूर्ण जीवन से बाहर निकलकर उद्यम और उद्यमिता के ज़रिये  नवीन भारत  का एक नया ढांचा तैयार करने का अद्भुत सफ़र है यह।( मुझे यहाँ एक और बात शशांक सर के उद्बोधन की यहाँ याद आ रही है कि उद्यमिता एक बड़ा ही विस्तृत क्षेत्र है-आप एक उद्यमी नौकरशाह भी हो सकते हो -बस कुछ  नया करने के लिए ,सीखने के लिए अपने कानों और मस्तिष्क के दरवाज़े और खिडकियों को नए विचारों के लिए खोल दें।अपने उद्यमी हाथों को भी बख्श दें .-क्यूंकि

                       जब मंजिल बिलकुल उजले पानी की तरह साफ़ नज़र आये
                      और उसे पाने की चाहत और पागलपन सर पर सवार हो
                      तब ही हासिल होता है इस दुनिया में कुछ ....

और ये बात तो हर एक रोल मॉडल से मिलकर और भी साफ़ होती जा रही थी। कि कुछ करने का जूनून,आत्मविश्वास हो तो आर्थिक समस्याएं और अन्य बाक़ी मुद्दे भी धीरे धीरे हल हो जायेंगे।


आज रेल में पहला दिन था तो -ख़ास रूप से बनाये गये बाथरूम्स ,कम्पार्टमेंट जो इस रेल के बड़े से चलित घर
का हमारा कमरा था जिसे हमें और 4-5 लोगों के साथ बांटना था जोकि मुझे लगता था बेहद प्यारा था -से परिचय हुआ।
नेहा,नेहा,दिव्या,अमृता ,पल्लवी,एलिज़ाबेथ,संजना  मेरे सह -कम्पार्टमेंट यात्री थे।अगले कम्पार्टमेंट में भी हमारे ही समूह के लोग थे .और वहीँ हमारी मेंटर भी थी तो औपचारिक और अनौपचारिक चर्चाएं वहीँ हुआ करती थीं।

मैंने सपने में भी नही सोचा था कि  चूंकि मैं थोड़ी अंतर्मुखी किस्म की हूँ तो इतनी जल्दी दोस्ती कर लुंगी .
पर मुझे याद है कि मैं बीमार हो गयी थी , कोई मेरे सर पर बाम लगा रहा था- कोई दवाई दे रहा था तो कोई मेरे लिए खिचड़ी का इंतजाम कर रहा था। इतना प्यार,केयर और सहयोग सालों की गहरी दोस्ती में ही देखने को मिलता है पर यात्रा की बात ही निराली थी!! :) :) मुझे बड़ा भावुक सा महसूस हो रहा है।

                                           ---------------- स्पर्श चौधरी 

रविवार, 13 जनवरी 2013

जागृति : यात्रा यादों भरी (भाग एक )

एक यादगार दिन मेरे जीवन का -उर्जा और जोश से लबरेज ,परिवर्तन की लहर का एक हिस्सा बनने के उत्सुक,जुनूनी हम 450 युवा जो देश भर के 24 राज्यों के साथ साथ 13 देशों के 27 अंतर्राष्ट्रीय यात्री हैं टाटा सामाजिक विकास संस्थान ,चेम्बूर में लॉन्चिंग समारोह में -भारतीय संस्कृति की खूबसूरत छटाओं का अवलोकन .जागृति परिवार की-कार्य यात्रा ,उद्देश्य ,परिवार के सदस्यों से परिचय ,उनका परिवार से जुड़ाव ,सब को जानना ;वातानुकूलित कक्ष में उंघते लोगों को (ये तो हम हमेशा करते ही हैं पुनः एनर्जी का रिफिल करने का काम किया सुन्दर और भावपूर्ण जागृति गीत ने जिसे प्रसून जोशी ने कलमबद्ध और बाबुल सुप्रियो ने लयबद्ध ,आदेश श्रीवास्तव ने संगीत निर्देशन किया है ....ये इन दिनों मेरे अन्दर ज़ज्ब हो गया है ....जब भी गुनगुनाती हूँ ,रोंगटे से खड़े हो जाते हैं और यादें ताज़ा हो जाती हैं -                                                                                    

