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रविवार, 20 अप्रैल 2014

आहत

[ मैंने यह कविता करीब ६-७  वर्ष पूर्व एक कवि सम्मेलन से लौटने के पश्चात प्रतिक्रिया स्वरुप लिखी थी. वर्तमान में जब मीडिया की  निष्पक्षता सवालों के घेरों में हैं, कवियों एवं लेखको के एकपक्षीय विमर्श को  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सभी आयामों का सम्मान करते हुए  भी कटघरे में  खड़ा करने की आवश्यकता है .] 


चौबीस घंटे के पश्चात्
रह रह कर मेरा मन कर रहा व्याघात  
वहां मैंने सुनी बहुतेरे कवियों की बात
कुछ ने हास्य - व्यंगयों से सभा का श्रृंगार किया, 
कुछ ने अपनी प्रतिभा से पाकिस्तान पर प्रहार किया,
कुछ ने गुजरात दंगो पर अपना विचार दिया
यहीं है वह बात
जहाँ रह रह कर , मेरा मन कर रहा व्याघात
इन चंद कवियों को बहुत याद आई
जलते हुए साबरमती एक्सप्रेस की
लेकिन , इनकी आँखों में नहीं बची थी इतनी दृष्टि
इनके नाकों में नहीं बची थी , इतनी घ्राण शक्ति ,
जो नरोदा पटिया की सडती लाशों की बू को भी सूंघ पाते
उनके कानो में नहीं बची थी , इतनी श्रवण शक्ति ,
जो गुलमर्ग सोसाइटी के क्रंदन को भी सुन पाते,
इसी तरह जब मैं पढ़ता हूँ ,
‘हंस’ के काव्य भाग को ,
तो इन पृष्ठों पर नहीं पाता, एस-६ डब्बे की बात
उनकी संवेदनाये , मानवीय भावनाये
सारी तुकबंदी एवं काव्यात्मक उपमाये
प्रारंभ होती है , गोधरा के पश्चात्
यही है वो बात ,
जहाँ रह रह कर, मेरा मन कर रहा व्याघात
मैं पूछता हूँ ,
क्या जलती आग की लपटों से
उठने वाली मासूम चीखों में भी अंतर होता है .
या फिर अंतर होता है ,
इंसानों को जलाने के लिए प्रयुक्त होने वाली पेट्रोल में,
नहीं कोई अंतर नहीं  होता, तो फिर क्यों,
इस आग पर सेंके जाने वाले राजनीति की रोटियों की तर्ज पर ,
कवियों की संवेदनाये और भावनाए रंग बदल लेती है.
फिलहाल , मुझे इन कवियों की कविताओ से ज्यादा इन्तजार है,
किस्से के उस लड़के की जो,
एक मूर्ख  और नग्न राजा की सवारी में ,
दुदंभी नाद और जयघोष के बीच,
बड़े ही अबोधता  से सहज कह उठे
“अरे राजा तो नंगा है “
हाँ,  इस बात की सम्भावना बहुत ज्यादा है,
उस लड़के के परिजन उसके मुहं पर हाथ डालते हुए कहें 
“अबे, चुप हो जा ,यदि राजा के कानो तक,
पहुँच गयी यह बात,
मिल जायेगा प्राणदंड बातों ही बात “
                                  - नेपथ्य निशांत 


गुरुवार, 15 अगस्त 2013

जलियांवाला बाग़ : इतिहास के झरोखों से 

 स्वतंत्रता दिवस पर विशेष

१३ अप्रैल १९१९ के पहले जलियांवाला बाग़  अन्य किसी सामान्य बाग़ की तरह ही था. स्वर्ण मंदिर के नजदीक स्थित इस बाग़ का नाम जलियावाला इसके पुराने मलिक के नाम पर है . यह बाग़ चारो तरफ से ऊँची दीवालों से घिरा है, जिसके  बाहर निकलने के लिए सिर्फ एक तरफ का संकरा रास्ता है. इस बाग़ में एक कुआँ एवं एक छोटा सा मंदिर भी है. इस वर्ष के  ग्रीष्मावकाश  में मुझे इस तीर्थ के दर्शन का  अवसर मिला.


आज यहाँ बेहद शांति है. आसमान में सूरज निखर आया है . बड़ी संख्या में लोग इस बाग़ में घुमने आये हैं.  विश्वास ही नहीं होता यहीं वह जगह है , जहाँ कभी जनरल डायर संकरे रास्ते से कुछ सैनिको के साथ आ कर एक निहत्थी सभा कर रहे लोगों पर गोलियां चलाता है.


जलियाँवाला बाग़ में प्रवेश का संकरा रास्ता




जरा कैलेण्डर को पीछे घुमा कर देखते हैं.  
अप्रैल १९१९ , सारे देश की तरह अमृतसर शहर में भी महात्मा गाँधी के आह्वान पर सत्याग्रह का आन्दोलन जोड़ पकड़ने लगता है. ६ अप्रैल १९१९ को अमृतसर में एक आम हड़ताल रखी जाती है. आज  ९ अप्रैल रामनवमी का दिन है. सत्याग्रह के समर्थन में एक बड़ी रैली निकाली जा रही है. इस रैली के नेता डॉ सैफुदीन किचलू एवं डॉ सत्यपाल को पुलिस गिरफ्तार करके धर्मशाला भेज देती है.


