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मैंने यह कविता करीब ६-७ वर्ष पूर्व एक कवि सम्मेलन से लौटने के पश्चात प्रतिक्रिया
स्वरुप लिखी थी. वर्तमान में जब मीडिया की निष्पक्षता सवालों के घेरों में हैं,
कवियों एवं लेखको के एकपक्षीय विमर्श को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सभी आयामों
का सम्मान करते हुए भी कटघरे में खड़ा करने की आवश्यकता है .]
चौबीस घंटे के पश्चात्
रह रह कर मेरा मन कर रहा व्याघात
वहां मैंने सुनी बहुतेरे कवियों की बात
कुछ ने हास्य - व्यंगयों से सभा का श्रृंगार
किया,
कुछ ने अपनी प्रतिभा से पाकिस्तान पर प्रहार
किया,
कुछ ने गुजरात दंगो पर अपना विचार दिया
यहीं है वह बात
जहाँ रह रह कर , मेरा मन कर रहा व्याघात
इन चंद कवियों को बहुत याद आई
जलते हुए साबरमती एक्सप्रेस की
लेकिन , इनकी आँखों में नहीं बची थी इतनी दृष्टि
इनके नाकों में नहीं बची थी , इतनी घ्राण शक्ति
,
जो नरोदा पटिया की सडती लाशों की बू को भी सूंघ
पाते
उनके कानो में नहीं बची थी , इतनी श्रवण शक्ति ,
जो गुलमर्ग सोसाइटी के क्रंदन को भी सुन पाते,
इसी तरह जब मैं पढ़ता हूँ ,
‘हंस’ के काव्य भाग को ,
तो इन पृष्ठों पर नहीं पाता, एस-६ डब्बे की बात
उनकी संवेदनाये , मानवीय भावनाये
सारी तुकबंदी एवं काव्यात्मक उपमाये
प्रारंभ होती है , गोधरा के पश्चात्
यही है वो बात ,
जहाँ रह रह कर, मेरा मन कर रहा व्याघात
मैं पूछता हूँ ,
क्या जलती आग की लपटों से
उठने वाली मासूम चीखों में भी अंतर होता है .
या फिर अंतर होता है ,
इंसानों को जलाने के लिए प्रयुक्त होने वाली
पेट्रोल में,
नहीं कोई अंतर नहीं होता, तो फिर क्यों,
इस आग पर सेंके जाने वाले राजनीति की रोटियों
की तर्ज पर ,
कवियों की संवेदनाये और भावनाए रंग बदल लेती है.
फिलहाल , मुझे इन कवियों की कविताओ से ज्यादा
इन्तजार है,
किस्से के उस लड़के की जो,
एक मूर्ख और नग्न राजा की सवारी में ,
दुदंभी नाद और जयघोष के बीच,
बड़े ही अबोधता से सहज कह उठे
“अरे राजा तो नंगा है “
हाँ, इस बात की सम्भावना बहुत ज्यादा है,
उस लड़के के परिजन उसके मुहं पर हाथ डालते हुए
कहें
“अबे, चुप हो जा ,यदि राजा के कानो तक,
पहुँच गयी यह बात,
मिल
जायेगा प्राणदंड बातों ही बात “
-
नेपथ्य निशांत
शब्दों का अद्भुत संगम ।
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