http://youtu.be/2xYJsMtMns8

आई .आई .टी .दिल्ली के भूतपूर्व छात्र शशांक मणि त्रिपाठी की इस नयी सोच की शुरुआत हुई थी 1997 में आज़ादी के 50 सालों के जश्न पर 'आज़ाद भारत की रेल यात्रा ' से जो बाद में 2007 में 'उद्यम के ज़रिये भारत निर्माण ' पर आधारित हो गयी।वन्दे मातरम-इस धरती को सुजलाम सुफलाम बनाने के लिए हम निकले हैं सच्चे भारत की यात्रा पर या आत्म अन्वेषण की यात्रा पर -गाँधी के दांडी मार्च से प्रेरित होकर उन्ही के पदचिन्हों पर चलकर ही 'भारत ' की खोज के लिए शुरुआत हुई थी इस यात्रा की .

इसके बाद हम मिले अपने प्रथम रोल मॉडल से -डब्बावाला के प्रमुख से -



घर से दूर रहने वालों से अच्छा कौन घर के बने खाने की महक की महत्ता समझ सकता है ! मुंबई एक महानगर -हर वक़्त भाग दौड़ में लगा रहने वाला -इंसान को अपने खाने की भी फुर्सत नही ...!
ऐसे में कोई तो है यहाँ जिसे उन तमाम लोगों के भोजन के प्रबंध की चिंता है ...डब्बावाला ! जिससे तकरीबन 2 लाख लोग रोज़ लाभान्वित होते हैं .(2.5 मिलियन -मैन्युअल ट्रांजिट है )-आज तक कोई गलती नही हुई ...या बोले तो त्रुटि की दर 1 इन 16 मिलियन है।
इस तकनीकी ज़माने में बिना किसी तकनीक के सहारे के रोजाना समय पर डब्बे ले जाना और वापस लाना आसन काम नही है - ऐसा प्रबंधन वो भी बिना किसी एम् .बी . ए के ही नही सभी सदस्य अशिक्षित या
अतिअल्प शिक्षित हैं तब ये कर रहे हैं। 114 साल पुराना ये ट्रस्ट लगातार काम करता रहता है -इसमें कोई सेवानिवृत्ति की उम्र नही है .हर एक सदस्य को 40 उपभोक्ताओं के लिए डब्बे लाना लेजाना होता है। लोकल ट्रेन पर ,साइकल्स ,हाथ ठेला ,पर हाथों में 60-65 किलो के टिफ़िन बास्केट्स लिए सर पर सफ़ेद गाँधी टोपी-(ट्रेडमार्क ) लगाये अगर आपको कोई दिखे तो वो डब्बावाला के ही सदस्य हैं . एक बारगी एक घडी ख़राब हो सकती है -पर डब्बावाले नही! आज तक अपनी अंदरूनी वजहों से कोई हड़ताल नही-इनके भी अपने उसूल हैं- काम के दौरान शराब नही,पहचान पत्र और गाँधी टोपी पहनना -नही मानने पर जुर्माना भरना होता है
एक कोडिंग सिस्टम जो माशेलकर जी(प्रमुख) के ही दिमाग की उपज है के अनुसारकाम होता है वरना इतने बड़े मुंबई में 4 लाख डब्बों को लेजाना और वापिस लाना आसान नही है -
चाहे कोई ही क्यूँ न आ जाये वो रोज़ के काम में बाधा नही बन सकता-प्रिंस चार्ल्स ने जब उनसे मिलना चाहा तो उन्होंने कहा कि वे पांच सितारा होटल में नही आयेंगे क्यूंकि काम का वक़्त है-तो उन्हें उनसे मिलने फूटपाथ पर ही आना पड़ा -बड़े गर्व के साथ बताते हैं वे कि आज बर्मिंघम में कोहिनूर के बाजू में उनका डब्बा और सफ़ेद टोपी रखी गयी है .50 प्रभावशाली व्यक्तियों की फेहरिस्त में शामिल हैं वे -गिनीस बुक में दर्ज आदि से बढ़कर उनका काम है-प्रदुषण हीन ,बिना किसी निवेश के ,शांतिपूर्ण तरीके से ,99.99% सेवा ,100% उपभोक्ता की संतुष्टि उनकी विशेषताएं हैं


सचमुच उस एक घंटे में उन्होंने हमें वो सिखा दिया जो शायद किसी प्रबंधन के संस्थान में भी कोई क्या ही सिखाएगा! मंत्रमुग्ध कर दिया उन्होंने और उन के काम ने -लगा कि बड़ी बड़ी डिग्री फीकी पड़ गयी उनके सामने !!!