 डॉ सैफुदीन किचलू 

डॉ सत्यपाल 
अगले दिन कुछ लोग उप कमिश्नर से मिलकर इन दोनों के रिहाई के लिए ज्ञापन देना चाहते है. लेकिन इनके ऊपर गोलियां चला दी जाती है. शहर में हिंसा भड़क उठती है, बेंक एवं रेलवे स्टशन को निशाना बनाया जाता है. फिर १२ अप्रैल को दो अन्य स्थानीय नेताओ चौधरी बग्गामल और महाशय रतनचंद को गिरफ्तार किया जाता है. शहर के नागरिक प्रशासन की जिम्मेवारी ब्रिगेडियर जनरल आर ई अच् डायर को दे दी जाती है. जो शहर में कफ्यू लगाता है एवं अपने सैनिको को किसी को सड़क पर देखते ही गोली मारने का आदेश देता है. लेकिन इस बात की सूचना का प्रचार नागरिको के बीच नहीं कराया जाता है.
१३ अप्रैल १९१९ , आज बैशाखी का दिन है. जालियावाला बैग में शाम में एक आम सभा हो रही है.  सूर्यास्त होने में कुल १० मिनट के करीब शेष रहे होंगे. लेकिन तभी जनरल डायर १५० सैनिको के साथ यहाँ दाखिल होता और अंधाधुंध गोलियां चला देता है. लोग जान बचाने की लिए जमीन पर लेट रहे है. तो कोई आवेश में आकर आगे बढ़ रहा है. कई लोग कुएं  में कूद कर जान बचाने की कोशिश कर रहे हैं. 
शहीदी कुआँ 
लेकिन तभी गोलियां उधर चलने लगती है. लोग दीवारों पर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं,
दीवारों पर गोलियों के निशान 
  डायर उन दीवारों की तरफ अपने सैनिको को इशारा कर रहा है. गोलियां चलती है, लोग गिर जाते हैं. चारो तरफ से चीखें हैं, क्रंदन हैं , लाशें हैं. सूर्यास्त हो चूका है . करीब ४०० लोग दम तोड़ चुके हैं .शहर में कफ्यू है, लोग अपने मित्रो को इलाज या  अंतिम संस्कार के लिए भी नहीं ले जा पा रहे हैं.

केलेंडर को फिर समेटते हैं, और वर्तमान मैं लौटते है.
भाई साहेब थोडा सा हतियेगा , एक तस्वीर निकालनी है.
जरुर साब जी ..
शहीद स्मारक 

हँसते खिलते बच्चे एवं उनके परिवार शहीद स्मारक के  नजदीक जा कर फोटो के लिए पोज दे रहे है.  बाग़ के एक और एक छोटा सा संग्रहालय है, जहाँ इस घटना, उस समय के समाचार पत्रों में इसके कवरेज एवं तात्कालिक परिस्थितयों के बारे में विस्तार से  लिखा है. रविन्द्रनाथ टगोर द्वारा सर की उपाधि वापस करने से लेकर चर्चिल के ब्यान तक मौजूद है.  लेकिन मुझे दुःख इस बात का लगा, बहुत खोजने पर भी मुझे कोई ऐसा दस्तावेज या डायरी देखने को नहीं मिला ,जहाँ शहीद हुए सभी लोगों का नाम या तस्वीर उपलब्ध हो . हाँ यदा कदा कुछ संस्मरणों में कुछ शहीदों की तस्वीरें एवं उनकी कहानियां जरुर लिखी है. यह सही है, उनकी शहीदी किसी नाम या परिचय का मोहताज नहीं , वो सब अपने वतन पर मिटने वाले लोग थे. लेकिन  हमारी जनतांत्रिक सरकार इस दिशा में थोडा पहल तो कर ही सकती है. 

सग्रहालय में बनी एक पेंटिंग 

- नेपथ्य निशांत 

बुधवार, 5 जून 2013

आइये जाने # 2 विश्व पर्यावरण दिवस

विश्व पर्यावरण दिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा सकारात्मक पर्यावरणकार्य हेतु दुनियाभर में मनाया जाने वाला सबसे बड़ा उत्सव है। पर्यावरण औरजीवन का अन्योन्याश्रित संबंध है तथापि हमें अलग से यह दिवस मनाकर पर्यावरणके संरक्षण, संवर्धन और विकास का संकल्प लेने की आवश्यकता पड़ रही है। यहचिंताजनक ही नहीं, शर्मनाक भी है। पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर सन् 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टाकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों कापहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया। इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहलीबारएक ही पृथ्वी का सिद्धांतमान्य किया। इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP)का जन्म हुआ तथा प्रति वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस आयोजित करके नागरिकों को प्रदूषण की समस्या से अवगत कराने का निश्चय किया गया। तथा इसका मुख्य उद्देश्यपर्यावरण के प्रति जागरूकता लाते हुए राजनीतिक चेतना जागृत करना और आम जनताको प्रेरित करना था। उक्त गोष्ठी में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 'पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति एवं उसका विश्व के भविष्य पर प्रभाव' विषय पर व्याख्यान दिया था। पर्यावरण-सुरक्षा की दिशा में यह भारत का प्रारंभिक क़दम था। तभी से हम प्रति वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाते आ रहे हैं।

दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक,भारत हरित अर्थव्यवस्था बनने का प्रयास कर रहा है। नए सर्वेक्षण में खुलासा हुआहै कि भारतीय लोग आर्थिक वृद्धि पर पर्यावरण रक्षा को मामूली रूप सेप्राथमिकता देते हैं। अमेरिका की प्रमुख सर्वेक्षण एजेंसी गैलपने अपने ताजा सर्वेक्षण में कहा किज़्यादातर आबादी अर्थव्यवस्था से ज़्यादा पर्यावरण पर ध्यान केंद्रित किएहुए हैं। गैलप की मानें तो भारत ने वैश्विक भूभाग पर हरित क्षेत्र कोबढ़ाने के उल्लेखनीय प्रयास किए हैं। इसकी एक बानगी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली है, जहाँ हाल के वर्षो में हरित क्षेत्र में वृद्धि दर्ज की गई है। दिल्लीका लगभग 20 फीसदी हिस्सा वनों से ढका हुआ है। सरकार ने अगले कुछ सालों में इसे बढ़ाकर 25 फीसदी करने का लक्ष्य रखा है।

शनिवार, 18 मई 2013

प्रत्याशा




हाँ तू है उर्वशी, मेरी निश्छल प्रेयसी,
अगणित भवरों की लिप्सा अतृप्त  कली,

क्यों है प्रथम स्नेह की अबोध संसृति,
करती मृदु मुस्कान से उर्जस्वित प्रीती ;

हो उत्प्लवन अभिलाषा नहीं संकोच मृगनयनी ,
दुर्लभ स्वप्न नहीं, है बनना संगीतमयी  सहधर्मिणी

                                                             -------------------  शिवेंद्र सिद्धार्थ "शाहबाज़"

खोया क्यों है आज तू ?



अम्बर की हर ऊंचाई पर, समुद्र के गहन की कोख तक है तू
माँ के आंचल मे, घर के आंगन मे है तू
जीवन के हर एक पहलू में गतिशील, फिर भी खोया क्यों है आज तू

मन मे तूफ़ान को लिए घूमता है, पर पहाडों से आज भी थरथराता है तू
कई अरमानों को गुथ रखा है, पर शिकायतों का सैलाब है तू
सही राह का बोध है तुझे, फिर भी गलत राहों पर लुप्त है तू
सच-झूठ का परिज्ञान है, फिर भी खोया क्यों है आज तू

मिट चुका वजूद है तेरा, क्यों  विनाश से भयभीत है तू
बिक चुका ईमान है तेरा, वंचन से क्यों आतंकित है तू
भीगती रगों मे ओजस है इतना, इस क्रांति को क्यों नकारता है तू
ऎलान का लय निकट है, फिर क्यों  आज खोया है तू
                                   
                                                                                  ------------------  निमिष मेहता

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

प्रेमोत्सव



आज वैलेंटाइन दिवस है, जिसको हमारे देश में भी प्रेम दिवस की शक्ल में पहचाना जाने लगा है। अब आपको अपने आस पास ऐसे कई लोग मिल जायेंगे जो आज के दिन या तो गुमसुम बैठे होंगे कि उनकी ज़िन्दगी में तो कोई प्रेम करने वाला/ वाली ही नहीं, या कुछ ऐसे भी होंगे जो अपने इस दुःख को एक दम्भी हँसी के पीछे छुपाये बैठे होंगे और गाते फिर रहे होंगे की हम तो अकेले हैं, सो प्रेम के साथ जो झंझट मुफ्त मिलते हैं वो हमको नहीं हैं, तो जी हम इस बात की ख़ुशी मनाएंगे। 

मैं सबसे कहना चाहती हूँ कि प्यार तो दुनिया में हर तरफ बिखरा पड़ा है, बस हम ही उसको महसूस नहीं करते। हमने अपने अन्दर के सब खिड़की दरवाज़े बंद कर रखे हैं और प्यार खटखटाता रहता है, पर हम सुनते नहीं, और उस बेचारे को हम तक पहुँचने का कोई जरिया भी नहीं मिलता। अजीब लगा पढ़कर? कह दो की नहीं, तुम फ़ालतू बात कर रही हो। पर एक बार ज़रा ये सोचकर देखो कि  जिस हवा में तुम साँस ले रहे हो, जिस रौशनी में सब कुछ देखते हो, क्या वो भगवान् का बरसाया हुआ प्यार नहीं तुमपर? ये प्रकृति हमसे इस कदर प्रेम करती है कि  हम उसको कब से दुहते आ रहे हैं, लूटते आ रहे हैं, तब भी हमें फूल देती है, फल देती है, खनिज, अन्न सब तो देती है। हमारे माता पिता, जिहोने हमें इतने प्यार से पाल पोस कर बड़ा किया है, क्या वो भूल सकता है कोई? हमारा परिवार, हमारे दोस्त सब जो हमको गिरते ही संभालने आ जाते है, प्यार ही तो करते हैं हमसे। 

हाँ, मानती हूँ की उस उल्फत की जगह कुछ ख़ास होती है दिल में, पर प्यार तो अब भी है हमारी ज़िन्दगी में। बल्कि, मैं तो कहती हूँ कि ज़िन्दगी प्यार के रंगों से रंगी हुयी एक तस्वीर है। हमारा कर्तव्य है की हम जो प्यार इस जहाँ से हासिल करते हैं, वो प्यार इस दुनिया को, उन सबको वापिस उतनी ही शिद्दत से दें। प्यार के इस लेन- देन के बीच कभी तो वो पल भी आएगा जब हमको वो मुहब्बत  हासिल होगी जो हमें मुक्कमल बना दे। पर तब तक, प्यार का ये उत्सव मनाते रहो! 

मोहब्बत!