                              -------------------- स्पर्श चौधरी 










शनिवार, 12 जनवरी 2013

अतिथि देवो भवः !

जैसे कहते हैं न ज़िन्दगी में सीखने के लिए कोई वक़्त नही होता......हर व्यक्ति,या कहें जीव .....घटना.....स्थान ,यात्रा;कुछ न कुछ सिखा देती है .....इसी यात्रा के दौरान फिर कुछ ऐसा ही हुआ....कि भगवान् महाकाल के दर्शन करने के बाद....और ..ओम्कारेश्वर से आगे.....किसी सुनसान इलाके में हमारी कार खराब हो गयी.....आंधी -तूफ़ान का मौसम हो रहा था....पर...भगवान् की कृपा से....पास  में दो घर दिखाई दिए......तो जान में जान आई..... फिर तो जो हुआ....उससे मुझे अतिथि देवो भवः वाली बात चरितार्थ दिखाई दी....जिसपर से शहरों में रहने के बाद थोडा विश्वास डगमगा जाता है जहाँ लोगों के पास अपने अलावा औरों के लिए वक़्त ज़रा कम ही होता है....पर...यहाँ.....दरअसल रात के ९-१० बज रहे थे....और....इस समय पर किसी मेकेनिक का मिलना मुश्किल था और....कोई उपाय भी नहीं था.....फिर भी.....गाँव के नवयुवकों ने पूरी कोशिश की जिन्हें इसकी जानकारी थी.....पर जब कुछ नही  संभव हो पाया तो....उनमे से एक ने हमें अपने घर में ही रात बिताने का सुझाव या कहें स्नेहल आग्रह किया.....हमारे पास भी और कोई उपाय नही था.....तो हम भी तैयार हो गये....और घर पर रात्रि विश्राम का यह अनुभव तो जैसे अद्भुत था.....वो एक कृषक परिवार था....हमारे बहुत मना करने के बाद भी...खुद चारों ज़मीन पर सोये....और हमें चारपाई पर सुलाया.....हम तो थके थे....बड़ी ही....शांति से सोये.....यही नही उनके बच्चे टीवी देख रहे थे.....तो मैं और मेरी बहन भी देख रहे थे.....तो बस रिमोट हाथ में देकर खुद चले गये....हमें ऐसे लग रहा था कि हम घर में हैं......इतनी आत्मीयता के साथ रहने के बात हम अगले दिन दोपहर में वहां से निकल गये.....पर अगले दिन उन नवयुवकों में से एक जिन्होंने पापा के साथ गाड़ी को ठीक करवाने ले जाने में काफी मदद की....और जिनके यहाँ हमने रात्रि विश्राम किया....उनके बच्चों का फ़ोन आया कि आप लोग अच्छे से पहुँच तो गये थे....न....और....कहने लगे अंकल आप तो हमें शर्मिंदा कर रहे हैं......दरसल पापा ने उन्हें कुछ पैसे दिए थे मदद के धन्यवाद् स्वरुप .....तो कहने लगे....गाँव में ऐसा ही होता है अंकल....और आप लोग मुसीबत में थे....तो इंसानियत के नाते तो ये बनता ही है.....मुझे लगा....कि ये इंसानियत हम शहरी शायद भूल रहे हैं....खैर ...हम वापस आ गये इस आत्मीय अनुभव के साथ.....और भगवान् को धन्यवाद करते हुए.....क्यूंकि उस सुनसान जगह पर जैसे वो परिवार हमारे लिए भगवान् की तरह था.....!!...