मोहब्बत की बुनियाद पर तो ये मुक्कम्मल जहाँ टिका हुआ है जनाब! अब वैलेंटाइन्स डे आ रहा है तो मैंने सोचा कि चलिए कुछ हमारी गुमसुम सी कलम से भी इश्क फरमा लिया जाए!।इस दुनिया के ज़र्रे ज़र्रे में मोहब्बत घर करती है तभी तो हम सब साथ में जीते हैं .नही तो आदमी तो है ही खुदगर्ज़ अव्वल दर्जे का! बस जिस्मानी लिबास बदल जाता है मोहब्बत का ...कभी इंसान से ,कभी किसी चीज़ से ,कभी किसी पालतू जानवर से ....! पर मेरे लिए मोहब्बत के मायने शायद सब से अलग हो सकते हैं। ।मेरे लिए प्यार के तसव्वुर को सबसे पहले जो तीन शख्स सच करते हैं वो हैं मेरी माँ,पापा,और छोटी बहन ! उन्होंने हर वो चीज़ की है मेरे लिए जो वो ज्यादा से ज्यादा कर सकते हैं मेरे लिए .बदले में तो मैं क्या ही उनके लिए उतना कर पाऊं जो वो मेरे लिए करते हैं।और वैसे भी वो बदले में कुछ नही चाहते क्यूँकी यही तो प्यार की परिभाषा है और प्यार की ,अपनेपन की पहली सीख तो वहीँ से मिलती है न!सच्चे प्यार में चाहे खुद को तकलीफ हो जाए पर अगर उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ सके तो प्यार के मायने पूरे हो गये . सच मानिए तो प्यार की पहली सीढ़ी विश्वास है,इतना भरोसा कि एक बार खुद पर शक हो सकता है पर उसपर नही! क्यूंकि वो आपको इतना जानता है कि आपसे बेहतर उसे पता होगा कि कहाँ आपके कदम डगमगायेंगे ! उसकी रग़ रग़ से आप वाकिफ हों ....तो लफ़्ज़ों की कोई ज़रुरत ही नही।क्यूंकि दिल की गहराईओं की पुकारों को सुनने के लिए आपको बाहर के शोर को तो कम करना होगा न! कहते हैं जो बातें जुबां से नही कही जा सकतीं वो ये कम्बख्त आखें बखूबी कह डालती हैं ...कमबख्त इसलिए क्यूंकि जब आप कुछ छुपाना चाहें तो भी नही देती ये .जब आप किसी से दिलों जान से मोहब्बत करते हैं तो आप खुदगर्ज़ नही हो सकते ....आप सिर्फ आप दोनों के बारे में ही नही सोच सकते ..आप परिवार के खिलाफ जाकर उनकी दुआओं के बिना आगे नही बढ़ सकते ....हाँ अगर वो नही समझते तब और बात है पर तब भी उनके साथ मशविरा करके ....उन्हें समझाकर उनके आशीर्वाद के बरगद तले अपना प्यार का आशियाँ बनाइये !....कहते हैं जब हम किसी से बेइन्तहा मोहब्बत करते हैं तो हम जाने अनजाने सबसे ज्यादा उसे ही तकलीफ भी देते हैं ....ये एक दम सही भी है क्यूंकि कहीं न कहीं यही वह शख्स है जिस के सामने आप जी भर के रो सकते हैं ,गुस्सा निकाल सकते हैं, पर उसकी तकलीफ की मरहम भी तो आप ही बन सकते हैं! शायद इन फिल्मों ने जो तस्वीर प्यार की दिखाई है,उससे आजकल की पीढ़ी के हम लोगों में से ज्यादातर दिखावे के लिए गर्लफ्रेंडऔर बॉयफ्रेंड बनाते हैं ..और कब तक निभायेंगे इसका भी कोई ठिकाना नहीं .... हम उसे ही प्यार मान बैठते हैं .शरीर से कहीं ऊपर उठकर दो आत्माओं का संगम है सच्चे प्यार का ये रिश्ता.वो रिश्ता जो एक बार जुड़ गया तो ताउम्र निभाने का है।
सिर्फ मोमबत्तियों की रोशनी ,खूबसूरत फूलों की खुशबू ,चॉकलेट्स या रोमांटिक म्यूजिक ही माहौल को रूमानी बनाने के लिए काफी नही ....अक्सर लड़कियां इस मामले में काफी परियों की दुनियां में रहती हैं।तो शायद लड़कों को भी लगता है कि इन सब चीज़ों से वो इम्प्रेस हो जाएंगी पर ...अगर ये न हो तो लगता है कितना अनरोमांटिक है ये ! पर इन सबसे बढ़कर प्यार का हर लम्हा ख़ास होता है ....शायद ये सब चीज़ें उन्हें और ख़ास बना दें ..! अपने साथी का आप उसके बुरे और अच्छे हर पल में बखूबी साथ निभाएं ....अगर कुछ खोने के लिए है तो आपका इगो .जो काफी मुश्किल है ....जो आपको एक दूसरे से दूर कर सकता है ....जो आपके सबसे करीब होता या होती है वो चाहे आपका कितना भी मज़ाक उड़ा ले ...कितना ही आपको टीज़ करे ....पर ज़रुरत पड़ने पर आपके लिए अपनी जान भी पेश कर सकते हैं .....खैर इससे याद आया कहीं पढ़ा था मैंने ...एक बार एक पत्नी ने बिलकुल रूखे से ...अनरोमांटिक पति से पूछा कि क्या आप उस पहाड़ी पर जाकर वो बेशकीमती फूल ले आयेंगे जिसके बारे में मुझे और आपको दोनों को पता है कि आप जिंदा वापस शायद ही आ पाएंगे ...तो पति बोले कि मैं इसका जवाब सुबह दूंगा ...उनकी सारी रात करवटों में गुज़री ....सुबह एक दूध के गिलास के नीचे दबे कागज़ के छोटे से टुकड़े पर जो लिखा था वो पढके उसकी आँखों से आंसुओं का जो सैलाब उमड़ा ...वो पूरी कहानी आप ही कह गया ....उसमें लिखा था .....क्यूँ उसका जिंदा रहना उसकी ज़रुरत ही नही दिली ख्वाहिश भी है क्यूंकि वो जब तक नही मर सकता जब तक वो यह पक्का न कर सके कि इस जहाँ में उससे भी ज्यादा कोई उसे प्यार ,उसकी फिक्र,देखभाल कर सकता है !...

पर इस प्यार और एह्तियाना बर्ताव के चक्कर में अगर कहीं औरत के स्वाभिमान ,उसकी आज़ादी के साथ कोई आदमी खेलता है तो वो बेशक झूठा या कुछ दिनों का दिखावटी प्यार है ....क्यूंकि विश्वास के बाद अपने साथी की ,उसके उसूलों की ,उसके ज़ज्बातों की इज्ज़त सबसे बड़ी चीज़ होती है . मनोवैज्ञानिक तौर पर भी सिद्ध हो चुका है कि जब एक औरत प्यार करती है तो अपना सब कुछ देकर भी उसे निभाती है पर ...आदमी को उसका ,उसके प्यार का ज्यादा इम्तेहान नही लेना चाहिए नही तो वो अगर चीज़ों को जोड़ना जानती है तो उसके गुस्से से भी आपको कोई नही बचा सकता ....मर्द होने का दंभ ज्यादा देर तक किसी रिश्ते में आड़े न ही आये तो बेहतर होगा ! 

तो वैलेंटाइन्स डे भले ही पाश्चात्य संस्कृति से आया हो पर प्रेम की सच्ची और सर्वोत्कृष्ट परिभाषा तो हमारी धरती पर कृष्ण और राधा ने ही दी थी ... शायद पश्चिम का अनुसरण करने के कारण आज हर तरफ इसका विरोध किया जाता है ...पर कहते हैं प्रेम सबसे अनुभूति है इस दुनिया की !..मनुष्य मात्र से प्रेम, प्रकृति से प्रेम या फिर किसी 'ख़ास ' से !
                                        
                                                                      ----------- स्पर्श चौधरी 

रविवार, 13 जनवरी 2013

जागृति : यात्रा यादों भरी (भाग एक )

एक यादगार दिन मेरे जीवन का -उर्जा और जोश से लबरेज ,परिवर्तन की लहर का एक हिस्सा बनने के उत्सुक,जुनूनी हम 450 युवा जो देश भर के 24 राज्यों के साथ साथ 13 देशों के 27 अंतर्राष्ट्रीय यात्री हैं टाटा सामाजिक विकास संस्थान ,चेम्बूर में लॉन्चिंग समारोह में -भारतीय संस्कृति की खूबसूरत छटाओं का अवलोकन .जागृति परिवार की-कार्य यात्रा ,उद्देश्य ,परिवार के सदस्यों से परिचय ,उनका परिवार से जुड़ाव ,सब को जानना ;वातानुकूलित कक्ष में उंघते लोगों को (ये तो हम हमेशा करते ही हैं पुनः एनर्जी का रिफिल करने का काम किया सुन्दर और भावपूर्ण जागृति गीत ने जिसे प्रसून जोशी ने कलमबद्ध और बाबुल सुप्रियो ने लयबद्ध ,आदेश श्रीवास्तव ने संगीत निर्देशन किया है ....ये इन दिनों मेरे अन्दर ज़ज्ब हो गया है ....जब भी गुनगुनाती हूँ ,रोंगटे से खड़े हो जाते हैं और यादें ताज़ा हो जाती हैं -                                                                                    

http://youtu.be/2xYJsMtMns8

आई .आई .टी .दिल्ली के भूतपूर्व छात्र शशांक मणि त्रिपाठी की इस नयी सोच की शुरुआत हुई थी 1997 में आज़ादी के 50 सालों के जश्न पर 'आज़ाद भारत की रेल यात्रा ' से जो बाद में 2007 में 'उद्यम के ज़रिये भारत निर्माण ' पर आधारित हो गयी।वन्दे मातरम-इस धरती को सुजलाम सुफलाम बनाने के लिए हम निकले हैं सच्चे भारत की यात्रा पर या आत्म अन्वेषण की यात्रा पर -गाँधी के दांडी मार्च से प्रेरित होकर उन्ही के पदचिन्हों पर चलकर ही 'भारत ' की खोज के लिए शुरुआत हुई थी इस यात्रा की .