                                                   --------------- स्पर्श चौधरी 

मेट्रो . अध्यात्म , मदर , मार्क्स एवं नगरवधू

मेट्रो , अध्यात्म , मदर , मार्क्स  एवं  नगरवधू 
                                       
                                                                                        - नेपथ्य  निशांत            
  
कहते हैं , प्लान  'बी' ,  प्लान  'ए' से खुबसूरत होना चाहिए . शुक्रिया कोहरे और  हमारे देश की रेलवे का ,  जो  हावड़ा से मुंबई जाने वाली  रेलगाड़ी को  दूसरी  संपर्क  रेलगाड़ी  के  देर होने की वजह से बस प्लेट फॉर्म से जाते हुए  ही निहार पाए . ...... फिलहाल जैसा होना चाहिए  था ,वैसा ही हुआ........बीसियों बार कोलकाता से गुजरते वक़्त .....ये ख्वाइश थी , एक बार  कोलकाता  घुमने का.......

 कोलकाता ................................................................................................
."   रेलिया बेरन पिया को लिए  जाए  रे "....अक्सर  बिहार  एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश की नव विवाहिताए  अपने आंसुओं को  पोंछते हुए गुनगुना उठती थी .........सच में  बेरन रेलिया नहीं कोलकाता थी ....लेकिन  उलहना कोलकाता को नहीं  रेलिया को  मिलती  थी .....वे समझती थी , यदि उनके मर्द कोलकाता नहीं गये तो घरबार कैसे चलेगा .......

कोलकाता ..............................................................................................
कोलकाता  देश की  बौद्धिक  राजधानी ...... परमहंस  एवं  विवेकानन्द का शहर ........
बंकिमचंद , टैगोर , शरतचंद , बिभूति शरण बंदोपाध्याय , आशापूर्ण  देवी  ....से  लेकर महाश्वेता देवी   तक शायद कोलकाता के पृष्ठ भूमि वाले  लेखकों के कलम  का मैं बचपन  से ही आशिक रहा हूँ ........................... आज  जब तमाम  दलालों एवं  मेरे जैसे अन्य यात्रियों के  बीच धक्कामुक्की  के बीच   दुसरे दिन के  तत्काल टिकट पर 'कन्फर्म ' का स्टेटस पाता हूँ , तो अपने को ग्लेडिएटर से कम नहीं समझता .........................
खैर, आधे दिन से कम का  समय बचा है ,  और पता चला की यहाँ से  वेलुर मठ काफी दूर पर है ..........
नजदीक  में मेट्रो स्टेशन है , जहाँ से  कालीघाट  जाया जा सकता है ......................

मेट्रो .................................................................................................................
देश का सबसे पुराना मेट्रो ........ कोलकाता मेट्रो में  दिल्ली मेट्रो  जैसी   रौनक  तो नहीं  है ......
लेकिन यहाँ की मेट्रो  सिर्फ  जमीन के अन्दर चलती है ......................
पूरी मेट्रो वाली फीलिंग देती है ...............
लेकिन सबसे सुखद आश्चर्य ,  मेट्रो  स्टेशन के नाम  में  कवियों  को बड़ी वरीयता दी गयी है ..........
दो स्टेशन कवी गुरु के नाम से हैं ....रविन्द्र सदन  एवं रविन्द्र सरवर ,एक उनकी महान रचना गीतांजलि पर ...
दो  और  स्टेशन ,  दो  कवियों  कवि सुभाष एवं कवि नजरुल  को  समर्पित है .....................
काश दुसरे शहर में भी अपने कवियों के लिए  इतना सम्मान होता ..............