इसके बाद हम मिले अपने प्रथम रोल मॉडल से -डब्बावाला के प्रमुख से -



घर से दूर रहने वालों से अच्छा कौन घर के बने खाने की महक की महत्ता समझ सकता है ! मुंबई एक महानगर -हर वक़्त भाग दौड़ में लगा रहने वाला -इंसान को अपने खाने की भी फुर्सत नही ...!
ऐसे में कोई तो है यहाँ जिसे उन तमाम लोगों के भोजन के प्रबंध की चिंता है ...डब्बावाला ! जिससे तकरीबन 2 लाख लोग रोज़ लाभान्वित होते हैं .(2.5 मिलियन -मैन्युअल ट्रांजिट है )-आज तक कोई गलती नही हुई ...या बोले तो त्रुटि की दर 1 इन 16 मिलियन है।
इस तकनीकी ज़माने में बिना किसी तकनीक के सहारे के रोजाना समय पर डब्बे ले जाना और वापस लाना आसन काम नही है - ऐसा प्रबंधन वो भी बिना किसी एम् .बी . ए के ही नही सभी सदस्य अशिक्षित या
अतिअल्प शिक्षित हैं तब ये कर रहे हैं। 114 साल पुराना ये ट्रस्ट लगातार काम करता रहता है -इसमें कोई सेवानिवृत्ति की उम्र नही है .हर एक सदस्य को 40 उपभोक्ताओं के लिए डब्बे लाना लेजाना होता है। लोकल ट्रेन पर ,साइकल्स ,हाथ ठेला ,पर हाथों में 60-65 किलो के टिफ़िन बास्केट्स लिए सर पर सफ़ेद गाँधी टोपी-(ट्रेडमार्क ) लगाये अगर आपको कोई दिखे तो वो डब्बावाला के ही सदस्य हैं . एक बारगी एक घडी ख़राब हो सकती है -पर डब्बावाले नही! आज तक अपनी अंदरूनी वजहों से कोई हड़ताल नही-इनके भी अपने उसूल हैं- काम के दौरान शराब नही,पहचान पत्र और गाँधी टोपी पहनना -नही मानने पर जुर्माना भरना होता है
एक कोडिंग सिस्टम जो माशेलकर जी(प्रमुख) के ही दिमाग की उपज है के अनुसारकाम होता है वरना इतने बड़े मुंबई में 4 लाख डब्बों को लेजाना और वापिस लाना आसान नही है -
चाहे कोई ही क्यूँ न आ जाये वो रोज़ के काम में बाधा नही बन सकता-प्रिंस चार्ल्स ने जब उनसे मिलना चाहा तो उन्होंने कहा कि वे पांच सितारा होटल में नही आयेंगे क्यूंकि काम का वक़्त है-तो उन्हें उनसे मिलने फूटपाथ पर ही आना पड़ा -बड़े गर्व के साथ बताते हैं वे कि आज बर्मिंघम में कोहिनूर के बाजू में उनका डब्बा और सफ़ेद टोपी रखी गयी है .50 प्रभावशाली व्यक्तियों की फेहरिस्त में शामिल हैं वे -गिनीस बुक में दर्ज आदि से बढ़कर उनका काम है-प्रदुषण हीन ,बिना किसी निवेश के ,शांतिपूर्ण तरीके से ,99.99% सेवा ,100% उपभोक्ता की संतुष्टि उनकी विशेषताएं हैं


सचमुच उस एक घंटे में उन्होंने हमें वो सिखा दिया जो शायद किसी प्रबंधन के संस्थान में भी कोई क्या ही सिखाएगा! मंत्रमुग्ध कर दिया उन्होंने और उन के काम ने -लगा कि बड़ी बड़ी डिग्री फीकी पड़ गयी उनके सामने !!!


                              -------------------- स्पर्श चौधरी 










शनिवार, 12 जनवरी 2013

मेट्रो . अध्यात्म , मदर , मार्क्स एवं नगरवधू

मेट्रो , अध्यात्म , मदर , मार्क्स  एवं  नगरवधू 
                                       
                                                                                        - नेपथ्य  निशांत            
  
कहते हैं , प्लान  'बी' ,  प्लान  'ए' से खुबसूरत होना चाहिए . शुक्रिया कोहरे और  हमारे देश की रेलवे का ,  जो  हावड़ा से मुंबई जाने वाली  रेलगाड़ी को  दूसरी  संपर्क  रेलगाड़ी  के  देर होने की वजह से बस प्लेट फॉर्म से जाते हुए  ही निहार पाए . ...... फिलहाल जैसा होना चाहिए  था ,वैसा ही हुआ........बीसियों बार कोलकाता से गुजरते वक़्त .....ये ख्वाइश थी , एक बार  कोलकाता  घुमने का.......

 कोलकाता ................................................................................................
."   रेलिया बेरन पिया को लिए  जाए  रे "....अक्सर  बिहार  एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश की नव विवाहिताए  अपने आंसुओं को  पोंछते हुए गुनगुना उठती थी .........सच में  बेरन रेलिया नहीं कोलकाता थी ....लेकिन  उलहना कोलकाता को नहीं  रेलिया को  मिलती  थी .....वे समझती थी , यदि उनके मर्द कोलकाता नहीं गये तो घरबार कैसे चलेगा .......

कोलकाता ..............................................................................................
कोलकाता  देश की  बौद्धिक  राजधानी ...... परमहंस  एवं  विवेकानन्द का शहर ........
बंकिमचंद , टैगोर , शरतचंद , बिभूति शरण बंदोपाध्याय , आशापूर्ण  देवी  ....से  लेकर महाश्वेता देवी   तक शायद कोलकाता के पृष्ठ भूमि वाले  लेखकों के कलम  का मैं बचपन  से ही आशिक रहा हूँ ........................... आज  जब तमाम  दलालों एवं  मेरे जैसे अन्य यात्रियों के  बीच धक्कामुक्की  के बीच   दुसरे दिन के  तत्काल टिकट पर 'कन्फर्म ' का स्टेटस पाता हूँ , तो अपने को ग्लेडिएटर से कम नहीं समझता .........................
खैर, आधे दिन से कम का  समय बचा है ,  और पता चला की यहाँ से  वेलुर मठ काफी दूर पर है ..........
नजदीक  में मेट्रो स्टेशन है , जहाँ से  कालीघाट  जाया जा सकता है ......................

मेट्रो .................................................................................................................
देश का सबसे पुराना मेट्रो ........ कोलकाता मेट्रो में  दिल्ली मेट्रो  जैसी   रौनक  तो नहीं  है ......
लेकिन यहाँ की मेट्रो  सिर्फ  जमीन के अन्दर चलती है ......................
पूरी मेट्रो वाली फीलिंग देती है ...............
लेकिन सबसे सुखद आश्चर्य ,  मेट्रो  स्टेशन के नाम  में  कवियों  को बड़ी वरीयता दी गयी है ..........
दो स्टेशन कवी गुरु के नाम से हैं ....रविन्द्र सदन  एवं रविन्द्र सरवर ,एक उनकी महान रचना गीतांजलि पर ...
दो  और  स्टेशन ,  दो  कवियों  कवि सुभाष एवं कवि नजरुल  को  समर्पित है .....................
काश दुसरे शहर में भी अपने कवियों के लिए  इतना सम्मान होता ..............

अध्यात्म  ...............................................................................................................
कालीघाट मेट्रो स्टेशन .....
अरे यहाँ तो कोलकाता है ही नहीं  ......
छोटे छोटे दूकान , घर .......
कहीं कोई  माल   या बड़े शहर की  चमक दमक नहीं ......
पश्चमी  उत्तर प्रदेश के  कोई नगर पंचायत भी इससे  ज्यादा  रौनक लगेगा .....
११ नम्बर वाले बस या कहिये पेदल   चल कर  कालीघाट के प्रसिद्ध काली मंदिर पहुँचता हूँ .....
अध्यात्म  और  बाजार (या किसी की जीवटता ही कह लिजिए ) का पुराना सम्बन्ध शुरू ..........
"  मंदिर  का मुख्य कपाट अभी बंद है , दर्शन करना चाहते हो तो , २०० रु /- लगेगा "......
एक तिलक धारी युवक ने तपाक से पूछा ...........
" क्या  लगता है ,आपको  चोरी से दर्शन का कोई फायदा  होगा ..."
"  चोरी से नहीं ,यह वी . आइ. पी . के लिए है ".....
कभी मंदिरों के कपाट कुछ वी . आई . पी. ( तथाकथित ?) जातियों के लिए ही सुरक्षित थे .....
बड़ी  मुश्किल से सबके लिए खुल पाए थे .........
फिर से उन्हें नवसृजित वी . आई . पी. के लिए सुरक्षित  किया जा रहा था ........
फिलहाल मैंने  आम आदमी की तरह प्रवेश लिया .....
अन्दर काफी भीड़ थी .....और युवक की सुचना भी गलत थी .लेकिन  भीड़  के नियत्रण  की कोई व्यवस्था नहीं थी ......
मैंने  मंदिर समिति का एक बोर्ड देखा . उनके सदस्य एवं अध्यक्ष में स्थानीय  अधिकारीयों के उच्च पदों  के नाम लिखे थे .....
पता नहीं  शायद सारे किसी बड़ी  दुर्घटना (माफ़ कीजियेगा लेकिन भीड़ के नियत्रण की कोई व्यवस्था ना होने की वजह से ऐसा हो सकता है ....) का इंतज़ार कर रहे हों .................
मंदिर परिसर  में  एक जगह प्रसाद स्वरुप खिचड़ी  बांटी जा रही थी ......
बिना किसी  कतार के , मैं  ले  पाने  में  सफल रहा . खिचड़ी  साधारण लेकिन बहुत अच्छी लगी .........
भूख  भी जो तेज लगी थी ...........
तभी एक छोटा सा बालक पैर पकड़ कर पैसे मानने लगा .....
मैंने पैसे देने से मना कर दिया .......
पता नहीं सही या गलत , पर मुझे लगता है ,पैसे देने से हम समाधान के 
बजाय समस्या का हिस्सा हो जाता है .....
हो सकता है यह पूर्ण सत्य  ना हो .....
फिलहाल मैं मंदिर से बाहर आ जाता हूँ .........................
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  "  मदर , मार्क्स  एवं नगरवधू "   पर चर्चा  अगले पोस्ट  में .........................
   

खेल - सुकेश साहनी

खेल
सुकेश साहनी
(रेनड्रॉप के चैट रूम से)

मायसेल्फ : हैलो?
रेनड्रॉप : हाय!
मायसेल्फ : ए एस एल प्लीज?
रेनड्रॉप : 22, फीमेल फ़्राम गुजरात एण्ड यू?
मायसेल्फ : मेल फ़्राम देहली।
रेनड्रॉप : ओके....
मायसेल्फ : आय वुड लाइक टू प्ले विद यू।
रेनड्रॉप : लाफ आन लाउड (ठहाका!)
मायसेल्फ : क्या हुआ?
रेनड्रॉप :देहली इज़ आलरेडी प्लेइंग विथ गुजरात
मायसेल्फ :गुड सेंस आफ़ ह्यूमर !
रेनड्रॉप : नो, आय एम सीरियस।
मायसेल्फ : टेक इट ईजी! गुजरात अब बिल्कुल 'फिट है। कम आन, यू विल एन्जॉय माय कम्पनी।
रेनड्रॉप : ओके......वाट यू हैव इन योअर माइंड?
मायसेल्फ : तुम्हारे पास वेब कैमरा है?
रेनड्रॉप : हां और तुम्हारे पास?
मायसेल्फ : चैटिंग फ़्राम अ रिजॉ़र्ट, नो कैम (रा) नो पिक (चर) हियर।
रेनड्रॉप : ओके....
मायसेल्फ : जस्ट वांट टू सी यू न्यूड।
रेनड्रॉप : ओके ..बट आय अलर्ट यू–यू आर नाट गोइंग टू एन्जॉय माय न्यूडिटी।
मायसेल्फ : नो, आय कैन बेट...यू आर हॉट।
रेनड्रॉप : माय कैमरा इज आन नाउ, आर यू वाचिंग मी?
मायसेल्फ : यस, बट यू आर नाट न्यूड........यू आर स्टिल वेअरिंग समथिंग।
रेनड्रॉप : इस बुरे मौसम में दिल्ली से गुजरात को साफ–साफ देखना थोड़ा मुश्किल है।
मायसेल्फ : फिर वही मजाक!
रेनड्रॉप : व्हयू माय क्लोज अप.....आय एम नाट वेअरिंग एनीथिंग।
मायसेल्फ : तुम्हारे जिस्म पर ये निशान?
रेनड्रॉप : दंगाइयों ने हमारे साथ सामूहिक बलात्कार किया, हमारे जिस्मों को बेरहमी से रौंदा गया, ये उन्हीं जख्मों के निशान हैं।
मायसेल्फ : ओह!.....तब तो तुमने उन्हें बहुत करीब से देखा है, वे कौन थे?
रेनड्रॉप : पहचानना मुश्किल था, उन्होंने एक ही सांचे में ढले मुखौटे पहन रखे थे।
मायसेल्फ : टेल मी एवरीथिंग अबॉउट दिस, हम इस 'स्टोरी को अपनी पार्टी की वेब साइट के मुख पृष्ठ पर देंगे।
रेनड्रॉप : वाट इज द नेम आफ योअर वेब साइट?
मायसेल्फ : सेकुलर 2002 डॉट कॉम।
रेनड्रॉप : ओके......आय एम रेडि फॉर नेट मीटिंग।
मायसेल्फ : लेकिन आगे बढ़ने से पहले–जस्ट फॉर फॉरमेलिटि–हमारा यह जानना जरूरी है कि तुम किस सम्प्रदाय से हो।
रेनड्रॉप : सॉरी, डियर! रेनड्रॉप (वर्षा की बूँद) इज फॉर आल। हमारी कोई बिरादरी नहीं होती।
मायसेल्फ : यू आर बोरिंग, स्पॉइलिंग माय टाइम.......एनअदर गर्ल विद वेब कैमरा इज आन लाइन फार मी। बाइ! बाइ फॉर एवर!!
                  from laghukatha.com