अध्यात्म  ...............................................................................................................
कालीघाट मेट्रो स्टेशन .....
अरे यहाँ तो कोलकाता है ही नहीं  ......
छोटे छोटे दूकान , घर .......
कहीं कोई  माल   या बड़े शहर की  चमक दमक नहीं ......
पश्चमी  उत्तर प्रदेश के  कोई नगर पंचायत भी इससे  ज्यादा  रौनक लगेगा .....
११ नम्बर वाले बस या कहिये पेदल   चल कर  कालीघाट के प्रसिद्ध काली मंदिर पहुँचता हूँ .....
अध्यात्म  और  बाजार (या किसी की जीवटता ही कह लिजिए ) का पुराना सम्बन्ध शुरू ..........
"  मंदिर  का मुख्य कपाट अभी बंद है , दर्शन करना चाहते हो तो , २०० रु /- लगेगा "......
एक तिलक धारी युवक ने तपाक से पूछा ...........
" क्या  लगता है ,आपको  चोरी से दर्शन का कोई फायदा  होगा ..."
"  चोरी से नहीं ,यह वी . आइ. पी . के लिए है ".....
कभी मंदिरों के कपाट कुछ वी . आई . पी. ( तथाकथित ?) जातियों के लिए ही सुरक्षित थे .....
बड़ी  मुश्किल से सबके लिए खुल पाए थे .........
फिर से उन्हें नवसृजित वी . आई . पी. के लिए सुरक्षित  किया जा रहा था ........
फिलहाल मैंने  आम आदमी की तरह प्रवेश लिया .....
अन्दर काफी भीड़ थी .....और युवक की सुचना भी गलत थी .लेकिन  भीड़  के नियत्रण  की कोई व्यवस्था नहीं थी ......
मैंने  मंदिर समिति का एक बोर्ड देखा . उनके सदस्य एवं अध्यक्ष में स्थानीय  अधिकारीयों के उच्च पदों  के नाम लिखे थे .....
पता नहीं  शायद सारे किसी बड़ी  दुर्घटना (माफ़ कीजियेगा लेकिन भीड़ के नियत्रण की कोई व्यवस्था ना होने की वजह से ऐसा हो सकता है ....) का इंतज़ार कर रहे हों .................
मंदिर परिसर  में  एक जगह प्रसाद स्वरुप खिचड़ी  बांटी जा रही थी ......
बिना किसी  कतार के , मैं  ले  पाने  में  सफल रहा . खिचड़ी  साधारण लेकिन बहुत अच्छी लगी .........
भूख  भी जो तेज लगी थी ...........
तभी एक छोटा सा बालक पैर पकड़ कर पैसे मानने लगा .....
मैंने पैसे देने से मना कर दिया .......
पता नहीं सही या गलत , पर मुझे लगता है ,पैसे देने से हम समाधान के 
बजाय समस्या का हिस्सा हो जाता है .....
हो सकता है यह पूर्ण सत्य  ना हो .....
फिलहाल मैं मंदिर से बाहर आ जाता हूँ .........................
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  "  मदर , मार्क्स  एवं नगरवधू "   पर चर्चा  अगले पोस्ट  में .........................
   

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

यायावरी - दिल्ली

ये दिल्ली है मेरे यार...बस इश्क मुहब्बत प्यार!
   पता नहीं क्यूँ, इस शहर में कुछ आकर्षण सा लगता है. शायद ऐतिहासिक घटनाओं का केंद्र होने की वजह से, भारत की राजधानी होने की वजह से, फिल्मों की वजह से, शाह-रुख की वजह से, यहाँ की मेट्रो की वजह से या हजारे आन्दोलन की वजह से इस शहर की कुछ अलग ही छवि है मानसपटल पर. खैर, बचपन में एक बार यहाँ आया था, लेकिन ऑटो वालों की बदतमीजी, न्यू डेल्ही स्टेशन के बहार लटकते बिजली के तारों और मेट्रो के अलावा कुछ ख़ास याद न था.
                                      पहली मुलाकात के करीब ६ साल बाद फिर से मोहतरमा से मिलने का मौका मिला -  और दिलो-दिमाग में फिर से दिल्ली  की वही "रहस्यमयी छवि" घूमने लगी. मुंबई से सुबह ८ बजे बैठे मेरे तीन मित्र और मैं. अगले दिन सुबह ५ बजे हम दिल्ली में थे, अक्टूबर की हलकी गुलाबी ठण्ड में चाय की चुस्की लेते हुई बतिया रहे. इस बार दिल्ली थोड़ी अलग नज़र आई. नया नया रेलवे स्टेशन, जिसपर काम ज़ारी था. पहले वाले तार गायब थे. चाय ख़त्म कर हम बढ़ चले अपनी "मंजिल" की ओर.रास्ते में एक बस मिली-बस में हम चढ़े, कंडक्टर ने पैसे लिए और इससे पहले कि बिल माँगा जाए,मंजिल आ गयी.बिल बनाया गया ४० रुपयों का, और १०० मीटर न चली होगी बस. पिछली बार ऑटो वाले थे, इस बार बस वाला-कुछ चीज़ें नहीं बदली थी.
      जल्दी ही आगे का यात्रा वर्णन लिखूंगा...आते रहिएगा ब्लॉग पर दो एक दिनों में..