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

दूसरा बनवास


दूसरा बनवास 
             - कैफ़ी आजमी 
राम बनवास से जब लौट के घर में आए
याद जंगल बहुत आया जो नगर में आए
रक़्से दीवानगी आंगन में जो देखा होगा
छह दिसंबर को श्रीराम ने सोचा होगा
इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आए
जगमगाते थे जहां राम के क़दमों के निशां
प्‍यार की कहकशां लेती थी अंगड़ाई जहां
मोड़ नफरत के उसी राह गुज़र से आए
धर्म क्‍या उनका है क्‍या ज़ात है यह जानता कौन
घर न जलता तो उन्‍हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा लोग जो घर में आए
शाकाहारी है मेरे दोस्‍त तुम्‍हारा ख़ंजर
तुमने बाबर की तरफ फेंके थे सारे पत्‍थर
है मेरे सर की ख़ता जख़्म जो सर में आए
पांव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थे
कि नज़र आए वहां खून के गहरे धब्‍बे
पांव धोए बिना सरजू के किनारे से उठे
राजधानी की फ़िजां आई नहीं रास मुझे
छह दिसंबर को मिला दूसरा बनवास मुझे

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

दुखांत ये नहीं होता ....


दुखांत ये नहीं होता .....

दुखांत यह नहीं होता कि रात की कटोरी को कोई जिन्दगी के शहद से भर न सके, और वास्तविकता के होंठ कभी उस शहद को चख ना सकें ....दुखांत यह होता है कि जब रात की कटोरी पर से चंद्रमाँ की कलई उतर जाये और उस कटोरी में पड़ी कल्पनाये कसैली हो जाये.

दुखांत ये नहीं होता की आपकी किस्मत से आपके साजन का नाम-पता ना पढ़ा जाये और आपकी उम्र की चिट्ठी सदा रुलती रहे. दुखांत यह होता है कि आप अपने प्रिये को अपनी उम्र कि सारी चिट्ठी लिख लें और आपके पास से आपके प्रिये का नाम पता खो जाये.

दुखांत यह नहीं होता कि जिन्दगी की लम्बी डगर पर समाज के बंधन अपने कांटे बिखेरते रहे..और आपके पैरो में से सारी उम्र लहू बहता रहे. दुखांत यह होता है कि आप लहू लुहान पैरो से एक ऐसी जगह पर खड़े हो जाये जिसके आगे कोई रास्ता आपको बुलावा न दे.

दुखांत यह नहीं होता कि आप अपने इश्क के ठिठुरते शरीर के लिए सारी उम्र गीतों के पैरहन सीते रहें. दुखांत यह होता है कि इन पैरहनो को सीने के लिए आपके विचारो का धागा चूक जाये और आपकी सुई (कलम) का छेद टूट जाये. 
                              - अमृता प्रीतम  की आत्मकथा  "रसीदी टिकट" से  

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

गरम चाय की कुल्हड़ और एक सर्द शाम

गरम चाय की कुल्हड़  और  एक सर्द शाम







कुल्हड़ ....
शब्द जितना है अल्हड ...

सिर्फ शब्द नहीं, मानव हाथों और मिट्टी का जोड़ है, अगढ़......

समय के अंधड आने से पहले .......

जब शाम व्यस्त के बजाय सर्द हुआ करती थी ......
चौराहे की किनारे एक छोटी सी दुकान....
और गरम चाय एक कुल्हड़ में .......
मिट्टी नुमा खुशबू उठती थी .....
चाय के रस में सराबोर होकर .......
तिलिस्म सिर्फ सर्द और चाय में ही नहीं कुल्हड़ में भी था ......
अंतिम घूंट तक चाय के ताप को बस यूँ बनाए रखना ........
या फिर इस ढंग से कम करना .......
मानो जिंदगी निकल जाये और जवां होने का भ्रम भी बना रहे ......
और फिर धरा पे चटक जाये बेखबर .........
छोटे - छोटे टुकड़ों में बिखर .....
अस्तित्व के मोह को छोड़कर ......
चयन सृष्टि के चक्र का सफर ..............
गरम चाय की कुल्हड़ ,..........
सर्द शाम में .........
अहसास कराती थी ,..........
जीवन बस यूँ ही है ..........
निरन्तर ..................


                                                 - नेपथ्य निशांत